जयंती:१४६
प्रेमचंद–स्मरण
आज प्रेमचंद की १४६
वीं जयंती है। विश्व-साहित्य में भारतीय लेखकों में प्रेमचंद सबसे अधिक प्रतिष्ठित
हैं। उनके उपन्यासों-कहानियों का विश्व की सभी प्रमुख भाषाओं में सबसे अधिक अनुवाद
हुआ है। शिवपूजन सहाय के संस्मरणों में उनके जीवन की मनमोहक छवि देखी जा सकती है। प्रेमचंद
के जीवन के अंतिम १६ वर्षों में शिवपूजन सहाय का उनके साथ अत्यंत अंतरंग साहित्यिक
संपर्क रहा – विशेषकर बनारस में (१९२६ से १९३३तक) और कुछ दिन (१९२४ में) लखनऊ में जहां
रहते हुए शिवपूजन सहाय ने ‘रंगभूमि’ का सम्पादन किया।
आज इस जयंती-दिवस
पर उन बातों का पुनरस्मरण सुखद है। प्रस्तुत है उसी प्रसंग में मेरा यह आलेख जो मेरी
पुस्तक ‘दर्पण में वे दिन’ में भी पढ़ा जा सकता है।
‘रंगभूमि’ की पांडुलिपि
प्रेमचंद के उपन्यास–साहित्य में ‘रंगभूमि’
का विशिष्ट स्थान है । आकार, लोक प्रियता, विवादास्पदता, तत्कालीन समसामयिक परिस्थितियों
से कथानक की संघटना एवं चरित्रों की संबद्धता - इन दृष्टि
बिंदुओं से ‘रंगभूमि’ की विशिष्टता स्पष्ट है । किंतु, एक अन्य महत्वपूर्ण बिंदु यह
है कि यही प्रेमचंद का पहला उपन्यास था, जिसकी ‘‘पूरी पांडुलिपि उन्होंने पहले–पहल
देवनागरी लिपि में ही अपनी ही लेखनी से तैयार की थी । प्रेमचंदजी ने अपना बड़ा पोथा
पहले–पहल नागराक्षर में लिखा था, उसका ऐतिहासिक महत्व था ।’’ आचार्य शिवपूजन सहाय ने
अपने संस्मरण (शिवपूजन–रचनावली - ४) में ‘रंगभूमि–प्रसंग’
में लिखा है:
मैं ‘माधुरी’ और गंगा पुस्तकमाला के संपादन–विभाग
में काम करता था । कुछ दिनों बाद वे (प्रेमचंद) भी माधुरी के संपादक होकर आए । उसी
समय उनका ‘रंगभूमि’ नामक बड़ा उपन्यास वहां छपने के लिए आया था । श्रीदुलारेलालजी भार्गव
ने गंगा–पुस्तकमाला के नियमानुसार उसकी प्रेसकॉपी तैयार करने के लिए मुझे सौंपी ।–––––वह
नागरी–लिपि में लिखा पहला उपन्यास दर्शनीय था । शायद ही कहीं लिखावट की भूल हो, तो
हो । भाषा तो उनसे कोई बरसों सीखे । लेखनी का वेग ऐसा कि संयोगवश ही कहीं कट–कुट मिले
। कथावस्तु की रोचकता लिपि–सुधार में बाधा देती थी । घटनाक्रम में पड़ जाने पर संपादन
शैली के निर्धारित नियम भूल जाते थे । ध्यान से भाषा पढ़ने के कारण कितने ही सुंदर प्रयोग
सीखने का सुअवसर मिला ।–––––मैंने सुना था कि वे पहले उर्दू में कहानी या उपन्यास लिख
जाते हैं, फिर किसी हिंदी के जानकार से नागराक्षरों में लिखवाते हैं । पर जब ‘रंगभूमि’
की कॉपी मिली, मेरे आश्चर्य और आनंद का ठिकाना न रहा । सारी कॉपी प्रेमचंदजी की ही
लिखी हुई थी । दो मोटी जिल्दो ंमें खास एक बड़ा पोथा, छोटे–छोटे अक्षर, घनी लिखावट,
कहीं कांट–छांट नहीं, मानों पूरी पुस्तक एक सांस में लिखी गई हो ।–––––वह पांडुलिपि
(प्रेसकॉपी) यदि आज कहीं सुरक्षित होती!!
‘रंगभूमि’ (सन १९२५ ई–) से पहले प्रेमचंद
ने अपने सभी उपन्यास उर्दू–लिपि में लिखे और उनका नागरी–लिप्यन्तरण दूसरे से करवाया
। पहले के उपन्यासों में ‘प्रेमा’ (सन् १९०८ ई–), ‘सेवासदन’ (सन् १९१८ ई–), ‘वरदान’
(सन् १९२० ई–) और प्रेमाश्रन’ (सन् १९२२ ई–) सब पहले उर्दू में लिखे गए, फिर नागरी
में लिप्यन्तरित हुए । ‘प्रेमा’ और ‘वरदान’ पहले उर्दू में ही छपे भी, हिंदी–संस्करण
बाद में प्रकाशित हुए । ‘सेवासदन’ और ‘प्रेमाश्रम’ पहले उर्दू में लिखे गए, लेकिन उनके
हिंदी–संस्करण ही पहले प्रकाशित हुए । ‘रंगभूमि’ से पहले के इन उपन्यासों की हिंदी–पांडुलिपियां
प्रेमचंद ने स्वयं नहीं तैयार की थीं। पहले–पहल अप्रैल–अगस्त सन् १९२४ ई– के बीच प्रेमचंद ने ‘रंगभूमि’ की पांडुलिपि,
काशी में रहते हुए, स्वाक्षर में, नागरी–लिपि मे, तैयार की । अमृतराय के अनुसार, पे्रमचंद
ने ‘रंगभूमि’ के उर्दू–मसविदे (‘चौगाने हस्ती’) को सन् १९२२ ई– के १ अक्टूबर
को लिखना शुरू किया, जो सन् १९२४ ई– के १ अप्रैल को पूरा हो गया ।
‘चैगाने हस्ती’ का हिंदी–रूपांतर भी साथ–साथ
होता रहा और करीब चार महीने में, सन् १९२४ ई– के १२ अगस्त को ‘रंगभूमि’ की (हिंदी)
पांडुलिपि तैयार हुई । (काशी में) प्रेस की हालत बदस्तूर खराब चल रही थी–––––मुंशीजी
अगले ही महीने (सितंबर में) सौ रूपए मासिक पर लखनऊ पहुंच गए और दुलारेलाल के साथ ही
३२ लाटूश रोडवाले मकान पर ठहरे । ‘रंगभूमि’ की छपाई भी शुरू हो गई ।
‘रंगभूमि’ की संशोधित हिंदी–पांडुलिपि
एवं उसके प्रकाशन के संदर्भ से कई अनुत्तरित प्रश्न जुड़े हुए हैं, जिनकी अपनी एक लंबी
रहस्यकथा है । ‘रंगभूमि’ की वह संशोधित पांडुलिपि (‘दो मोटी जिल्दों में खासा एक बड़ा
पोथा’) कहां है, अथवा लुप्त हो गई? आचार्य शिवपूजनसहाय का भाषा–संशोधन वास्तव में कैसा
था? गंगा–पुस्तक माला के वे भाषा–संशोधन नियम क्या थे ? उनका नियामक कौन था? फिर,
‘रंगभूमि’ का प्रकाशन जनवरी (सन् १९२५ ई–) के प्रारंभ में हुआ था अथवा फरवरी के प्रारंभ
में? इस पूरे संदर्भ से मुख्यत: तीन व्यक्ति जुडे़
हैं - प्रेमचंद, दुलारेलाल और शिवपूजन सहाय । पृष्ठभूमि में हैं पं– कृष्णबिहारी
मिश्र, जो ‘माधुरी’ के संपादक–मंडल के सदस्य थे । प्रेमचंद के पत्र एवं शिवपूजन सहाय
लिखित संस्मरण प्रकाशित हैं, जिनसे अनेक प्रामाणिक सूचनाएं मिलती हैं, जो अत्यधिक महत्वपूर्ण
है । लेकिन, शिवपूजन सहाय को लिखे, दुलारेलाल तथा कृष्णबिहारी मिश्र के, अद्यावधि सर्वथा
अप्रकाशित, पत्रों द्वारा इस पूरे प्रसंग पर नया प्रकाश पड़ता है ।
शिवपूजन सहाय, ‘मतवाला’ मंडल छोड़कर, दुलारेलाल
के आग्रह पर, अप्रैल, १९२४ ई– में कलकत्ता से लखनऊ आ गए थे । ३० अप्रैल (सन् १९२४ ई–)से
वे लखनऊ के अमीनाबाद पार्क के पास ‘रॉयल हिंदू होटल’ में एक कमरा लेकर रहते थे । उनके
साथ गंगा–पुस्तकमाला एवं ‘माधुरी’–कार्यालय के कुछ अन्य साहित्यिक व्यक्ति भी रहते
थे । ‘माधुरी’ से उन्हें पचासी रूपए तनख्वाह मिलती थी । ‘माधुरी’ या गंगा–पुस्तकमालाल
का संपादन–विभाग इसके कुछ ही दिनों बाद अमीनाबाद पार्क से उठकर लाटूश रोड पर आ गया
था । यही वे दिन थे, जब प्रेमचंद ‘रंगभूमि’ की हिंदी–पांडुलिपि तैयार करने में लगे
थे । काशी में अपने ‘सरस्वती प्रेस’ की परेशानियों से प्रेमचंद बहुत ऊब चुके थे । गंगा–पुस्तक–माला
के दुलारेलाल उनकी ‘रंगभूमि’ प्रकाशित करना चाहते थे । पत्राचार चल रहा था । (यद्यपि
दुर्भाग्यवश वे पत्र प्रेमचंद ने सुरक्षित नहीं रखे एवं प्रेमचंद ने दुलारेलाल को जो
पत्र लिखे, वे भी प्रकाशित नहीं हैं) । प्रेमचंद ने मुंशी दयानरायन निगम को प्रेस की
अपनी परेशानियों का हवाला देते हुए सन् १९२४ ई– की ८ जुलाई को लिखा था -
भाईसाहब अब अपने रूपए की वापसी पर मुसिर
(आग्रहशील) हो रहे हैं । टालमटोल कर रहा हूं । इसलिए––––––अभी भी मैं मौजूदा रकम का
इरसाल (रवाना) नहीं कर सकूंगा । अक्टूबर तक मुझे काफी रुपए मिलने की मुस्तकिल उम्मीद
है––––– रंगभूमि के रुपए अक्टूबर तक मिलेंगे । इस उम्मीद पर आपसे वादा कर रहा हूँ । आप
मुझसे नाराज न हों ।
दुलारेलाल ने प्रेमचंद की ‘रंगभूमि’ के
प्रकाशन की मद में कुल अठारह सौ रुपए दिए । साथ ही, उन्हें सौ रुपए माहवार पर अपने
प्रकाशनागार में ‘लिटरेरी असिस्टेंट’ के पद पर लखनऊ बुला लिया । सितंबर, १९२४
ई– में प्रेमचंद सपरिवार लखनऊ आ गए । प्रेमचंद और शिवपूजन सहाय का परिचय तो कलकत्ता
से ही था, परंतु लखनऊ प्रवास में, एक ही कार्यालय में साहित्यिक कार्यकलाप के बीच,
यह परिचय शीघ्र आत्मीयता में परिणत हो गया ।(नीचे दिए लिंक पर पढे शिवपूजन सहाय का प्रेमचंद पर लिखा वह
संस्मरण – अंग्रेजी में। )
सितंबर, १९२४ ई– में ही लखनऊ में दंगा हुआ और बड़ी कठिनाई से शिवपूजन सहाय अमीनाबाद के ‘रॉयल हिंदू होटल’ से अपने कुछ मित्रों के साथ जान बचाकर भाग सके । इसका पूरा विवरण शिवपूजन सहाय ने ‘मतवाला’ में प्रकाशित कराया था -
अधिकांश सज्जन अपना अपना असबाब अपने–अपने
कमरे में छोड़कर जान लेकर भागे । मैं, पं. शांतिप्रिय द्विवेदी,
श्रीमदभागवत प्रसाद और पं. भगवतीप्रसाद त्रिपाठी (जो लोग गंगा–पुस्तकालय
कार्यालय में काम करते थे और होटल में मेरे साथ ही रहते थे) अपना–अपना असबाब संभालने
लगे । ताबड़तोड़ जैसे–तैसे बांध–बूँध कर इकटठा
किया । इतने में बाहर से अंतिम सूचना मिली । सब चीजें ज्यों–की–त्यों वहीं छोड़कर सब
लोग होटल से बाहर निकल आए (बाद में पता चला) रॉयल हिंदू होटल का ताला टूट चुका है ।
और वह लुट गया होगा । सुनकर और मानसिक कष्ट हुआ क्योंकि मेरा सामान होटल में अस्तव्यस्त
पड़ा हुआ था । औरों का सामान उतना बहुमूल्य नहीं था,
जितना मेरा क्योंकि मेरे पास कई महत्वपूर्ण ग्रंथों की हस्तलिखित कापियां थीं । मेरे
जीवन–भर का संग्रह किया हुआ साहित्यिक मसाला मेरी नोटबुकों–डायरियों में था, सब
तहस–नहस हो गया होगा । (१६– ९– १९२४)
जुलाई–अगस्त, १९२४ ई. में ही प्रेमचंद
ने संभवत: ‘रंगभूमि’ की हिंदी–पांडुलिपि दुलारेलाल को प्रकाशनार्थ सौंप दी थी, जिसे
उन्होंने संशोधनार्थ आचार्य शिवपूजन सहाय के जिम्मे लगा दिया था । शिवपूजन सहाय को
लिखे दुलारेलाल के अप्रकाशित पत्रों में पहले यह संदेह उभरता है कि ‘रॉयल हिंदू होटल’
में छूटे असबाब में ‘रंगभूमि’ की पांडुलिपि भी थी । किंतु बाद में इसका समाधान स्वयं
इस बात से हो जाता है कि वह संशोधित पांडुलिपि जहां से भी मिली, दुलारेलाल को मिल गई,
और २३ नवंबर, १९२४ ई– के पत्र में दुलारेलाल लिखते हैं -
“रंगभूमि के १५ फार्म मैंने पास कर दिए हैं ।’’ ७ दिसंबर के पत्र में - ‘‘उनकी आधी पुस्तक
छप गई ।’’ फिर कुछ बाद, ५ फरवरी, १९२५ ई– के पत्र में - ‘‘रंगभूमि’ छप गई
है । शीघ्र ही भेजी जाएगी ।’’ शिवपूजन सहाय को समर्पित ‘रंगभूमि की प्रति पर प्रेमचंद
ने २२ फरवरी १९२५ ई. की तिथि अंकित की है । इसी तिथि
का लिखा प्रेमचंद का शिवपूजन सहाय के नाम पत्र ‘चिट्ठी–पत्री’ में प्रकाशित है -
लीजिए जिस पुस्तक पर आपने कई महीने दिमागरेज़ी
की थी, वह आपका एहसान अदा करती हुई आपकी खिदमत में जाती है, और आपसे विनती करती है
कि मुझे दो–चार घंटों के लिए एकांत का समय दीजिए, और तब आप मेरी निस्बत जो राय कायम
करें, वह अपनी मनोहर भाषा में कह दीजिए ।
‘रंगभूमि’ की मूल हिंदी–पांडुलिपि तथा
उसके संशोधन एवं प्रकाशन के संबंध में दुलारेलाल भार्गव और कृष्णबिहारी मिश्र के अप्रकाशित
पत्रों के निम्नांकित उद्धरणों को ज्ञात सूचनाओं से मिलाकर ध्यान से पढ़ने पर कई रहस्यमय
संकेत उभरते हैं, और कई अत्यधिक महत्वपूर्ण तथ्य उदघाटित होते हैं । (ये पत्र लखनऊ
से शिवपूजन सहाय को उनके गांव तथा बाद में कलकत्ता के पते पर भेजे गए थे) ।
दुलारेलाल के पत्र
(२५–९–२४): ‘‘कृपया
शीघ्र आइए । आपकी चीजें तालें में बंद हैं, शायद कुछ नष्ट नहीं हुआ है, घबराइए नहीं
। मैं वहां गया था ।–––––बतलाया कि सब लोगों का सामान मौजूद है । कुछ नष्ट नहीं हुआ
। द्विवेदीजी को अभी फिर भेजा था । वह आपकी सब चीजें सुरक्षित देख आए । ‘सिर्फ ‘रंगभूमि’
नहीं दिखलाई दी । शायद टंªक में हो या आप ले गए हों । ‘रंगभूमि’ को प्रेस में देना
है, शीघ्र आइए ।’’
(३–१०–२४): ‘‘आपका
कोई कुशलपत्र अभी तक न मिलने के कारण हम लोगों की चिंता और भी बढ़ती जाती है ।––––––इधर
प्रेमचंद जी ने भी ‘रंगभूमि’ के लिए जल्दी मचा रखी है ।––––––आप ‘रंगभूमि’ को पत्र
पहुंचने के साथ ही रजिस्ट्री से रवाना कर दें । इसमें जरा भी शिथिलता न करें । इधर
छप जाएगी, तो जल्दी छप ही जाएगी, नहीं तो फिर वह नवंबर में पड़ जाएगी और हमको प्रेमचंद
का तकाजा बराबर सहना पड़ेगा । (पुनश्च:) शायद ‘रंगभूमि’
आप यही छोड़ गए हैं । अतएव कृपा करके, दया करके फौरन आकर उसका काम शुरू करवा
दीजिए ।’’
(११–१०–२४) % ‘‘(पुन: लिखा) काशी में आप ‘रंगभूमि’ कहां छोड़ आए हैं ? लिख दें, वह हमारे पास
रजिस्ट्री करके भेज दें । (१३–१०–२४) शांतिप्रिय सूचित करता है कि ‘रंगभूमि’ को ‘काशी’
में मैंने शिवपूजन जी के पास देखा था । और आप लिखते हैं कि मेरे पास नहीं है, यह क्या
मामला है ? कृपया सूचित कीजिए । ‘रंगभूमि’ को शीघ्र ही छापना है । क्या खो गई ? खो
गई हो, तो दुबारा लिखाई जाए ? आप आखिर कब आ रहे हैं ?’’ (१८–१०–२४)। आपका
पत्र तो मिला पर मालूम नहीं, क्यों आपने इस पत्र में भी ‘रंगभूमि’ के संबंध में कुछ
नहीं लिखा । प्रेमचंद जी अलग ही जल्दी मचाए हुए हैं, आशा है, आप अवश्य पत्र पहुंचते
ही ‘रंगभूमि’ भेज देंगें ।’’
(२०–१०–२४) % कृपा करके यह भी लिखिए कि
‘रंगभूमि आपके पास है या कहीं वहीं बंद है क्या ? क्योंकि, यहां के आपके कागज–पत्रों
में तो वह है नहीं । अबकी बार साफ–साफ लिखिए कि क्या बात है ? शांतिप्रिय ने तो लिखा
था कि काशी में उसने उसे आपके पास देखा था । आखिरी दो कापियां तो हमारे पास हैं । पहली
आपके पास थी । लेकिन शुरू की कॉपी होने के कारण उसके बिना काम नहीं हो सकता । कृपया
सब बातें साफ–साफ लिखिए।
(२१–१०–२४): रंगभूमि आदि के बारे में कृपया होटलवालों को लिख दीजिए कि हमें दे दें
। एक मकान ५० का ले लिया है । उसमें बहुत जगह हैं । आप वहां बखूबी रह सकेंगे । सब चीजें
आपकी वहीं रख दी जाएगी । अब मैंने निश्चय किया है कि ‘रंगभूमि’ के दो फार्म रोज मैं
ही छपवाऊंगा । आप उसे कृपया दिलवा दीजिए । जिस दिन मुझे ‘रंगभूमि’ मिलेगी, उसी दिन
मैं प्रेमचंद को (तार) देकर बुलवाऊंगा ।
दुलारेलाल के तीन पोस्टकार्ड - २६, २७, २९ अक्टूबर
१९२४ ई. के शिवपूजन सहाय को पहले के पत्रों की तरह गांव के पते पर ही भेजे गए
थे, किंतु वहां से वे ‘रॉयल हिंदू होटल’ के पते पर पुननिर्देशित होकर लखनऊ पहुंचे ।
ऐसी स्पष्ट संभावना है कि अक्टूबर, १९२४ ई. के अंतिम सप्ताह
में शिवपूजन सहाय फिर लखनऊ लौटकर गए और वहां उन्होंने ‘रंगभूमि’ की पांडुलिपि जहां
से भी पाई, उसका बचा काम लखनऊ में रहकर पूरा किया । दुलारेलाल का ही लिखा एक स्थानीय
पत्र (लखनऊ: २२–११–२४) है, जिसमें वे लिखते हैं - ‘‘आपके भाई जब अब
भी सख्त बीमार हैं, तो आपको जाना ही होगा । आप आज ही चले जाइए । मैं आपको १५ रोज की
वैतनिक छुट्टी देता हूं ।’’
लगभग एक महीने लखनऊ में रहकर शिवपूजन सहाय
पुन: अपने गांव लौट गए और जनवरी, १९२५ ई. तक वे फिर कलकत्ता वापस हो गए । ‘माधुरी–संपादक पं–
कृष्णबिहारी मिश्र के इन दिनों के पत्रों में भी ‘रंगभूमि’ के प्रकाशन से संबद्ध कुछ
महत्वपूर्ण सूचनाएं हैं-
(४–१२–२४): ‘‘यहां
आपकी याद बराबर की जाती है । प्रेमचंदजी ठहरे हुए हैं । ‘रंगभूमि’ छप रही है । (१४–१२–२४)
% यहां आपके आने की प्रतीक्षा प्रतिदिन की जा रही है । श्री प्रेमचंद जी यहां विराजमान
हैंµसंभव है कि स्थायी रूप से भी रहेंµऔर ‘रंगभूमि’ आधे के लगभग छप गई है । मैं तो
यही चाहूंगा कि आप लखनऊ में ही रहें । आपके साथ का गोष्ठी–सुख भुलाया नहीं जा सकता
है । (१०–१–२५) %यह जानकर हर्ष हुआ है कि कलकत्ता में आपने जो नया काम अपनाया है, उसके
करने में आप सुखी है, और वहां आपको हर प्रकार से लाभ है । आपके चले जाने का मुझे अवश्य
ही खेद है, पर इस बात का संतोष है कि आप मजे में हैं । श्री प्रेमचंद जी यहां सपरिवार
आ गए हैं और उसी मकान में ठहरे हैं, जिसमें आपसे रहने के लिए आग्रह किया जाता था ।’’
इन पत्रों में ‘रंगभूमि’के प्रकाशन का संदर्भ विशेष आलोकित होता
है । फिर भी, ‘रंगभूमि’ की पांडुलिपि के गड़बड़ होने तथा पुन: मिलने
का प्रसंग पूरी तरह तो नहीं स्पष्ट होता, और दुलारेलाल के पत्रों
में कई प्रकार की अंतर्विरोधी बातें मिलती हैं । ‘रंगभूमि’ की पांडुलिपि यदि ‘रॉयल
हिंदू होटल’ में छूटी थी, तो निश्चय ही किसी–न–किसी प्रकार वह दुलारेलाल को प्राप्त
हो गई और तभी उसका मुद्रण संपन्न हो सका । यह प्रश्न फिर भी रहस्यमय बना रह जाता है
कि ‘रॉयल हिंदू होटल’ में छूटी शिवपूजन सहाय की और सामग्री का क्या हुआ ? फिर, मुद्रण
के बाद ‘रंगभूमि’ की प्रेसकॉपी दुलारेलाल के यहां से कहां चली गई ? ‘रंगभूमि’ की मूल
पांडुलिपि में आचार्य शिवपूजन सहाय ने भाषा संशोधन किस सीमा तक किया था ? लेकिन, कदाचित
ये प्रश्न अब सदा के लिए अनुत्तरित ही रह जाएंगे । (यहाँ यह जोड़ना आवश्यक है कि अक्टूबर, २०२४ की ‘माधुरी’ में
छपी प्रेमचंद कि कहानी का भाषा-संशोधन भी शिवपूजन सहाय ने ही किया था, जिसपर नीचे के
२०२२-२३ के मेरे लेखों में विशेष प्रकाश पड़ता है। और यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि दुलारेलाल
ने ‘माधुरी’ के लिए वर्ततानी के कुछ नियम बनाए थे, और प्रसिद्ध लेखकों कि पांडुलिपियों
पर वे संपादकीय संशोधन नहीं कराते थे, बल्कि अलग दुबारा संपादित लेखन में पांडुलिपि
बनवाते थे जिससे यह पता नहीं चल सके कि वास्तव में पांडुलिपि का संशोधन किसने किया
है, क्योंकि प्रेसकॉपी बाद में नष्ट हो जाती थी।)
‘प्रेमचंद पत्रों में’
चिट्ठियों का भी एक ज़माना था जब लोग लम्बी–लम्बी
चिट्ठियां लिखते थे । घरों में फोन तो तब इक्के–दुक्के ही होते थे । मुझे याद है ३७४,
पटना के ‘हिमालय प्रेस’ में फोन का नंबर था, १९४६ में जब मैं १० साल का भी नहीं था
। लखनऊ में १९२४ में दुलारेलाल के दफ्तर और घर में फोन था । दफ्तर के फोन का नंबर ३०६
था । इसका ज़िक्र भी एक चिट्ठी में ही है जो दुलारेलाल ने मेरे पिता को लिखी थी । लोगों
को फोन की आदत भी तब नहीं थी । पुर्जों और चिट्ठियों का ही चलन था उस ज़माने में । लोग
खूब चिट्ठियां लिखते थे । आज तो डाकिया और लेटर बॉक्स शायद ही कहीं दीखते हैं ।
हिंदी में पत्रों के दो सबसे बड़े संग्राहक
हुए - बनारसीदास चतुर्वेदी और शिवपूजन सहाय । चतुर्वेदीजी ने अपना विशाल पत्र
संग्रह राष्ट्रीय अभिलेखागार में जमा कराया और शिवजी का संग्रह – मूलत: २०,०००से भी ज्यादा पत्र,
जिनमे से खुद छांट कर लगभग १०, ००० पत्र वे गांव से पटना लाये और फिर उनमें से दुबारा
छांटकर मैंने ७, ५०० पत्र नेहरू मेमोरियल लाइब्रेरी में जमा कराया । उसकी पूरी सूची
भी हमने ‘साहित्य’ के ‘शिवपूजन स्मृति–अंक’ (जनवरी, १९६४) में प्रकाशित की थी । बाद में मेरे द्वारा संपादित ‘शिवपूजन सहाय साहित्य
समग्र’ (१० खंड) में उनमें से चुन कर लगभग २, ००० पत्र ३ खण्डों में प्रकाशित हुए हैं,
जिनमें शिवजी के भी लगभग २०० पत्र अंतिम खंड में हैं ।
‘समग्र’ के सम्पादन–क्रम में ही मैंने
शिवजी के उस विशाल पत्र–संग्रह से चुन कर लगभग २०० पत्र ऐसे छांटे जिनमें प्रेमचंद
के वे २५ पत्र तो थे ही, विभिन्न साहित्यकारों के १७५ ऐसे पत्र थे जिनमे या तो प्रेमचंद
की स्पष्ट उपस्थिति थी, अथवा उनसे जुड़े प्रसंगों की चर्चा थी । इसका पहला संस्करण
‘प्रेमचंद पत्र–प्रसंग’ नाम से १९८५ में इलाहाबाद से छपा था, और बाद में २००६ में
‘प्रेमचंद पत्रों में’ नाम से २२५ पत्रों का फिर नया परिवर्द्धित संस्करण प्रकाशित
हुआ । पुस्तक का लोकार्पण प्रेमचंद की १२५ वीं जयन्ती के अवसर पर विख्यात साहित्यकार
श्रीअशोक वाजपेयी ने किया था ।
इन चिट्ठियों की कहानी कुछ ऐसे शुरू होती
है । मेरे पिता ‘मतवाला’ छोड़ कर अप्रैल १९२४ में दुलारेलाल के ‘गंगा पुस्तक माला’ कार्यालय
में लखनऊ आ गए थे, जहां से प्रेमचंद के सम्पादन में ‘माधुरी’ निकलती थी । उसी समय दुलारेलाल
ने उन्हें प्रेमचंद की ‘रंगभूमि’ की पांडुलिपि सम्पादन के लिए दी थी । सितम्बर १९२४
में लखनऊ में दंगा हुआ । शिवजी उस समय अमीनाबाद में छेदीलाल धर्मशाला के पास रॉयल हिन्दू
होटल में रहते थे । दंगे में वे लखनऊ से भाग कर गांव चले गए थे । लेकिन बंद कमरे में
एक ट्रंक में उनकी ‘देहाती दुनिया’ की पाण्डुलिपि के साथ–साथ उनकी बहुत सारी महत्त्वपूर्ण
साहित्यिक सामग्री –डायरियां, आदि - सब वहीं
रह गर्इं । दंगा शांत होने के बाद दुलारेलाल बार–बार शिवजी को बुलावे का ख़त लिख रहे
थे । ‘रंगभूमि’ की संशोधन वाली पांडुलिपि जल्दी में होटल में ही छूट गयी थी । बुलावे
के ख़त इसीलिए लगातार भेजे जा रहे थे । एक ख़त में दुलारेलाल ने शिवजी को लिखा - “भोला चाचा को आपने टेलीफोन से स्पष्ट क्यों नहीं
बतला दिया–––उसी समय मोटर खाली नहीं था तो दूसरे दिन तो मिल सकता था–––” । उस संकट
में उनके लिए फोन करना कितना कठिन था, जब कि उनकी जान पर बनी थी! बाद में शिवजी गांव
से लखनऊ लौटे और ‘रंगभूमि’ की पांडुलिपि का सम्पादन पूरा हुआ, और वह फ़रवरी १९२५ में
छप कर निकल गयी । दंगे का हाल शिवजी ने एक लम्बे पत्र में महादेव प्रसाद सेठ को लिखा
जो ‘मतवाला’ में छपा । यह पूरा पत्र भी ‘प्रेमचंद पत्रों में’ में छपा है । उसी में
‘रंगभूमि’ के छपने की पूरी कहानी भी दुलारेलाल और प्रेमचंद के पत्रों में दर्ज है ।
प्रेमचंद की लिखावट में ही आप पुस्तक में उनके उस पत्र को पढ़ सकते हैं ।
उन दिनों प्रेमचंद बनारस और लखनऊ में रह कर अपने
उपन्यास लिख रहे थे । प्रेमचंद और शिवपूजन सहाय एक दूसरे के मित्र तभी बने थे, यों
पहला परिचय १९२० के आस–पास कलकत्ते में ही हुआ था । शिवजी फिर कुछ दिन ‘मतवाला’ के
सम्पादन– विभाग में निराला के साथ रह कर लखनऊ आ गए, और निराला भी कुछ दिन बाद वहीं
चले आए । डॉ. रामविलास शर्मा ने यह सारी कहानी
निराला की जीवनी में लिखी है ।
वह पत्रों का ही ज़माना भी था । लेकिन पत्रों
का महत्व तब सब लोग नहीं समझते थे । खुद प्रेमचंद ने एक भी पत्र संभाल कर नहीं रखा
। दयानारायण निगम के नाम लिखी प्रेमचंद की अपनी चिट्ठियों को अमृत राय ने एक गतालखाने
के गर्द–गुबार से हासिल किया । उन्होंने घूम–घूम कर लोगों के यहां से प्रेमचंद की चिट्ठियां
खोज निकालीं थीं । शिवजी के पास भी आये और शिवजी के नाम लिखी प्रेमचंद की २५ चिट्ठियां
लीं और ‘चिट्ठी–पत्री’ नाम से लगभग २०० चिट्ठियों को दो खण्डों में छापा । फिर भी
’समग्र’ में प्रेमचंद की कुछ चिट्ठियां ऐसी हैं जो ‘चिट्ठी–पत्री’ में नहीं छपी हैं
।
‘प्रेमचंद पत्रों में’ पुस्तक में १९२४ से १९३६ के
बीच प्रेमचंद और शिवपूजन सहाय के समकालीन १४ साहित्यकारों के लिखे लगभग सवा दो सौ पत्र
कालक्रम से प्रकाशित किये गए हैं जिनसे उन दिनों के साहित्यिक परिवेश का एक औपन्यासिक
चित्र–सा उभरता है । एक के बाद एक अलग–अलग व्यक्तियों के पत्र कालक्रम में आगे बढ़ते
हुए उन दिनों के साहित्य–जगत की एक मुकम्मल तस्वीर पेश करते हैं जिन सब में प्रत्यक्ष–परोक्ष
प्रेमचंद की जीवन–झांकी तो दीखती ही है, और भी बहुत–सी आनुषंगिक सूचनाएं प्राप्त होती
हैं । प्रेमचंद के ज़माने की पूरी तस्वीर दिखाई देती है, कालक्रम में छपे उन पत्रों
में । प्रेमचंद और उनके समकालीनों के सब सरोकार दीखते हैं, और उनके परस्पर संबंधों
की तस्वीरें दिखाई देती हैं ।
इस महत्त्वपूर्ण पुस्तक का लोकार्पण करते
हुए श्रीअशोक वाजपेयी ने इस बात को रेखांकित भी किया था। उन्होंने कहा -
प्रेमचंद की १२५ वीं जयंती के अवसर पर
यह एक अनूठी, महत्वपूर्ण पुस्तक प्रकाशित हुई है, जिसके लिए मंगलमूर्तिजी बधाई के पात्र
हैं । इस पुस्तक का प्रकाशन सचमुच एक सुन्दर, सुविचारित शुरूआत है । इन पत्रों से प्रेमचंद
के जीवन संघर्ष, उनके मित्रों के साथ परस्पर संबंधों पर एक दिलचस्प रोशनी पड़ती है ।
एक बहुत दिलचस्प दुनिया उभर कर हमारे सामने आती है । पुस्तक की विशेषता इसमें है कि
इसको आप एक उपन्यास की तरह पढ़ सकते हैं । इसमें प्रेमचंद और उनके परिसर के लोगों का
मटमैलापन भी सामने आता है - उनके बीच का सद्भाव, वैमनस्य, उनकी चिंताएं,
इन सबका एक दिलचस्प वृत्त बनता है । यह वही वृत्त है जो प्रेमचंद के जीवन का बुनियादी
संघर्ष थाµसाधारण की महिमा की प्रतिष्ठा, साधारण लोगों के जीवन का स्पंदन, आकांक्षाएं,
हताशाएंµ जिनमे कितनी ज़िन्दगी छिपी होती है । और प्रेमचंद आज इसीलिए ज़िंदा हैं । उनका
समय, समाजµसब बदल गया, फिर भी प्रेमचंद इन्हीं कारणों से आज भी जिंदा हैं, क्योंकि
उन्होंने जिस मनुष्य को गढ़ा वह नहीं बदला है, वह आज भी उसी तरह जिंदा है, और उसी तरह
अपने संघर्ष में लगा है । इस पुस्तक के पत्रों में वह पूरा युग साकार हो उठता है, और
इसी लिए इस पुस्तक के प्रकाशन का इस अवसर पर विशेष महत्व है ।
इस पुस्तक में प्रेमचंद पर लिखा शिवजी
का संस्मरण भी है जिससे पूरे प्रसंग की पृष्ठभूमि बन जाती है । हिंदी में साहित्यिक
पत्रों के संकलन कम हैं । लेकिन ‘प्रेमचंद पत्रों में’ मात्र एक पत्र–संकलन न होकर
प्रेमचंद और उनके युग पर जैसे एक दस्तावेजी इतिहास है । पुस्तक की भूमिका में साहित्यकारों
के पत्रों में साहित्य की जो पार्श्वभूमि साहित्य–सृजन के साथ–साथ अंकित होती रहती
है, जिसमें समकालीन साहित्य की जो अंतर्कथा उपलब्ध होती है उसकी विस्तार से चर्चा हुई
है । शिवपूजन सहाय ने अपने साहित्यिक जीवन में न केवल १५–२० हज़ार प्राप्त साहित्यिक
पत्रों को स्वयं संभाल कर रखा था, बल्कि उनके संग्रह और सुरक्षा के महत्त्व को अपनी
कई सम्पादकीय टिप्पणियों में रेखांकित भी किया था ।
अंग्रेजी और योरोपीय भाषाओं में प्रमुख
साहित्यकारों के पत्रों, उनकी पांडुलिपियों, यहां तक कि प्रूफ–शीटों तक को संग्रहालयों
में सुरक्षित रखा जाता है, और उनको नीलामियों में हज़ारों–लाखों पौंड और डॉलर में खरीद
कर लोग और संस्थाएं संरक्षित करती हैं, जिससे उनके यहां के साहित्यिक शोध में अधिकाधिक
पूर्णता और प्रामाणिकता आती है । अमृत राय ने स्वयं प्रेमचंद के पत्रों की खोज–ढूंढ
की अपनी कठिन कहानी ‘चिट्ठी–पत्री’ के दो खण्डों में लिखी है जो उन्होंने प्रेमचंद
की मृत्यु के बमुश्किल २० साल बाद शुरू की थी । प्रेमचंद ने सैकड़ों साहित्यकारों को
हज़ारों पत्र लिखे होंगे, पर ‘चिट्ठी–पत्री’ के दो खण्डों में दो–तीन सौ पत्र ही प्रकाशित
हो सके हैं ।
विदेशों में पत्रों–पांडुलिपियों आदि के
संरक्षण की चेतना बहुत विकसित रही है । वहां के अधिकांश विश्वविद्यालयों के पुस्तकालयों
में साहित्यकारों से सम्बद्ध विविध प्रकार की साहित्यिक सामग्रीµपांडुलिपियां, प्रूफ–शीट,
पत्र, चित्र, आदि पूर्णत: सुरक्षित रखे जाते है । फित्ज़राल्ड पेपर्स
(प्रिंस्टन विश्वविद्यालय), फॉक्नेयर कलेक्शंस (वर्जिनिया विश्वविद्यालय), सॉल्बेलो
प्रकोष्ठ (शिकागो विश्वविद्यालय), ई. एम. फॉर्स्टर प्रकोष्ठ (केम्ब्रिज विश्वविद्यालय) आदि
ऐसे अनेक महत्त्वपूर्ण साहित्यिक संग्रह विदेशों में सुरक्षित एवं शोध–कर्त्ताओं के
लिए सुलभ हैं । ये सब वहां की विश्वविद्यालय–व्यवस्था के अंतर्गत संरक्षित हैं । जिसके
विपरीत हम अपने देश के विश्वविद्यालयों और सरकारी संग्रहालयों की दुरवस्था से भली–भांति
परिचित हैं ।
साहित्यकारों के पत्र, पांडुलिपियां आदि
भी देश और समाज की विरासत का एक महत्त्वपूर्ण अंग होते हैं । विरासत को संभालने की
जिम्मेवारी नयी पीढ़ी की होती है, जब वह उसका महत्त्व समझने लायक हो जाती है । और विरासत
को संभालना ही देश और समाज के प्रति सच्चा कर्त्तव्य–निर्वहन हो सकता है ।
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प्रेमचंद के संस्मरण :शिवपूजन सहाय (अंग्रेजी): vibhutimurty.blogspot.com/2011/05/
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