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Saturday, January 24, 2026

 

‘देहाती दुनिया’ : अनुवाद-प्रसंग

और गौतम चौबे से भेंट

 



गौतम चौबे से मेरा परिचय प्रसंगवश हुआ. प्रसंग था ‘देहाती दुनिया’ का अंग्रेजी अनुवाद. यह ‘देहाती दुनिया’ का शती-वर्ष है: २०२६. सौ वर्ष पहले प्रकाशित आ. शिवपूजन सहाय के इस उपन्यास का एक नया अंग्रेजी अनुवादित संस्करण भी इसी वर्ष प्रकाशित करने की योजना है. इसका अंग्रेजी अनुवाद एक चुनौतीपूर्ण कार्य है. लेकिन मैं अब सारा समय लगाकर इस अंग्रेजी अनुवाद को मार्च तक पूरा कर लूँगा. ‘देहाती दुनिया’ हिंदी का एक विशिष्ट उपन्यास है. अंग्रेजी में अनुवाद से यह और व्यापक प्रसार पा सकेगा. इसी प्रसंग में हाल में गौतम चौबे से मेरा संपर्क हुआ. उनके दो अनुवाद प्रकाशित हुए हैं – एक भोजपुरी के उपन्यास ‘फुलसुंघी’ का, और दूसरा निराला के लघु उपन्यास - ‘बिल्लेसुर बकरिहा’ और कुछ कहानियों का, अंग्रेजी में ‘A Portrait of Love’ (‘प्रेमिका परिचय’) नाम से. उनकी ये दोनों किताबें  पेंग्विन से प्रकाशित हुई हैं. उनका अपना भी एक मौलिक हिंदी उपन्यास ‘चक्का जाम’ राधाकृष्ण प्रकाशन से आया है. उनकी कुछ और भी पुस्तकें प्रकाशित हैं. हिंदी-अंग्रेजी और अनुवाद पर एक साथ ऐसा प्रभूत अधिकार उनकी प्रतिभा की ओर सहसा ध्यान आकृष्ट करता है. जीवन के अंतिम चरण में मेरा-उनका यह सानिध्य एक सहज सौभाग्य ही है. उनके स्वभाव की सौम्यता उनके मुखमंडल से ही प्रभासित होती है. किसी पारिवारिक प्रसंग में जब वे लखनऊ आये तो फोन करके मुझसे एक ‘छोटी सी मुलाकात’ के लिए भी मेरे पास चले आये.

उनकी अंग्रेजी अनुवाद वाली दो किताबें मैंने अमेज़न से पहले ही मंगाई थीं. अपना सद्यः प्रकाशित हिंदी उपन्यास ‘चक्का जाम’ उन्होंने मुझे भेंट में दिया. ‘देहाती दुनिया’ के अनुवाद पर मेरी उनसे संक्षिप्त बातचीत हुई. उनके दोनों अंग्रेजी अनुवाद बहुत सफल और सुन्दर हैं. हिंदी के लेखकों की रचनाओं का अंग्रेजी में अच्छा अनुवाद तो सचमुच बहुत कम हुआ है. गीताश्री के हिंदी उपन्यास ‘रेत समाधि’

का अनुवाद डेज़ी रॉकवेल  ने अंग्रेजी में किया जिसे अनुवाद का बुकर पुरस्कार मिला. पुरस्कारों की अलग राजनीति है, नोबेल शांति पुरस्कार के बाद अब यह बिलकुल स्पष्ट है. लेकिन अंग्रेजी अनुवाद से हिंदी के लेखन को राष्ट्रिय ही नहीं वैश्विक दृष्टिगोचरता मिलती है. उसका आर्थिक पक्ष भी अधिक संपुष्ट हो जाता है. हिंदी के अपने समालोचना क्षेत्र में तो बहुत घालमेल है. हिंदी पुस्तकों के अंग्रेजी में अनूदित होने पर उनकी समालोचनात्मक संभावनाएं भी अधिक पूर्वाग्रहमुक्त हो जाती हैं.

गौतम चौबे के निराला के अनुवाद निराला के कथा-साहित्य पर नयी रोशनी डालते हैं. मेरी समझ में, एक अर्थ में पद्य के अनुवाद से गद्य का अनुवाद अधिक संश्लिष्ट हो जाता है, क्योंकि उसमें शैली के स्वर का महत्त्व अधिक हो जाता है. पद्य में भी मुक्त छंद की स्वायत्तता उसे गद्य-शैली की ओर ही ले जाती है, जैसे ‘कुकुरमुत्ता’ को उसकी पद्यात्मकता के बरक्स भी हम एक गद्य-रचना के रूप में देख सकते हैं, जिसमें निराला की टकसाली गद्य-शैली की स्पष्ट झलक दिखाई देती है. गद्य के अनुवाद में इस शैली के स्वर को ठीक-ठीक उतरना लगभग असंभव होता है. सच कहें तो, त्रिलोचन के हिंदी सानेटों में सानेट की संश्लिष्ट पद्यात्मकता से अधिक गद्यात्मकता के लक्षण दिखाई देते हैं. उनमें पद्य के स्वाभाविक गुण उस तरह नहीं दिखाई देते. लेकिन उनके सानेटों में स्वायत्त गद्य-शैली का एक आभास बराबर बना रहता है; उनमें हर जगह त्रिलोचन की विशिष्ट गद्य-शैली की एक स्पष्ट छाप बनी रहती है, जिससे उनके छंद-बद्ध गीत प्रायः मुक्त लगते हैं. इससे इस बात की पुष्टि होती है कि गद्य में शैली की उपस्थिति प्रखरतर होती है, जिसे अनुवाद में उतारना बहुत कठिन हो जाता है. फलतः हिंदी या किसी अन्य भारतीय भाषा के कथा-गद्य के अंग्रेजी अनुवाद में शैली की गमक इसीलिए वैसी नहीं मिल पाती. उदाहरण के लिए हजारी प्रसाद द्विवेदी के ललित निबंधों के अंग्रेजी अनुवाद में उनकी निबंध-शैली को प्रतिच्छवित करना इसी कारण बहुत कठिन होगा.

अनुवाद एक अत्यंत संश्लिष्ट सृजन-क्रिया है, लेकिन उसका उद्देश्य किसी रचना के मूल-कथ्य को किसी दूसरी भाषा में अधिक-से-अधिक सम्पूर्णता के साथ, एक सामान्य स्वीकृत भाषा-शैली में अभिव्यक्त करना ही हो सकता है | किसी भी रूप-परिवर्त्तन में मूल को परिवर्त्तित रूप में ही देखा-दिखाया जा सकता है, जो सौ प्रतिशत सफल होकर भी एक नवीन भिन्नता ले ही लेगा. इसीलिए किसी अच्छे अनुवाद की एक नई मौलिक कृति के रूप में ही परख होनी चाहिए – वह प्रतिच्छाया न होकर एक स्वतंत्र नवीन कृति जैसी लगनी चाहिए |

‘देहाती दुनिया’ में कथा-गद्य का एक अन्यतम रूप परिलक्षित होता है. उसकी कथा-भाषा एक क्षेत्र-विशेष की बोल-चाल की नवोन्वेषित भाषा है, जो हिंदी उपन्यास-विधा के प्रारंभिक विकास के दिनों की कथा-भाषा से अपनी भिन्नता और नवीनता के बारीकी से देखे जाने की मांग करती है. उसमें सारी मुहावरेबाजी और लोकोक्तियाँ उस अंचल-विशेष के, उन दिनों के ग्रामीण सामाजिक जीवन को आश्चर्यजनक रूप से जीवंत और उजागर करती हैं. सामान्यतः उपन्यासों में कथा-भाषा का कथावस्तु के चरित्र से अनिवार्य सामंजस्य होता है. अर्थात, एक ही लेखक को अपने हर उपन्यास के लिए एक तदनुकूल कथा-भाषा सृजित करनी पड़ती है, जिसमें ही उसका वह कथा-संसार चित्रित हो पाता है. लेकिन महत्त्वपूर्ण यह है कि हिंदी उपन्यास के विकास के प्रारम्भिक दिनों में जब प्रेमचंद – उसी समय हिंदी के सबसे सफल औपन्यासिक - भी अपने उपन्यासों के लिए उर्दू की बोझिलता से मुक्त हिंदी-मुखी एक उपयुक्त कथा-भाषा के निर्माण के लिए संघर्ष कर रहे थे (जिसका प्रमाण है उनके उपन्यास ‘रंगभूमि’ का शिवपूजन सहाय द्वारा उन्हीं दिनों किया जा रहा सम्पादकीय संशोधन, जो प्रेमचंद की उर्दू-प्रधान कथा-भाषा को एक स्वीकार्य हिंदी कथा-भाषा के रूप में ढालने का एक सुचिंतित प्रयास ही है) उसी समय शिवपूजन सहाय अपनी कुछ प्रकाशित कहानियों की अनुप्रास-अलंकृत भाषा से बिलकुल भिन्न एक सुदूरवर्त्ती ग्रामीण क्षेत्र की बोलचाल की भाषा का हिंदी में एक संस्कारित रूप – जो उस क्षेत्र-विशेष के लोगों के लिए स्वीकार्य था – वहां के जीवन को चित्रित करने वाले अपने उपन्यास ‘देहाती दुनिया’ के लिए जैसे कुम्हार की चाक पर एक नये रूप में गढ़ रहे थे. और यह भी उसी समय जब वे ‘रंगभूमि’ का संशोधन भी कर रहे थे. हिंदी औपन्यासिक समालोचना में कथा-भाषा की इस विकास-यात्रा पर, और उसके विशिष्ट शैली-पक्ष पर, अबतक भी संभवतः पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया है. लेकिन गद्य में कथा-साहित्य के अनुवादक के लिए कथा-भाषा का यह प्रश्न विशेष महत्त्वपूर्ण हो जाता है. बच्चनजी की ‘आत्मकथा’ का अंग्रेजी में अनुवाद करने वाले रूपर्ट स्नेल ने अनुवाद में  गद्य-शैली के इस प्रश्न पर गम्भीरता से विचार किया है.

गौतम चौबे के निराला के कथा-साहित्य के अनुवादों को पढ़ते हुए, और इन्हीं दिनों शिवपूजन सहाय की ‘देहाती दुनिया’ का अनुवाद करते हुए, इस प्रसंग में उनसे संपर्क-बातचीत और भेंट-संयोग एक अत्यंत समीचीन घटना थी. इस प्रसंग में मेरी उनसे बातचीत और विमर्श का मेरे लिए बहुत महत्त्व है, और मुझको अपने अनुवाद-कर्म में इससे बहुत लाभ होगा, ऐसा सहज अनुमेय है.

गौतम चौबे इसी ११ जनवरी को लखनऊ से अपनी वापसी में एअरपोर्ट जाते समय १५-२० मिनट के लिए मुझसे मिलने आये. उनकी अंग्रेजी में अनुवाद वाली दो पुस्तकें मैं पहले ही मंगा चुका था, हिंदी का अपना नया उपन्यास ‘चक्का जाम’ उन्होंने मुझको भेंट किया. मैंने देखा २०२४ में प्रकाशित हिंदी के इस छोटे-से उपन्यास का २०२५ में ही दूसरा संस्करण आ गया है. पेशे से अंग्रजी प्रोफ़ेसर एक नए लेखक का यह हिंदी में पहला उपन्यास है जिसका कथा-फलक बिहार के एक अंचल-विशेष का जीवन बड़ी कुशलता और संयम से चित्रित करता है. जिसके कथन में भाषा की चुस्ती-ताज़गी के साथ बुनावट की कारीगरी – अल्बम के उलटते पृष्ठों पर लगे छोटे-छोटे चित्रों के साथ आगे बढ़ती कहानी - कथाकार के भविष्य की संभावनाओं की ओर बार-बार इंगित करती है.

‘फूलसूंघी’ बिहार के एक अल्पज्ञात लेखक पाण्डेय कपिल के भोजपुरी उपन्यास का सुन्दर हिंदी अनुवाद है. उनके पितामह दामोदर सहाय ‘कविकिंकर’(1875-1932) भारतेंदु हरिश्चंद्र की अगली पीढ़ी के साहित्यकार थे, और मेरे पिता के परिचित बुज़ुर्ग साहित्यकार थे. ‘फूलसूंघी’ का कथा-आधार मुजफ्फरपुर की गायिका तवायफ ढेलाबाई और भोजपुरी के कवि-गायक महेंदर मिसिर की प्रेम-कहानी पर आधारित है, जो दोनों वास्तविक जीवन की लोक-कथा के चरित्र थे. भोजपुरी में लिखे गए इस उपन्यास के अंग्रेजी में अनुवाद से एक भूली-बिसरी कहानी आज के अभिजात्य पाठक-वर्ग के लिए प्रकाश में आ गयी है, और अंग्रेजी में अनूदित होने से उसकी पठनीयता और रोचकता सहसा बहुत व्यापक हो गयी है. गौतम चौबे का एक लघु उपन्यास का भोजपुरी से अंग्रेजी में यह अनुवाद एक स्वागतयोग्य प्रयोग है.

लेकिन गौतम चौबे द्वारा अनूदित निराला-कथा-साहित्य में सबसे महत्त्वपूर्ण है निराला के एक लघु-उपन्यास ‘बिल्लेसुर बकरिहा’ और छः कहानियों (‘सुकुल की बीवी’,’ज्योतिर्मयी’, ‘प्रेमिका-परिचय’, ‘क्या देखा’, चतुरी चमार’ और ‘देवी’) का ‘A Portrait of Love’ शीर्षक से अंग्रेजी में सुन्दर अनुवाद. छायावाद-युग के कवियों में – विशेषकर प्रसाद, निराला और महादेवी ने विपुल परिमाण में गद्य-लेखन किया है. उपन्यास, कहानी, संस्मरण, गंभीर समालोचना और पत्रकारिता – इन सभी विधाओं में यह लेखन प्रसरित है. उस युग में – कविता से इतर – इन गद्य-विधाओं में इतना प्रचुर लेखन साहित्य सेवा-भाव के साथ-साथ (विशेषकर निराला द्वारा, जिनकी जीवन-परिस्थितियाँ अत्यंत संघर्षपूर्ण रहीं) जीविकोपार्जन की विवशताओं में भी किया जाता रहा, यद्यपि इनकी कथायें हिंदी के प्रकाशकों की हृदयहीनता के कारण अत्यधिक करुण ही रहीं.

कथा-साहित्य में निराला की तीन प्रकाशित पुस्तकें विशेष उल्लेखनीय हैं – ‘कुल्ली भाट’ (१९३९) ‘बिल्लेसुर बकरिहा’ (१९४१), और ‘देवी’ (१९४८:कहानी-संग्रह जिसमें १० कहानियां हैं, जिनमें ५ यहाँ अनूदित हैं). ‘कुल्ली भाट’ और ‘देवी’ (कहानी-संग्रह) की शेष ५ कहानियों का अनुवाद संभवतः अभी नहीं हुआ है. निराला के समालोचनात्मक-गद्य और पत्रकारिता-लेखन का भी एक अंग्रेजी-अनूदित संचयन साहित्य अकादेमी को प्रकाशित करना चाहिए*. एक ऐसा अंग्रेजी में अनूदित संचयन भी प्रकाशित हो सकता है जिसमें निराला की श्रेष्ठ कवितायें और गद्य-लेखन एकत्र उपलब्ध हों.

‘देहाती दुनिया’ का मेरा अंग्रेजी अनुवाद भी शीघ्र ही पूरा होकर इस शती-वर्ष में ही प्रकाशित हो जायेगा ऐसी आशा है. उस अंग्रेजी अनुवाद का एक छोटा-सा नमूना भी अभी मेरे ब्लॉग पर पढ़ा जा सकता है*. हिंदी-साहित्य के गौरव-ग्रंथों के अंग्रेजी में अनुवाद का यह सिलसिला आगे बढ़ता रहे तो यह हिंदी साहित्य के लिए एक शुभ संकेत है.

*निराला की प्रसिद्ध कविता ‘कुकुरमुत्ता’ का मेरा अंग्रेजी अनुवाद और उस पर अंग्रेजी में मेरी टिपण्णी साहित्य अकादेमी की पत्रिका Indian Literature (#341, May-Jun. 2024) में प्रकाशित हो चुकी है और मेरे ब्लॉग vibhutimurty.blogspot.com (13 May 2024) पर भी पढ़ी जा सकती है.

* देखें vagishwari.blogspot.com (20 Jan 2026)

आलेख एवं चित्र  (C) डा. मंगलमूर्त्ति   

Saturday, January 17, 2026

 

‘देहाती दुनिया’: शती-प्रसंग-१  

[‘देहाती दुनिया’ के प्रकाशन का यह शती-वर्ष है | यह उपन्यास १९२६ में पुस्तक-भण्डार (लहेरियासराय, दरभंगा) से प्रकाशित हुआ था | इसका प्रारम्भिक रूप, कुछ फारमे - कलकत्ता में - १९२२ में छपे थे, पर यह उपन्यास पूरा होकर पहली बार १९२६ में ही प्रकाशित हुआ |  इसकी कहानी शिवपूजन सहाय ने उसकी भूमिका में लिखी थी जो रचनावली और ‘समग्र’ के पहले खंड में छपी है | श्री वीरेंद्र यादव  ने मेरे विशेष अनुरोध पर यह समालोचना लिखी थी जो न्यास द्वारा ‘शिवपूजन सहाय का कथा-साहित्य’ में पहली बार २०२२ में प्रकाशित हुई |

समीक्षक के पास अपनी विचारधारा और अपनी समालोचना-दृष्टि होती है | वह उपन्यास के समय और समाज को अपने समय और सामाजिक मूल्यों की कसौटी पर रख कर परखता है जिसे इलियट ‘इतिहास-बोध’ कहते हैं; इसी में उसकी आलोचनात्मक निर्वैयक्तिकता की पहचान होती है | श्री यादव के लेख को हम इसी परिपेक्ष्य में देख सकते हैं | अपने लेख के प्रारम्भ में ही उन्होंने “उस दौर के प्रारंभिक उपन्यासों की शिल्पगत प्रयोगशीलता के अनगढ़पन” की बात उठाई है | यह हिंदी उपन्यास का प्रारम्भिक दौर था जब हिंदी भाषा स्वयं साहित्य-लेखन के क्षेत्र में उर्दू-फारसी बंग्रेज़ी और बंगला के त्रिकोण की फांस से निकलने की कोशिश में लगी थी, और साथ ही हिंदी उपन्यास के शिल्प-विधान की दिशा भी इस त्रिकोण से प्रभावित हो रही थी | प्रेमचंद जो इस प्रारम्भिक दौर के सबसे प्रतिभाशाली उपन्यास-लेखक थे, उन्होंने कथा-भाषा और कथा-संरचना-शिल्प - दोनों क्षेत्रों में आश्चर्यजनक अग्रगामिता का परिचय दिया था | उन्होंने अपने उपन्यास-लेखन में उर्दू-फारसी, बंगला और अंग्रेजी से प्रभाव-ग्रहण की बात स्वयं स्वीकार की है |

लेकिन प्रेमचंद के बरक्स शिवपूजन सहाय ने जो एकमात्र औपन्यासिक कृति हिंदी साहित्य को दी उसमें – कथा-भाषा और शिल्प: इन दोनों क्षेत्रों में – अभूतपूर्व विलक्षणता दिखाई देती है | और उसमें एक और विशिष्टता यह दीखती है कि उस उपन्यास की कथा-भाषा ही उसकी कथा-संरचना के शिल्प का प्रमुख कारक बन जाती है, या कहें कि ‘देहाती दुनिया’ की कथा-भाषा ही वह उपकरण बन जाती है जिससे उस उपन्यास का कथा-संरचना-शिल्प संघटित होता है | या यह भी कि, उस कथानक की संरचना उस कथा-भाषा के बिना संभव ही नहीं हो पाती | ’देहाती दुनिया’ उपन्यास की इस विशिष्टता की ओर अभी तक ध्यान न दे पाने के कारण ही हिंदी के प्रायः सभी समालोचकों को इस उपन्यास की शिल्पगत-संरचना अटपटी-सी लगती रही है | वास्तव में  ‘देहाती दुनिया’ में भाषा और शिल्प की इस एकमेकता पर अभी तक सूक्ष्म-दृष्टि अनुशीलन हो ही नहीं पाया है |

आशा है एक श्रेष्ठ साहित्यिक कृति के रूप में ‘देहाती दुनिया’ के अनुशीलन पर इस शती-वर्ष पुनर्मूल्यांकन के प्रसंग में और विचार हो सकेगा | श्री वीरेंद्र यादव जी का यह लेख उसी संभावित श्रृंखला की एक कड़ी के रूप में यहाँ प्रकाशित किया जा रहा है | इस श्रृंखला में इस ब्लॉग पर और भी लेख पहले प्रकाशित हो चुके हैं जिन्हें भी आप पढ़ सकते है |]

-मंगलमूर्त्ति                 

‘देहाती दुनिया’: एक सामाजिक कथा वृत्तांत

वीरेंद्र यादव

लगभग एक शताब्दी पूर्व वर्ष 1926 में प्रकाशित आचार्य शिवपूजन सहाय के उपन्यास ‘देहाती दुनिया’ का पुन: पाठ करते हुए जहां उत्तर भारत का ग्राम्य समाज अपनी अंतरंगता में जीवंत हो उठता है वहीं सामाजिक विषमता और कुरूपता की पर्तें भी उद्घाटित होती हैं । स्वीकार करना होगा कि यह आत्मकथात्मक वृत्तांत उस दौर के प्रारंभिक उपन्यासों की शिल्पगत प्रयोगशीलता के अनगढ़पन के बावजूद सजग सामाजिक दृष्टि का साक्ष्य है । यह तथ्य दिलचस्प है कि शिवपूजन सहाय ने यह उपन्यास उस दौर में लिखा था जब वे प्रेमचंद के उपन्यास ‘रंगभूमि’ की पांडुलिपि को दुलारे लाल भार्गव के लखनऊ के प्रकाशन गृह गंगा पुस्तक माला के लिए संपादित कर रहे थे । शिवपूजन सहाय की स्वीकारोक्ति है कि इस पुस्तक को लिखते समय उन्होंने ‘‘साहित्य–हितैषी सहृदय समालोचकों के आतंक को जबरदस्ती ताक पर रख दिया था ।’’ लेकिन उल्लेखनीय यह है कि इस उपन्यास को लिखने की प्रेरणा के मूल में जहां उनके ‘देहाती मित्रों’ का आग्रह था वहीं इसकी कथावस्तु उनके उस ठेठ देहाती माहौल से निर्मित थी जहां ‘अज्ञानता का घोर अंधकार और दरिद्रता का तांडव नृत्य’ था । ‘देहाती दुनिया’ अनजाने ही इस सामाजिक अंधकार और दरिद्रता के कारक तत्वों का भी सुराग देती है । यह औपन्यासिक वृत्तांत एक साथ दो फलक लिए हुए है ।–––एक आत्मकथात्मक तो दूसरा जमींदार बाबू सरबजीत सिंह की रियासत के बहाने सामंती तत्वों की पतन–गाथा । इन दोनों को जोड़ने वाला सूत्र है उपन्यास का वाचक बालक भोलानाथ जिसके पिता जमींदार के दीवान थे और जमींदार का गांव उसका ननिहाल था ।

‘देहाती दुनिया’ उपन्यास के सामाजिक वृत्तांत के केंद्र में वर्चस्वशाली द्विज– जातियां हैं, लेकिन इसके हाशिये पर श्रमशील निम्न जातियों की स्त्रियां और पुरुष अपने सुख–दुख के साथ ग्रामीण सामाजिक संरचना को एक पूर्णता प्रदान करते हैं । उपन्यास जिस रामसहर गांव का कथा वृत्तांत लिए हुए है उसके जमींदार बाबू सरबजीत सिंह पर ब्रह्महत्या का दोष था, क्योंकि उन्होंने एक बीघा खेत के लिए अपने ही गांव के एक ब्राह्मण की हत्या कर दी थी । इसी के चलते उनके पुत्र रामटहल सिंह लंबे समय तक अविवाहित रहे, लेकिन इसकी क्षतिपूर्ति उन्होंने हवेली की गोबर पाथने वाली जवान बुधिया को रखैल बना और उससे तीन बेटियों का उपहार पाकर किया था । अंत में उन्होंने एक बेटी बेचने वाले लुटे–पिटे सजातीय मनबहाल सिंह की बेटी महादेई को खरीदकर पकी उम्र में अपना विवाह भी रचा लिया था ।

मनबहाल सिंह आठ बेटियां पहले ही बेच चुका था, यह उसकी नवीं बेटी थी । इस विवाह से गांव वालों को यह सुविधा हुई कि ‘‘जब कभी बैलों और गाय–भैंसों के घावों में कीड़े पड़ते थे, तब बेटी बेचने वालों के सात नाम लिखकर उनके गले में बांधने के लिए नामों का पता लगाना पड़ता था । पर अब तो केवल ‘मनबहाल सिंह’ का नाम ही काफी था ।’’ बेचारे खेदू कहार को यही कहने के अपराध के चलते बाबू साहब ने पिटवाकर अधमरा कर दिया था । और उसकी पत्नी को भी उनके नौकरों ने नंगा करके डंडों से उसके जवान बेटे के सामने ‘गाय की तरह पीटा था’ । यही हाल बाबू साहब ने पलटू चमार का भी किया था । पर खेदू की तरह पलटू लाचार नहीं था । वह जूतियां गांठकर पेट पालने वाला नहीं था । वह था धर्म–परिवर्तित ईसाईयों का सरदार । अपने समाज में उसकी बड़ी साख और धाक थी । उस पर मार पड़ते ही ईसाइयों के कान खड़े हो गए । वे तुरंत पलटू को बाल–बच्चे सहित अपने अड्डे पर ले गए । खेदू और पलटू के माध्यम से शिवपूजन सहाय ने हिंदू समाज में दलित श्रमशील जातियों की उस दुर्दशा का वृतांत रचा है जो कमोबेश किंचित बदले रूप में आज भी जारी है । लेकिन यहां उल्लेखनीय यह है कि ग्रामीण परिप्रेक्ष्य में दलित जातियों द्वारा ईसाई धर्म परिवर्तन के माध्यम से दलित शुद्धिकरण का जो सकारात्मक विमर्श उन्होंने इस औपन्यासिक कथ्य में समाहित किया है वह तब तक शायद ही किसी उपन्यास में शामिल रहा हो । ‘पलटू को अपनी इज्जत प्यारी थी इसलिए वह अपने बाल–बच्चों के साथ ईसाई हो गया था

। लेकिन खेदू ने जब गांव छोड़ना भी न स्वीकार किया तो उसके बेटों में रोष पनपा कि ‘‘क्या हम लोग कहांर होने से ही इतने गए–बीते हो गए कि हमारी ही आंखों के सामने हमारी स्त्रियां बेईज्जत हो गर्इं, और हम चूं भी नहीं कर सके ?–––क्या हम लोगों को अपनी इज्जत का कुछ ख्याल नहीं है ? जब अछूत भी अपनी इज्जत के लिए प्राण समान प्यारा धर्म छोड़ देते हैं तब हम तो कहार हैं । हमारा गट्टा पाक है । हमारा छुआ पानी तो ब्राह्मण पीते हैं ।”

लगभग एक शताब्दी पूर्व उत्तर भारतीय समाज में शूद्र और दलित जातियों में प्रतिरोध की चेतना का यह कथा–वृत्तांत रचते हुए शिवपूजन सहाय अपने समकालीनों की उस ‘ग्राम्यदृष्टि’ का प्रत्याख्यान कर रहे थे जो ‘अहा ग्राम्य जीवन भी क्या है’ की अतीतगामिता पर टिकी थी । खेदू कहार की घरवाली सोनिया अपने पति के चलते बेटों के साथ गांव छोड़कर कलकत्ता तो न जा पाई, लेकिन उसके मन में यह संताप था कि ‘‘न जाने रामसहर में क्या धरा है । यहां तो दिनभर हाड़–तोड़ मेहनत करने पर भी पेट नहीं भरता । काम कराने वाले बहुत हैं, मगर मजूरी देने की बेर सबकी छाती फटने लगती है । जिस दिन से बाबू साहब ने मारा है, उस दिन से हम लोगों को खाना–पीना भी अच्छा नहीं लगता ।–––दुनिया में काम प्यारा है चाम नहीं ।’’ मेहनतकशों की ग्राम्य जीवन से यह निराशा और पलायनभाव गांधी के उस ‘ग्राम स्वराज्य’ का मिथक भेदन करती है जो भारतीय गांव के उदात्तीकरण पर टिका था । शिवपूजन सहाय यहां अनजाने ही डॉ. अंबेडकर के भारतीय गांव की उस अवधारणा के निकट हैं जिसके अनुसार ‘‘क्या है भारतीय गांव । सिवाय स्थानीयता की बदबू, अज्ञानता की खोह और तंग दिमाग सांप्रदायिकता के ।’’ उल्लेखनीय यह भी है कि जब ‘देहाती दुनिया’ उपन्यास लिखा गया था तब तक उत्तर भारत में अंबेडकर चिंतन की न प्रभावी उपस्थिति दर्ज हुई थी और न ही वे दलित आंदोलन में नेतृत्वकारी भूमिका में थे । सच तो यह है कि अपने समय–समाज के यथार्थ के प्रति शिवपूजन सहाय की पैनी दृष्टि का ही यह परिणाम था कि वे तत्कालीन ग्राम्य समाज की यंत्रणा को हाशिये के समाज की दृष्टि से कथात्मक बना सके थे । तत्कालीन ग्रामीण संरचना को कथ्यात्मक संदर्भ देते हुए शिवपूजन सहाय स्त्रियों के विरुद्ध मर्द–सत्ता की उस लोलुप शोषक दृष्टि का वृत्तांत भी रचते हैं जो जाति, कुल गोत्र का अतिक्रमण करते हुए स्त्री को महज एक भोग्यवस्तु में तब्दील कर देती है । रामटहल सिंह रखेलिन से पैदा अपनी ही बेटियों के सौदागर मनबहाल सिंह की मदद करते हैं तो चोरों का मेठ गुदरी राय अपनी नातिन की उम्र की सुगिया को खरीदकर ब्याह करने का ढोंग करता है । गांव में जब पुलिस का धावा होता तो पुरुष तो भाग निकलते लेकिन स्त्रियां उनकी बहादुरी का शिकार होती हैं ।

अंग्रेजी शासन के उस दौर में समाज का वर्चस्वशाली वर्ग अपने सरकारी पद और रौब का इस्तेमाल कर निम्नवर्गीय ग्रामीणों पर किस तरह अत्याचार और दमन करता था, इसकी एक बानगी उपन्यास के ‘महंगे चने’ शीर्षक अध्याय में कुछ यूं है ।

‘‘रामसहर में दरोगाजी आए हुए हैं । देहात में दारोगा को जो दावत दी जाती है, वह दुनिया में दामाद को भी दुर्लभ है ।–––गांव भर के अहीर अपने–अपने घर से दही के मटके लेकर पहुंच रहे हैं–––जब पिलुआ अहीर दही की एक छोटी मटकी लेकर आया, तब दारोगाजी उसको गाली देते हुए गरजकर बोले  - काहे को सुतुही भर दही लाया है रे ? क्या दामाद को परछने के लिए दही–अच्छत का टीका लगाने आया है ? चला जा सामने से, नहीं तो एक जूता भी नीचे नहीं पड़ेगा । चांद के बाल उड़ा दूंगा । अबकी बार खेत चराई की फौजदारी में फंसाकर सब माल–मवेशी नीलाम करा दूंगा ।’’

पिलुआ के अनुनय–विनय के बावजूद दारोगा जी ने उसकी मटकी फोड़वा दी और अपने घोड़े के लिए एक पसेरी चना वसूलने का हुक्म सिपाही को दे दिया । उपन्यास में पिलुआ अहीर की बेबसी और सिपाही नूर मियां द्वारा उसकी घरवाली की बेईज्जती का वृत्तांत रचते हुए उपन्यासकार ने गरीबी के बावजूद पिलुआ अहीर के स्वाभिमान का जो वृत्तांत रचा है वह लेखक की मेहनतकश वर्ग के प्रति गहरी सहानुभूति के बिना संभव नहीं है ।

स्वीकार करना होगा कि ‘देहाती दुनिया’ ग्राम्य समाज का आंतरिक वृत्तांत जिन सूक्ष्म ब्यौरों, मुहावरों  ओर जीवनचर्या के विस्तार के साथ समाहित करता है वह इसका अंतरंग द्रष्टा हुए बिना संभव नहीं था । अच्छा यह भी है कि शिवपूजन सहाय ने इसे काफी कुछ निस्संगता के साथ प्रस्तुत किया है । वे स्वयं जिस कायस्थ जाति के थे उसके प्रति आलोचनात्मक भाव अपनाने में भी उन्होंने कोई संकोच नहीं बरता । कायस्थ कुल में जन्मे दारोगा का चित्रण उपन्यास में कुछ यूं है,

 ‘‘दारोगाजी के किसी पुश्त में दया की खेती नहीं हुई थी । उनके पिता पटवारी थे । पटवारी भी कैसे ? गरीबों की गर्दन पर अपनी कलम टेने वाले । उनकी कलम की मार ने कितनों की कमर तोड़ दी थी, कितने बिना नाधा–पैना के हो गए थे, कितनों का देस छूट गया था, कितनों के मुंह के टुकड़े छिन गए थे, (एक अन्य प्रसंग में ) तहसीलदार और पटवारी जहां–कहीं जाते हैं नोच–चोथकर खा–चबा जाते हैं । कायथ दीवान ऐसा गंवार नहीं होता । कितने ही दरबारों के दीवान देखते–ही–देखते राजा हो जाते हैं ।’’

उपन्यास के केंद्र में जहां जमींदार रामटहल सिंह हैं वहीं गांव के पंडित पशुपति पांडे और उनका बेटा गोवर्धन भी है ।

“मंदिर के पुजारी हैं पसुपत पांडे । उनके लिए काला अच्छर भैंस बराबर भले ही हो, पर वह माने जाते हैं - बड़े भारी पंडित । आसपास के गांव में वही अकेले अगड़धत्त ज्योतिषी, तांत्रिक, कर्मकांडी और कथक्कड़ समझे जाते हैं । ज्योतिष की पोथियां तो उनकी उंगलियों पर नाचती रहती हैं । तंत्र–मंत्र भी वह चुटकियों में कर डालते हैं । कर्मकांड मानों उनके कंठागर है, और अठारहों पुरान तो मानों जबान पर हैं ।”

पशुपति पांडे के बहाने उपन्यासकार ने धर्म, कर्मकांड और अंध आस्था पर टिके ब्राह्मणवादी पाखंड और कमाई के धंधों को उजागर किया है, तो गोबर्धन के माध्यम से ‘बड़ी डयोढ़ियों’ में परदे के पीछे चल रहे उस अनैतिक खेल का पर्दाफाश भी किया है जिसके चलते ठकुराइन  महादेई को पुरोहित पुत्र  गोबर्धन ले उड़ता है । कुल मिलाकर शिवपूजन सहाय ने ‘देहाती दुनिया’ के बहाने उत्तर भारत के तत्कालीन ग्राम्य यथार्थ को जिस बेबाकी के साथ बेपर्दा किया है वह इसे समाजशास्त्रीय दृष्टि से भी महत्व प्रदान    करता है ।

उपन्यास में स्थानिक बोली–बानी, मुहावरों, कहावतों और लोकोक्तियों आदि का अत्यंत सटीक उपयोग हुआ है । कई औपन्यासिक प्रसंगों और स्थितियों का वर्णन शिवपूजन सहाय ने जिस भाषायी कौशल के साथ किया है वह उनकी अपनी रचनात्मकता है । यहां प्रस्तुत कुछ अंश इसके साक्ष्य हैं –

“भूखे गरीब के पेट की तरह धरती जल रही थी । लू की लपट से ऐसी आंच निकलती थी, मानों नवयुवती विधवा गरम सांस छोड़ रही हो ।” ....‘‘दारोगाजी तसवीर बन गए । उनकी आंखें कामना के कुंड में  तैरने लगीं - लालसा की लहरों के साथ खेलने लगीं । सर के घाव का दर्द भूल गया । मंत्र से बंधे हुए विषधर की तरह वहीं के वहीं खड़े रहे ।’’ ....‘‘सुगिया का नशा खिल उठा । उसके गहनों ने दारोगा जी की पेटी में आराम किया । उनकी शरारतों की बोटी–बोटी फड़कने लगी । पनबट्टा और इत्र की शीशियां खाली हो चलीं । चोर–महल रंग–महल हो उठा ।’’

कहना न होगा कि ‘देहाती दुनिया’ हिंदी उपन्यास की प्रेमंचदयुगीन उस यथार्थवादी लेखन परंपरा की सशक्त कड़ी है जो उन दिनों निर्माण की प्रक्रिया में थी । ध्यान देने की बात यह भी है कि इस उपन्यास के माध्यम से शिवपूजन सहाय ने उस दौर के आदर्शोन्मुखी यथार्थवाद के बरक्स आलोचनात्मक यथार्थ की जिस प्रवृत्ति को अपनाया वही आज हिंदी उपन्यास की मुख्य धारा है । सच है कि बीसवीं शताब्दी के शुरूआती वर्षों के ग्रामीण उत्तर भारत की वास्तविक पहचान जिन साहित्यिक कृतियों से की जा सकती है उनमें ‘देहाती दुनिया’ अनिवार्य रूप से शामिल है । शिवपूजन सहाय द्वारा खिलंदड़े भाव से लिखे गए इस उपन्यास में बाल–दृष्टि और परिपक्व बौद्धिकता का जो सहमेल है उसे हिंदी कथालेखन के उस दौर के नए मुहावरे के रूप में पढ़ा जाना चाहिए । इसमें













कथा–भीतर–कथा के भी सूत्र तलाशे जा सकते हैं । ‘देहाती दुनिया’ को आधुनिक हिंदी उपन्यास की नींव निर्माण करने वाली कृति के रूप में दर्ज कर इसके महत्व को पहचाने जाने की जरूरत आज भी दरपेश है ।

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चित्र (C) डा.मंगलमूर्त्ति 

[‘देहाती दुनिया’ से सम्बद्ध और सामग्री देखें

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(अध्याय १: अंग्रेजी अनुवाद: ८.८.२०१६ / दूधनाथ सिंह का लेख: ११.१.२०२० /                                 मेरा लेख: १७.४.२०२१ / कथा-भाषा: ४.८.२०२३)

 

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              (‘देहाती दुनिया:शती-प्रसंग’:८.८.२०२५)]