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Thursday, September 10, 2026

 

पुण्य-तिथि ५८: ७ सितंबर   

श्रीरामवृक्ष बेनीपुरी

श्रीरामबृक्ष बेनीपुरी का नाम हिंदी के बड़े लेखकों में लिया जायेगा - कई दृष्टियों से हिंदी में मुख्यत: दो तरह के लेखक हुए - एक, जिन्होंने साहित्य के क्षेत्र में मूलत: अपनी रचनाधर्मिता के बल पर कविता, नाटक, कथा साहित्य अथवा समालोचना की परिधि में ही ख्यातिप्राप्त की, और दूसरे वे जिन्होंने राष्ट्रधर्मी साहित्यिक पत्रकारिता के मार्ग पर चलते हुए कविता, कथासाहित्य, आदि में भी अपनी पहचान बनायी एक तीसरी कोटि वैसे लेखकों की भी है जिन्होंने अपना कार्य क्षेत्र मुख्यत: साहित्यिक पत्रकारिता तक ही सीमित रखा, कविता या कथासाहित्य पर उतना या बिलकुल ध्यान नहीं दिया पहली कोटि में प्रेमचंद, निराला, प्रसाद, पन्त, रामचंद्र शुक्ल आदि के नाम लिए जायेंगे लेकिन दूसरी कोटि में बीसवीं सदी में एक प्रमुख जाज्ज्वल्यमान नाम श्रीरामवृक्ष बेनीपुरी का निश्चय ही लिया जायेगा तीसरी कोटि में तो नामों की गिनती भी कठिन होगी और फिर भारतेंदु हरिश्चंद्र जैसे नाम तो सभी श्रेणियों में परिगण्य भी होंगे, और उनमें अतुलनीय भी*

बागमती का बेटा

उत्तर बिहार के लिए बाढ़ की विनाश लीला एक वार्षिक प्रताड़ना है आज भी देश की आजादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा इस क्षेत्र में बाढ़ की विभीषिका से जूझ रहा है हर साल फसलें मारी जाती हैं, लोग डूबतेमरते हैं, मवेशी बह जाते हैं, महामारियां  फैलती हैं, हवाई सर्वेक्षण होते हैं, राहत बंटती हैं, तटबंधों की मरम्मत होती है, और सरकारी खजाने के करोड़ोंअरबों रूपयों का वारान्यारा होता  है

बागमती इसी क्षेत्र की एक नदी है, जिसके कोपक्षेत्र में पड़ता है एक छोटासा गांव - बेनीपुर हर साल बागमती का पानी इस गांव को घेरता रहा है और इसलिए आज से १२७ साल पहले इस गांव के एक गरीब परिवार में जन्मे एक बालक - रामवृक्ष ने आगे चलकर अपनी आत्मकथा में अपने कोबाढ़ का बेटाकहा था

रामवृक्ष बेनीपुरी की मौत करुण परिस्थितियों में हुई लेकिन जीवनभर सामाजिक रूढ़ियों एवं अंधविश्वास से जूझने वाले, जे. पी.  और लोहिया के साथ कंधे से कंधा मिलाकर देश की आजादी की लड़ाई लड़ने वाले बेनीपुरी ने अपनी वसीयत में साफ लिख छोड़ा था कि उनकी मौत के बाद उनके पार्थिव शरीर को बेनीपुर के उनके मकान के सामने जलाया जाए ताकिबाढ़ के बेटेकी इस समाधि को मातृतुल्य बागमती अपने आंचल के पानी से हर साल पखारती रहे आज भी यदि आप बेनीपुर जाएं तो मांबेटे के चिरंतन मिलन का यह दृश्य आपके मन को अभिभूत कर लेगा

पटने सेहिमालयका प्रकाशन हुआ था यह १९४६ की बात है मैं उन दिनों सातआठ साल का था बाबूजी (स्वशिवपूजन सहाय) राजेंद्र कॉलेज, छपरा से साल भर का विशेष अवकाश लेकर बेनीपुरीजी और दिनकरजी के साथ मिलकरहिमालयके संपादन के लिए पटना आकर रहने लगे थे मछुआटोली में कॉरपोरेशनदफ्तर के सामने वाले मकान में हम सब लोग साथ रहते थे बेनीपुरी जी (जिन्हें मैं तभी सेचाचाजीकहने लगा) का मंझला लड़का जित्तिन और मैं, दोनों का नाम चाचाजी ने ही पटना के सेंट जोजेफ कॉन्वेंट में लिखवा दिया इन्हीं दिनों चाचाजी और जित्तिन के साथ मैं पहली बार बेनीपुर गया था

मुजफ्फरपुर से सीतामढ़ी वाली सड़क पर बस से बेदौल उतरकर और वहां से लगभग एक किलोमीटर खेतों की मेड़ों पर चलकर आता है बेनीपुर चाचाजी का तब का वह पुश्तैनी घर कच्ची मिट्टी के एकदो कमरे फूस की टाटियों से घिरा लिपापुता एक आंगन एकाध मवेशी मछलीभात का भोजन मुझको याद है शायद इसी साल चाचाजी ने गांव के बीचोंबीच बहने वाले चौड़े  नाले के पार ऊंची जमीन पर, अपने खेतों  के माथे पर, अपने उस विशालकाय मकान की नींव डाली थी जो उनके हर सपने की तरह अधूरा ही रह गया (और आज तो वह एक अकेला मकान रह गया है वहाँ) अपने समय में अपनी रचनाओं की रायल्टी से उतना बड़ा अधूरा मकान बनाने वाले वे शायद अकेले दुस्साहसी साहित्यकार थे उस मकान के सामने जो पोर्टिकोनुमा मंडप उन्होंने बनवाया था - सब अपनी ही डिजाइन के मुताबिक - उसके विषय में भी उनका सपना था कि अंतत: उसका उपयोग एक रंगमंच के रूप में होगा, जिस पर उनके नाटक खेले जाएंगे !

वह सब तो नहीं हुआ सपने जो अधूरे थे, फिर वे और भी टूटे समाजवाद का सपना, आजादी की खुशहाली को गांवों में पहुंचाने का सपना, साहित्य और कला के माध्यम से एक समग्र सांस्कृतिक क्रांति की कल्पना - धीरेधीरे ये सब सपने टूटतेबिखरते गये

सदा ही यह कामना रही कि माता के इस सुनहले अंचल को फिर एक बार पूर्वकाल की तरह चमकतादमकता देख पाऊं इस दिशा में जहां तक बन पड़ा, अपने किया और मित्रों को प्रेरित करता रहा किंतु जब हमारी पीढ़ी चलाचली की तैयारी में है - तो प्राय: ही उत्सुकता से देखा करता हूं कि हमारी पीढ़ी के बाद के वे लोग कहां हैं जो हमारे इस अधूरे सपने को पूरा करेंगे

मैं अपनी कल्पना की आंखों से देख रहा हूं वह युग, जब उस समाज की स्थापना हो सकेगी, जिसे मैं गुलाब की दुनिया कहता हूं गुलाब की दुनिया - जहां गेहूं हमारे पेट पर, पीठ और सर पर भी सवार होगा दुनिया के सबसे बड़े पाप -  भूख पर जब हम विजय प्राप्त कर चुके होंगे - जब हमारे हाथों में पंख बंधे होंगे हमारी निर्बाध गति होगी - जल पर, थल पर, आकाश पर जब हम नई खेती करेंगे, नई पुरी बसाएंगे ऐसी खेती, जिसमें फूल होंगे, फलियां होंगी -जिन पर तितलियां तेरैंगी ओर भौंरे गूंजेंगे ऐसी पुरी जहां सब समान होंगे, संपन्न होंगे, सुखी होंगे, सानंद होंगे यह मेरा ही सपना नहीं है, सारे देश का सपना यही है

 

बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन के बाइसवें (आरा) अधिवेशन (१९५१) के सभापति श्रीरामवृक्ष बेनीपुरी के ये शब्द - उत्कर्ष के शिखर को पार करके ढलान पर उतरते हुए हिंदी साहित्य के अप्रतिम शब्दशिल्पी की आंखों का झिलमिल सपना! ‘बालक’, ‘युवक’, ‘जनतासेहिमालयतक की पत्रकारिता यात्रा के बादनई धाराके रूप में प्रवाहित होने वाली चिंतनसलिला माटी की मूरतेंऔरअंबपालीजैसी अमर कृतियों के बादगेहूं और गुलाब’, ‘जयप्रकाश की विचारधाराऔरकार्ल मार्क्सके प्रणेता का उद्घोष

आज वह स्वप्नद्रष्टा साहित्यकार अमरत्व की चिरनिद्रा में सोया है - वहीं जहां उसका पार्थिव शरीर अपने गांव की पावन मिट्टी में मिलकर एक हुआ - उसी अधूरे सपने जैसे मकान के पहलू में, अपनी कल्पना के रंगमंच के सामने, जहां नाटककार खुद अपनी कृति का दर्शक बन चुका है और वहीं सिरहाने खड़ा है वह मौलिश्री का वृक्ष जिसकी कुछ डालें झुलस कर ठूंठ हो गई हैं, उस चिता की लपटों से जिसमें वह नश्वर काया समाहित हुई चुपचाप खड़ा है यह मौलिश्री वृक्ष, अपनी शेष छायादार डालों में, इस चिरनिद्रानिमग्न अमर कलाकार को छांह देता यही है वह वृक्ष जिसे उनकेभैयाशिवपूजन सहाय ने अपने हाथों रोपा था, उनके ही आग्रह पर । (आज वह एक निर्जन स्थान है, क्योंकि बाढ़ कि विभीषिका के बरक्स अब बेनीपुर वहाँ से थोड़ा हट कर बस है, जहां बेनीपुरीजी कि आदमकद प्रतिमा  अब लग चुकी है।)

आज उस मूल निवास-स्थान पर बागमती अपने आंचल से अपना आंसू पोंछ रही हैं अपने इस बेटे - बाढ़ के बेटे - की समाधि को पानी के अपने आंचल से पखार रही है, और वहीं कल्पना के उसी रंगमंच के आगे, सिर झुकाये खड़ा है वह मौलिश्री वृक्ष - बागमती के इस बेटे को अपनी स्नेहिल छाया में समेटे पर साल और हर साल बागमती का पानी आकर अपने अमर बेटे कि स्मृति को इसी तरह दुलराता रहा है।

क्रांतिकारी पत्रकार

भारतवर्ष में अंग्रेजों के विरुद्ध स्वतंत्रतासंग्राम का इतिहास क्रांतिकारिता और बलिदान की एक लंबी महिमामयी गाथा है सन् १८५७ में स्वाधीनता की पहली क्रांति से जो धारा फूटी उसकी लहरों से भारत की एक शताब्दी का इतिहास प्रभावित होता रहा सत्याग्रही महात्मा गांधी ने दक्षिण अफ्रीका में प्रवासी भारतीयों के समर्थन में अंग्रेजों के विरुद्ध सत्य और अहिंसा का प्रयोग करके जो अनुभव बटोरे थे उनकी पोटली लेकर वे भारत में भी अहिंसात्मक क्रांति से अलख जगाने लगे और कांग्रेस ने १९२० में असहयोग आंदोलन प्रारंभ कर दिया टॉलस्टाय और थोरो के सत्य और अहिंसा के समानांतर सिद्धांत भारतीय स्वाधीनता संग्राम का संचालन करने लगे क्रांति के इस दौर में भी पत्रकारिता उसके साथ रही गांधी एक लोकनेता के साथसाथ क्रांतिकारी पत्रकारिता की भूमिका भीयंग इंडियाके संपादक के रूप में निभाने लगे थे और उसी के तीन लेखों के आधार पर उन्हें राजद्रोह के अभियोग पर १३ मार्च १९२२ को गिरफ्तार कर लिया गया इससे अहिंसात्मक क्रांति के एक दौर पर पटाक्षेप हुआ और असहयोग क्रांति के इसी दौर में बिहार में एक युवा पत्रकार उभरा - रामवृक्ष बेनीपुरी

कुछ दिनों तक असहयोग की आंधी में देहातदेहात की खाक छानता एक दिन मैं मुजफ्फरपुर आया वहां अपने श्रद्धेय गुरूवर पं.  मथुराप्रसाद दीक्षित से भेंट हुई, जो असहयोगी बनकर पटना से एक पत्र का संपादन कर रहे थे उन्होंने मुझे अपना सहकारी बनाने का प्रस्ताव रखा मैं उनके पीछे हो लिया (नई धारा, नवंबर, १९५४)

यह साहित्यिक पत्र थातरुण भारत, जिसमें अधिकतर सामग्री गांधीजी केयंग इंडियासे अनूदित प्रकाशित होती थी बेनीपुरी के क्रांतिकारी पत्रकार जीवन का प्रारंभ पटने से प्रकाशित इसी साप्ताहिक से हुआ था ‘‘इस जीवन में बहुत से काम मैंने लाचारी में किये, किंतु पत्रकारिता को मैंने अंत:प्रेरणा से अपनाया था, इसमें तनिक संदेह नहीं ’’

बेनीपुरी का व्यक्तित्व मूलत: एक क्रांतिकारी साहित्यकार का व्यक्तित्व था पैंतीस वर्षों का उनका पत्रकार जीवन (देखेंनई धारा’, अगस्त ५६मार्च५७) बिहार में क्रांतिकारी पत्रकारिता का एक इतिहास प्रस्तुत करता है तरुण भारतके बाद बेनीपुरी के पत्रकार जीवन के अगले चरण थेकिसान मित्र’ (मुजफ्फरपुर) ‘गोलमाल’ (पटना) औरबालक’ (लहेरियासराय) बेनीपुरी की क्रांतिकारी पत्रकारिता का दूसरा चरणयुवकसे प्रारंभ हुआ जोयुवक आश्रम’, पटना से निकलता था

युवक आश्रम की हमलोगों की (मेरी और मेरे पुराने परिचित श्री गंगाशरण सिंह की) जिंदगी बिल्कुल साधना की जिंदगी थी वहीं हम दोनों साइंस कालेज के सामने एक खपरैल मकान में रहते, जमीन पर सिर्फ चटाई बिछाकर सोते, सादा खाना खाते, दिनरात काम में पिले रहते सोने का, प्रार्थना का, खाने का समय निश्चित था बर्तन खुद साफ किए जाते, अपनी थाली खुद मांजी जाती जाड़े में हम दोनों एक ही ओढ़ने के नीचे सो जाते एक अजीब ढंग के जुनून में हमारे दिन कट रहे थे (नई धारा, अक्टूबर, ५६)

युवकका पहला अंक जनवरी १९२९ में प्रकाशित हुआ था पहले बेनीपुरी नेबालककार्यालय’ (लहेरियासराय) से हीयुवकनिकालने की बात सोची थी, किंतु कई कारणों से उन्हेंबालकछोड़ना पड़ा और तब ‘‘जिस कलम दवात से मैंनेबालकका इस्तीफा लिखा, उसी से उसी वक्तयुवकनामक एक मासिक पत्र निकालने की सूचना भी मैंने लिख ली ’’ (नई धारा, सितं५६) ‘‘ ‘युवकको निकालने के लिए मुझे फिर राजनीति में आना पड़ा जो मासिक पत्र अपने को शक्ति, साहस और साधना का मुखपत्र घोषित करे, उसका संपादक उस युग में अपने को राजनीति से अलग कैसे रख सकता था ’’ (नई धारा, जुलाई५४)

परवाह से बेनीपुरी का कोई नाता था बेनीपुरी हमेशामनुआ बेपरवाहरहे बेनीपुरी के पास हथकड़ी से डरने वाली कलम थी

युवकके प्रकाशन का अर्थशास्त्र कुल एक हजार की प्रारंभिक पूंजी से शुरू हुआ जो गंगाशरण सिंह और कुछ बेनीपुरी के (पत्नी के आभूषण बेच कर) रुपयों से जोड़जाड़कर पूरा हुआ था लेकिनयुवकने अपनी क्रांतिकारी पत्रकारिता की धूम मचा दी बेनीपुरी ने आचार्य शिवपूजन सहाय कोयुवकके संबंध में लंबा पत्र लिखा जिसके अंत में लिखा - ‘‘यों तुम्हारायुवकअच्छी तरह जा रहा है हां, पुलिसवाले जरूर पीछे पड़े हैं आगे से जरा सावधानी से कलम चलाने की कोशिश करूंगा भगवान मालिक है कहां तक संसार की परवाह की जाए ’’ (२८२९, पटना से काशी )

स्वभावत: ही मैं राजनीति में सदा उग्रवादी रहा अपने लेखों में मैंने सदा उन बलिपंथियों की प्रशंसा की जो राजनीति के इस दूसरे रूप के सुगम मार्ग को छोड़कर सदा अपनी जान हथेली पर लिए घूमा किये और गांधीजी के तपस्या मार्ग पर चला किये (नई धारा, ’५४)

जब गांधीजी डांडीयात्रा पर निकले, बेनीपुरीसंपादितयुवककाविप्लव अंक’ (मार्च३०) बड़े सजधज के निकला इसका पहला लेख थाइनकिलाब जिंदाबादऔर लेखक थे पंजवाहरलाल नेहरू -

और आज वह तीर्थयात्री अपनी लंबी यात्रा में निकल चुका है हाथ में लकुटिया लिए, गुजरात की धूलिभरी सड़कों पर से, वह गुजर रहा है उसका लक्ष्य स्पष्ट है, उसके पैर दृढ़ हैं तीर्थयात्री बढ़ रहा है - बढ़ रहा है, और तुम भारत के युवकों और युवतियों, तुम कहां जा रहे हो ? समरभूमि तुम्हारे सामने है, भारत का झंडा तुम्हें बुला रहा है, अरे, स्वयं स्वाधीनता देवी तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही है तुम इस यशस्वी संग्राम के दर्शक मात्र रहोगे, छूछी डिग्रियां और तुच्छ ऐशोआराम लेकर जंजीरों में फंसे रहोगे ? कौन जिंदा रहेगा, अगर भारत रहा, और अगर भारत रह गया, फिर कौन मरता है

बेनीपुरी १६ अप्रैल, १९३० को गिरफ्तार कर लिए गये युवककाविप्लव अंकजब्त हो गया बेनीपुरी पटना और हजारीबाग जेल में : महीने रहकर अक्टूबर में रिहा हुए और तेरह महीने बादयुवकसरकारी जब्ती से मुक्त हुआ मई, १९३१ में फिरअजातशत्रुकल्पित नाम से अग्रलेख लिखने के लिए तथाआजादी के दीवानेसरदार भगत सिंह श्रीराजगुरू और श्रीसुखदेव के चित्रों के प्रकाशन पर वारंट जारी किया गया बेनीपुर कलक्टर के बंगले पर हाजिर हुए कलेक्टर मिस्टर रामजगमोहन के इजलास में मुकदमा चला जिसमें बेनीपुरी ने बयान दिया

यह लेखक आजकल के सामाजिक संगठन का विरोधी है, यह संगठन सड़ियल और जड़ से निकम्मा हो चुका है यह मनुष्य को पशु और पतित बनाता है धन की भयानक विषमता इसने पैदा कर दी है धनी दिनदिन धनी होता जाता है, और गरीब पलपल गरीब, और कुछ इधरउधर के सलाहसुधार से काम नहीं चलेगा क्रांति अब अनिवार्य है कुछ कांटछांट, घटावबढ़ाव से कुछ होनाजाना नहीं, आवश्यकता है पूर्ण और आमूल परिवर्तन की

बाबू बलदेव सहाय ने जोरदार बहस की फिर भी बेनीपुरी को डेढ़ साल की सजा मिल गई हाईकोर्ट में अपील हुई, लेकिन सजा बहाल रही और जनवरी, १९३२ से जनवरी, १९३३ तक बेनीपुरी ने हजारीबाग और पटना कैंप जेल में बिताए

पत्रकारिता क्रांति की सहेली है पत्रकारिता ही बेनीपुरी को क्रांति की ओर खींच लाई ओर फिर तो तीनों ने मिलकर एक ऐसा क्रांतिकारी साहित्यकार निर्मित किया जिसने पत्रकारिता को साहित्यिक स्तर दिया, साहित्य को क्रांति का स्वर दिया और क्रांति को मानवमूल्यों से मंडित किया

बेनीपुरी की क्रांतिकारी पत्रकारिता का तीसरा चरण था साप्ताहिकदैनिकजनतायुवकके बंद होने के बाद बेनीपुरी नेलोकसंग्रह’ (मुजफ्फरपुर), ‘कर्मवीर’ (खांडवा) औरयोगी’ (पटना) का संपादन भी किया किंतु उनके सघनतम राजनीतिक जीवनकाल की पत्रकारिताजनतामें अपने शिखर पर पहुंच गई

बेनीपुरी मूलत: साहित्यकार थे, लेकिन उनके पूरे साहित्य पर उनकी क्रांतिकारी पत्रकारिता का प्रभाव स्पष्ट है बिहार में हिंदी पत्रकारिता को राजनीति से सीधे जोड़कर भी बेनीपुरी ने उसके साहित्यिक स्तर को निरंतर श्रेष्ठ रखा, यह एक महान उपलब्धि मानी जानी चाहिए

तस्वीरें बोलती हैं

बेनीपुरी जी के जन्मशती वर्ष (१९९९२०००) में ही उनके कनिष्ठ पुत्र महेंद्र बेनीपुरी ने अपने यशस्वी पिता की प्राय: सभी पुस्तकों का नवीन संस्करण प्रकाशित करने का निर्णय लिया और मुझ से भी सहयोग मांगा इसी सिलसिले मेंबेनीपुरी चित्रावलीपुस्तक २०१२ में प्रकाशित हुई जिसकी मेरी लिखी भूमिका उसमें प्रकाशित हुई और पुस्तक के चित्रों में कहींकहीं मैं भी हूं और इस पुस्तक के  बहुत सारे चित्र तो मेरे खींचे हुए हैं ही

सचमुच ये तस्वीरें बोलती हैं एक कहानी कहती हैं - एक कभी नहीं खतम होने वाली कहानी एक ऐसे जीवन की कहानी जो माटी की मूरतों से बनी है जिसमें हर तरह की मूरतें हैं जिनकी स्निग्ध मिट्टी में गांव की सोंधी सुगंध रसीबसी है और इन तस्वीरों में, इन बोलती तस्वीरों में, आपको उसी कलाकार के जीवन की झांकियां दिखाई देंगी जिसके हाथों ने उन मूरतों को गढ़ा है, जिनकी आकर्षक कतार उसके साहित्य में सजी है वही साहित्य जिसमें तरहतरह की मूरतें, हर तरह की सूरतें - मूरतों और सूरतों का एक मेला, अपने में भरापूरा एक नया संसार, एक पूरी दुनिया, जिसमें आप गांवों में बसी भारत की आत्मा देख सकेंगे, और जिसमें संपूर्ण मानव जीवन अपनी पूरी संश्लिष्टता और विविधता में चित्रित मिलेगा - कहानियों में, उपन्यासों, नाटकों, शब्दचित्रों और संस्मरणों में, यात्राप्रसंगों और डायरी के पन्नों में, साहित्यिक निबंधों, आत्मकथा, जीवनी, बालसाहित्य आदि सभी विधाओं में

उसी जनसंकुल जीवन की कुछ झांकियां दिखाई देंगीं आपको इन तस्वीरों में भी एक ऐसे जीवन की बिखरी हुई कुछ तस्वीरें, जिनमें आप रूबरू हो सकेंगे उस अलम शख़्सयत से जो अपने समय में हिंदी के सर्वश्रेष्ठ शब्दशिल्पी के रूप में सर्वमान्य रहा - और आज भी हिंदी साहित्य में उसका वह शब्दशिल्प अन्यतम और अमर है राजनीति को भी उसने जीवन का एक अनिवार्य अंग माना, क्योंकि कला जीवन से जुड़ी है, जैसे जीवन समाज से, और वैसे ही समाज राजनीति से राजनीति - जो सत्ता के लिए नहीं, बल्कि जीवन और समाज के धरातलीय यथार्थ से जुड़ने के लिए होती है कला और साहित्य ही तो राजनीति को परिवर्त्तनशील बनाते हैं, उसे संतुलन और समन्वयशीलता की राह दिखाते हैं

‘बेनीपुरी चित्रों में’ पुस्तक के चित्रों में जिस साहित्यनायक का जीवन चित्रित है, मेरा सौभाग्य रहा उसकी वात्सल्यछांह में बढ़नेपनपने का मेरे पिता आचार्य शिवपूजन सहाय के अभिन्न समानधर्मा होने के नाते, और दोनों परिवारों के लंबे साहचर्य के कारण, बेनीपुरीजी शुरू से मेरे लिएचाचाजीही रहे प्रकाशित चित्रों में तो बहुतेरे चित्र मेरे ही खींचे हुए हैं, और उन सबके साथ मेरी भावभीनी स्मृतियां जुड़ी हैं ख़ासकर बंबई यात्रा में पृथ्वीराजजी के माटुंगानिवास पर लिये, और मेरीन ड्रइव पर समुद्र के किनारे बैठे उनके चित्रों के साथ तो अविस्मरणीय प्रसंग जुड़े हैं उसी प्रकार दिल्ली में खेले गये उनके अमर नाटकअंबपालीसे संबंधित सभी चित्रों के साथ भी बहुत सारी भावनात्मक स्मृतियां जुड़ी हैं दिल्ली में प्रदर्शन से पूर्वअंबपालीके दो मंचन पटने में ही हुए थे मैं उस नाट्यदल की पार्श्वसंगीत मंडली का वंशीवादक सदस्य था साथ ही मैं उस दल का पटने से ही निर्दिष्ट छायाकार भी था दिल्ली से वापसी में हमारा दल आगरा के ताजमहल को देखने के लिए कुछ घंटे वहां रुका था वे सब तस्वीरें इस पुस्तक में छपी हैं इसी तरह मैं चाचाजी के साथ पहले पूना गया था जहां वे अच्युत पटवर्द्धन के छोटे भाई पामा पटवर्द्धन के यहां ठहरे थे फिर हमलोग खड़गवासला सैनिक अकादमी में भी गये, जहां उनके मंझले बेटे और मेरे बालमित्र जित्तिन (जितेंद्र बेनीपुरी) का पासिंगआउट समारोह था वापसी में हम सभी लोग - जिनमें जित्तिन का वह सेनासहपाठी ओमप्रकाश शुक्ला भी शामिल था, बाद में जो १९६२ वाले चीनयुद्ध में वीरगति को प्राप्त हुआ। हमलोग बंबई में कालबादेवी में महंथ मुकुंद गोस्वामी के यहां ठहरे थे, और बंबईभ्रमण के क्रम में मैंने मेरीन ड्राइव वाले वे चित्र खींचे थे उसी संध्या में हम लोग मुकुंद गोस्वामी के साथ उन्हीं की मोटरकार से पृथ्वीराज जी से मिलने उनके माटुंगानिवास पर गये थे, जब वह अविस्मरणीय चित्र मैंने लिया था जिसमें पृथ्वीराज जी और बेनीपुरी जी सपलीक उपस्थित हैं

बेनीपुर से जुड़ी भी मेरी अनेक मधुर स्मृतियां हैं वह मेरे लिए बिलकुल अपना ही गांव था मैं अक्सर छुट्टियों में जित्तिन के साथ वहां जाता था जित्तिन के साथ मेरी दोस्ती १९४६ में शुरू हुई जब बाबूजी और चाचाजी पटने में मछुआटोली मुहल्ले में एक ही मकान में रहते हुए प्रसिद्ध साहित्यिक मासिकहिमालयका संपादन कर रहे थे मुझे याद है पहली बार १९४६ में ही मैं चाचाजी, देवेंद्र भैया और जित्तिन के साथ बेनीपुर गया था चाचाजी अलग गांव के मुहाने पर अपना नया मकान बनवा रहे थे, और कुछ दिनों के लिए गांव में एक झोंपड़ीनुमा मकान में उनके परिवार का बसेरा था यही वह बेनीपुर था जो चाचाजी के नाम के साथ जुड़कर हमेशाहमेशा के लिए इतिहास में अमर हो गया एक छोटासा गरीब किसानमजदूरों का गांव केवल कुछ ही घर मध्यवर्गीय किसानों के गांव की एक छोर पर किनारे बहता नहर का एक सोता – उन्हीं दिनों चाचाजी का नया मकान ठीक उसके पार सटे उंची जमीन पर अपने खेतों के बीच बन रहा था

सरसों के खेतों के बीच इठलाता हुआ वह भारत के किसी गांव की तरह ही एक गांव था - बेनीपुर गांव के चारों ओर हरियाली - गेंहूं, मक्के और सरसों के हरेपीले छींटदार फैलेफैले खेत, पुरवैया में थिरकतेलहराते नहर के सोते में नाव पर झिंझरी और सैर हमारा दैनिक कार्यक्रम होता मछलियां पकड़ी जातीं और सुशीला भाभी - देवेंद्र भैया की पत्नी - उन्हें बड़े चाव से पकातींखिलातीं मेरे कुछ सबसे सुखावह दिन बेनीपुर में बीते हैं, और उनकी स्मृतियों की मिठास अब मेरे मन से कभी नहीं मिटने वाली

लेकिन बाद में मैंने सुना था एक सरकारी बांध बनने वाला था किसी बागमती योजना के तहत और अब तो वह सारा गांव ही हर साल बाढ़ में जलसमाधि में डूब जाता है पूरे बेनीपुर गांव को अब वहां से हटाकर कुछ दूरी पर नये सिरे से बसाया जा चुका है पुराना बेनीपुर अब बागमती की धारा में विलीन हो चुका है वह विशालकाय मकान भी जिसे चाचाजी अपना स्मारक कहा करते थे - और उसके पोर्टिकों के सामने बना उनका वह वास्तविक स्मारक भी, जिस पुण्यस्थली पर उनका पार्थिव शरीर अग्नि को समर्पित किया गया - सब अब बागमती की गोद में समा चुका है चाचाजी के निधन के कुछ दिनों बाद भी जब एक बार मैं बेनीपुर गया था तो मैंने देखा था मौलिश्री का वह पेड़ जिसे कभी मेरे पिता ने वहाँ रोपा था -  जिसके नीचे ही (उनकी इच्छा के अनुसार) चाचाजी की चिता जलाई गई थी -  उस मौलिश्री की कुछ डालें चिता की आग से हमेशा के लिए झुलसी दीख रही थीं वहां अब चाचाजी की एक प्रस्तरप्रतिमा लगी थी और मौलिश्री की झुलसी डालें जैसे शोकदग्ध होकर उस प्रतिमा को अपनी छांव देने की कोशिश कर रही थीं

चाचाजी ने अपनी छोटीसी आत्मकथा का नाम दिया था - बाढ़ का बेटा

बाढ़ का बेटा - जो तरंगों पर खेले, तरंगों पर चले, तरंगों पर बढ़े जिसे धारा से प्रेम हो, प्रवाह से प्रेम हो, गति से प्रेम हो जो किनारों को नहीं माने, सीमाओं को नहीं माने, बंधनों को नहीं माने जिसे ढूहों को गिराने, बड़ेबड़े वृक्षों को उखाड़ने, बड़ीबड़ी नावों को डुबाने में मज़ा आवे जो अनियंत्रित हो, उच्छृंखल हो, मौजी हो

और आप देखिए, इन्हीं चंद शब्दों में अंकित हो गई है वह आत्मकथा आज प्रकृति की इस लीला में बाढ़ का वह बेटा ख़ुद बाढ़ में समा गया; प्रकृति से एकाकार हो गया अमर हो गया

मैं वैसे कुछ सौभाग्यशाली लोगों में हूं, जिसने केवल बाढ़ के उस बेटे को इन्हीं आंखों से देखा था, बल्कि उसका पितृवत् वात्सल्य भी पाया।  उसकी लेखनी देखी, लिखना देखा, उसकी अमर कृतियों को पढ़ागुना और उनसे सीखा उसकी वह जन्मभूमि भी देखी जहां यह बाढ़ का बेटा जन्मा, और जिसकी मिट्टी से इसने ऐसी मूरतें गढ़ीं जिनमें आप उस सृजनहार की झलक देख सकते हैं

बेनीपुरीजी के संपर्क में मैं अपने बचपन से ही रहा - अपने पिता के कारण हिमालयका प्रकाशन १९४६ में पटना से हुआ था और मेरे पिता छपरा के राजेंद्र कालेज से एक साल के विशेष अवकाश पर पटना गए थे तब श्रीबेनीपुरी और श्रीदिनकर के साथ वेहिमालयका संपादन करने लगे थे बाद में श्रीदिनकर तोहिमालयसे हट गए, लेकिन मेरे पिता और श्रीबेनीपुरी मिलकर लगभग एक साल तकहिमालयका संपादन करते रहे

हिमालयका प्रकाशन अज्ञेयजी के द्वैमासिकप्रतीकसे भी लगभग सालभर पहले शुरू हुआ था और संभवत: साहित्य का वैसा कोई मासिक पत्र हिंदी ही नहीं किसी अन्य भारतीय भाषा में भी तब नहीं निकला था एक मासिक पुस्तक के रूप में बेनीपुरीजी द्वारा जेल में ही कल्पित श्रेष्ठ समकालीन साहित्य का वैसा अनूठा कोई संकलन हिंदी में तो बिलकुल पहली बार प्रकाशित हुआ था उसके विज्ञापन में बेनीपुरीजी ने लिखा

हिमालयहिंदी मासिक साहित्य में अनोखा प्रयोग था सौ पृष्ठ, बढ़िया कागज, सुंदर छपाई, पक्की जिल्द, एकएक अंक एक स्वतंत्र पुस्तकसा लगता था फिर भीतर जो सामग्री हम प्रस्तुत करते थे, वह भी अनूठी होती थी हिंदी संसार ने उसे दिल खोलकर अपनाया पहला अंक हमने तीन हजार छपवाया थाय तुरत ही उसका दूसरा संस्करण करना पड़ा हिंदी के मासिक साहित्य के लिए यह एक अभूतपूर्व घटना थी

हिमालयमें रचनाकार का नाम बड़े टाइप में और उसके नीचे रचनाशीर्षक छोटे टाइप में छपता था सभी अंक उस युग के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण लेखकों की रचनाओं से समृद्ध रहे पहले ही अंक से डॉराजेंद्रप्रसाद की हाल में जेल में लिखी गईआत्मकथाअपने मूल रूप में छपने लगी बाद में शिवपूजन सहाय के संपादन के पश्चात १९४७ में वह स्वतंत्र रूप से पुस्तकाकार प्रकाशित हुई हिमालयके कुछ अन्य महत्त्वपूर्ण लेखकों के नाम थे - जयप्रकाश नारायण, जिनकी दो छोटी कहानियां बस यहीं प्रकाशित रहीं, आचार्य नरेंद्रदेव, हरिवंश रायबच्चन’, डॉ.  रामकुमार वर्मा, डॉ.  देवराज, ब्रजरत्न दास, और राय कृष्णदास, ‘प्रसादपर जिनके संस्मरणों की श्रृंखलाहिमालयके पृष्ठों में ही प्रकाशित अपूर्ण रह गई और जेल में हाल में लिखीं बेनीपुरी की सभी श्रेष्ठ रचनाएं प्रत्येक अंक में - जिनमें दो बाद मेंमाटी की मूरतेंऔरअंबपालीके रूप में प्रकाशित हुई साथ ही समकालीन अन्य सभी साहित्यिकों -  दिनकर, ‘प्रभात’, जानकी वल्लभ शास्त्री, नलिनविलोचन शर्मा, हंसकुमार तिवारी, जगदीशचंद्र माथुर, प्रभृति की नईनई रचनाएं

हिमालयपटना में गोविंद मित्रा रोडस्थितपुस्तकभंडारसे निकलता था और मछुआटोली में वह बड़ासा मकान था जिसमें शिवजी और बेनीपुरीजी साथ रहने लगे थे मैं और जित्तिन (जितेंद्र)भी वहीं साथ ही रहते थे मेरे बचपन में ही मां के मर जाने से मैं बराबर अपने पिता के साथ ही रहता था लेकिन इस व्यवस्था का जल्दी ही अंत हो गया संपादकीय नीतियों और रचनाकारों को दिए जाने वाले पुरस्कारों को लेकर प्रकाशक से मतभेद के कारण पहले बेनीपुरीजी और उसके कुछ ही बाद शिवजीहिमालयसे अलग हो गए पत्रिका भी उसके बाद सालभर किसी तरह टुकदुम चलकर बंद हो गई इस दुर्भाग्यपूर्ण प्रसंग से जुड़े कुछ महत्त्वपूर्ण पत्रशिवपूजन सहाय साहित्य समग्रके दसवें खंड में प्रकाशित हुए हैं। शिवजी फिर छपरा लौट गए और मैं भी अब वहीं छपरा के एक स्कूल में दाखिल हुआ जित्तिन भी सैनिक एकेडमी, देहरादून में पढ़ने चले गए बेनीपुरीजी फिर समाजवादी पार्टी की राजनीति में मसरूफ हो गए

मेरे पिता १९५० से फिर बिहार राष्ट्र्भाषा परिषद् के निदेशक होकर पटना चले आए और श्रीबेनीपुरी तो अब पटना ही में रहने लगे थे - शीतल भवननाम वाले मकान में, जो वहां लोअर रोड के पूर्वी मुहाने पर एक अमराई से घिरा उनका आवास तब तक रहा जब १९५७५८ में वे फिर समाजवादी पार्टी के विधायक होकर बोरिंग रोड के अपने विधायक निवास में चले आए थे बाद में, १९६० के बाद वे पटना के ही श्रीकृष्णनगर के अपने आबंटित फ्लैट में भी कुछ दिन रहे, जब उनका स्वास्थ्य अचानक गिरने लगा था इलाज के सिलसले में अंतिम कुछ समय उनका दिल्ली के एम्स अस्पताल में भी बीता था, जिसके बाद अंतत: वे अपने सबसे छोटे बेटे महेंद्र के साथ मुजफ्फरपुर में रहे जहां उनका निधन हुआ उन अंतिम दिनों में भी मुजफ्फरपुर में मैं उनसे जाकर मिला था जब वे पक्षाघातग्रस्त हो चुके थे और बोल नहीं पाते थे

मुझे याद है, पक्षाघात से पीड़ित वे बिस्तर पर लेटे थे। वह एक दिल को बेतरह दुखानेवाली तस्वीर, जो केवल मेरी स्मृति मे अंकित है, उसी समय की है, जब मैं उनके बिस्तर के बगल में बैठा था मेरे हाथों में उनके दोनो ढीले हाथ ज़ोर से दबे थे उनका वह दीनहीन रुआंसासा चेहरा, उनकी आंसूभरी आंखें, उनके कांपते होंठ और कुछ बोल पाने की उनकी वह बेचैनी उस तस्वीर की करुण स्मृतिे आज भी मेरा दिल दुखाने लगती है मैं उस वक्त बस उनसे एक निर्मम झूठ बारबार बोल पा रहा था - चाचाजी, आप अच्छे हो जाएंगे पर वे रोते रहे, मुझको सूनी आंखों से उसी तरह देखते हुए वे मेरे पिता को शुरू से भैया कहते रहे, और मैं उनको बराबर ही चाचाजी कहता था मेरे पिता को लिखे उनके लगभग २५० पत्रों में से कोई पचासेक पत्रशिवपूजन सहाय साहित्य समग्रमें प्रकाशित हैं - १९२० से १९६० के बीच के लिखे पत्र बेनीपुरीजी के साहित्यिक जीवन की प्रगति का पूरा इतिहास उन पत्रों में पढ़ा जा सकता है उस युग के अनेक मनोरंजक चित्र भी उन पत्रों में देखे जा सकते हैं

बेनीपुरीजी के निकट संपर्क में निरंतर बीते दोढ़ाई दशकों की हज़ारों तस्वीरें मेरी स्मृति में एकएक कर घूम रही हैं मैं अपने पिता के साथ बराबरहिमालयकार्यालय जाता स्कूल से लौटने पर मैं और जित्तिन वहीं प्रेस के उ़परी तल्ले पर काग़ज़ की कतरनों के लंबेचैड़े गोदाम में धमाचौ कड़ी करते-रहते नीचेहिमालयके उस खपरैल कार्यालय में उन दिनों हिंदी के सभी प्रमुख लेखक बराबर जमा होते थे साहित्यिक जमावड़ों में हमलोग वहां बराबर उन लोगों के गगनचुंबी अट्टहास सुनकर अचानक ठिठक जाते और तब हम दोनों भी उनकी नकल में उनसे ठहाकों की बाजी लगाते

बेनीपुरीजी कुछ ही दिन पहले हजारीबाग जेल से छूटकर आये थे उनकी पुस्तककुछ मैं, कुछ वेमें उनके साहित्यिक और राजनीतिक जीवन के संस्मरण पढे जा सकते हैं उनकी दो अमर कृतियां - अंबपालीऔरमाटी की मूरतेंहजारीबाग जेल में ही लिखी गई थीं, औरहिमालयके शुरू के अंकों में पहलेपहल उनके कुछ अंश प्रकाशित हुए थे हिमालयके पहले ही अंक में अंगरेजी रोमांटिक कवियों की कविताओं के उनके कुछ अनुवाद भी छपे थे, जो उनकी अंगरेज़ी से अनुवादित कविताओं की पुस्तकटुलिप्समें प्रकाशित हैं अंबपालीकी उनकी छोटीसी भूमिका में हजारीबाग जेल का यह चित्र आप देखें बेनीपुरीजी लिखते हैं -

अब भी वे दिन भूले नहीं हैं, जब हजारीबाग सेंट्रल जेल के वार्ड नं के सामने, सघन पत्तियोंवाली एक आम्रविटपी के तने से उठंगकर, मैं अपनी अंबपाली की रचना किया करता था - सामने फूलों से लदे मोतिए और गुलाब के झाड़ थे, उपर आसमान पर बादलों की घुड़दौड़ होती थी और इधर मेरी लेखनी कागज पर घुड़दौड करती थी

और तब उन्हीं दिनों का किया कीट्स केबुलबुल गीतका उनका यह अनुवाद भी देखिए -

मैं देख नहीं सकता कि कौनसे फूल हैं मेरे पैरों के नीचे

या कौनसी मुलायम सुगंधें कुंजों के उपर छाई हैं

लेकिन इस खुशबूबसी अंधियाली में भी अंदाजा लगा सकता हूं,

एकएक सुगंध का, जिससे ऋतुराज वसंत भूषित करता है

घास को, झाड़ी को, जंगली फल के पेड़ों को -

यह जूही, यह जंगली चमेली, यह तुरत झड़ पड़नेवाली

मौलिश्री पत्तों में छिपी, और वसंत की बड़ी बेटी यह मुश्की गुलाब -

शबनम की शराब से लबालब - गुनगुना रहे हैं भौंरे जिनपर

ग्रीष्म की संध्या में इस धुंधलके में मैं सुन रहा हूं उनकी गुनगुन

 

इन पंक्तियों को पढ़ते हुए आप भूल जाएंगे कीट्स को लेकिन बेनीपुरीजी के इन शब्दों से जो नशा छाता है, वह कभी नहीं उतरने वाला नशा होता है बेनीपुरीजी शब्दों के जादूगर थे उनके शब्दों का जादू आज भी सर चढ़कर बोलता है

१९४६ के उन्हीं दिनों में पहली बार मैं उनके साथ उनके गांव बेनीपुर गया था, जिस गांव को उनके साहित्य ने अमर कर दिया और यह भी एक विडंबना है कि बेनीपुरीसाहित्य की वह सृजन भूमि - वह पुराना बेनीपुर, अब अपने सृजनकार की ही तरह समय के प्रवाह में अगोचर हो गया शायद हिदी साहित्य को बेनीपुरी की तरह के एक महान लेखक का प्रतिदान देने के लिए ही बेनीपुर गांव वहां बसा था बेनीपुरी गए तो वह गांव भी बागमती की धारा में तिरोहित हो गया

माटी की मूरतोंकी सोंधी मिट्टी वाला वह गांव, हरेपीले सरसों के खेतों से घिरा वह प्याराप्यारा गांव भी अब अपने रचनाकार के साहित्य में एकाकार हो गया हां, उस बेनीपुर की तस्वीरें अब आप केवल बेनीपुरीसाहित्य में ही देख सकेंगे

मैं बेनीपुरीजी के इतने निकट रहा हूं कि उतने नज़दीक से मैं उनके महाकाय व्यक्तित्व को निरपेक्षभाव से देखने में अपने को असमर्थ पाता हूं सच कहूं तो उनके लेखन में भी मुझे हर जगह अपने पिता की प्रतिच्छवि दिखाई देती है अपने युग में हिंदी शैली को उसका सौष्ठव और प्रसादगुण यदि शिवपूजन सहाय ने दिया और सहायजी के शब्दों में ही कहूं तो उस शैली कोचपल खंजन’–जैसी नैसर्गिक चपलता बेनीपुरीजी ने दी ¹

कुछ मैं कुछ वे

नई धाराका प्रकाशन १९५० में बेनीपुरीजी के संपादन में ही प्रारंभ हुआ था पचास के दशक मेंनई धारामें साहित्यिक संस्मरणों की कई मूल्यवान श्रृंखलाएं प्रकाशित हुई थीं इनमेंनई धाराके आदिसंपादक श्रीरामवृक्ष बेनीपुरी की कई संस्मरणश्रृंखलाएं भी थीं मुझे याद है’, ‘डायरी के पन्ने’, ‘पत्रकार जीवन के पैंतीस वर्षऔरराजनीति के तूफान में - इन शीर्षकों के अंतर्गत बेनीपुरीजी ने अपने अतीत और वर्त्तमान के अविस्मरणीय संस्मरण हिंदी संसार के सामने प्रस्तुत किए थे इन संस्मरणों में पिछली सदी के पहले दशक से लेकर पचास के दशक तक के - लगभग सदीपूर्वाद्ध के एक अत्यंत घटनासघन, निरंतर गतिशील युग के चित्र अंकित हुए थे, जब हिंदी भाषा अपनी शैली संवार रही थी, हिंदी साहित्य अपना सृजनभंडार मूल्यवान कृतियों से भर रहा था, और जब चारों ओर राजनीति तथा समाज में क्रांति एवं परिवर्त्तन की ज्वाला धधक रही थी पूरे देश में शहरों से लेकर दूरदूर गांवों तक इन्कलाब जिंदाबाद के नारे गूंज रहे थे, हजारों नौजवान अपनी कुर्बानियां दे रहे थे, लाखों लोग जेलों में अमानवीय कष्ट झेल रहे थे और फिरअंगरेजों भारत छोड़ोकी ललकार, सांप्रदायिक दंगों का प्रचंड तांडव, अंगरेजी साम्राज्यवाद का जल्दीजल्दी अपना बोरियाबिस्तर समेटना और तब आजादी का वह स्वर्ण विहान! यह देश के इतिहास का एक ऐसा दौर था जिस तरह के एक और ऐसे ही दौर - फ्रांस की क्रांति के बारे में एक अंगरेज कवि ने ही कहा था कि ऐसे स्वर्णविहान में जीवित होना ही स्वर्गसुख भोगने जैसा अनुभव था

आज जब आधी सदी से अधिक और समय बीत चुका और देश कछुआ-गति विकास के बाद भी अपनी कुरूपता नहीं छिपा पा रहा है - जब पश्चिमी उपभोक्तावादी अर्द्धनग्न अपसंस्कृति ने अपना घिनौना जलवा फैला लिया है, बाजारवाद का नंगा नाच गलीगली, आंगनआंगन, होने लगा है, भ्रष्टाचार अपनी सारी सीमाएं तोड़ चुका है, और नैतिकता का तो शब्दकोश से ही लोप हो चुका है - ऐसे समय में एक बार फिर एक अंगरेज उपन्यासकार की ही पंक्ति याद आती है, जब फ्रांस की क्रांति के संदर्भ में ही वह कहता है - वह समय सबसे अच्छा भी था, और सबसे बुरा समय भी वही था और अब आज के ऐसे गंदले-अटपटे समय में उस स्वर्णिमकाल की याद - जब पूरा देश इतिहास की अग्निपरीक्षा में खरे सोने की तरह तप रहा था - उस युग की स्मृतियों को एक बार दुहराना, एक सिहरनभरा अनुभव है

स्वर्णविहान के उसी काल में बेनीपुरी एक ऐसे लेखक थे जो अपने समय में नवोदित सूर्य की तरह भासमान हो रहे थे हिमालयऔरनई धाराकी तरह की मासिक पत्रिकाओं के प्रकाशन से बिहार हिंदी के माथे की बिंदी की तरह चमक रहा था, और हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता को सिंगारने का काम अपने दोनों हाथों - सृजन और संपादन - से कर रहे थे श्रीरामवृक्ष बेनीपुरी मेरी जानकारी में वे संभवत: अकेले ऐसे व्यक्ति थे जो अपने हस्ताक्षर में अपने नाम के साथश्रीजोड़कर लिखते थे, और सचमुच ऐसा लगता है कि उस नाम के आगे श्री और पीछे बेनीपुरी का होना सर्वथा सार्थक था श्री तो उसके साहित्यस्वरूप का सौंदर्यचिन्ह ही था और बेनीपुरी था उसके समाजवादी यथार्थदर्शन का पर्याय श्री का यह सौन्दर्यप्रतीक और कहीं किसी नाम के साथ उस तरह सटीक जुड़ा फिर नहीं दीखा

कुछ मैं, कुछ वे’, बेनीपुरीजी की एक ऐसी पुस्तक है जो आधी सदी बीतने पर भी समय की कसौटी पर खरे सोने की तरह चमक रही है, और अब एक क्लासिक का दर्जा हासिल कर चुकी है बस इतना कहा जा सकता है कि एक श्रृंखला के रूप में लिखित और प्रकाशित इन संस्मरणों को जब आज एक बार फिर पढ़ा जाएगा तब इनको पढ़ने पर आज के पाठक को जो तृप्ति मिलेगी, वह उस जमाने के पाठकों को भी सुलभ नहीं हुई होगी उनमें निरंतर एक अतृप्ति का भाव बना रहता होगा यों एक दूसरे प्रकार की अतृप्ति का भाव आज के पाठक के मन में भी जरूर उभर सकता है, क्योंकि इन संस्मरणों की पूरी पृष्ठभूमि को और विस्तार से जाननेसमझने की अपरिहार्य असमर्थता उसकी जिज्ञासा को अतृप्त छोड़ ही देगी अतृप्ति का यही अनिवार्य-भाव रचनाकार और पाठक दोनों के लिए प्यास बुझाने और जगाने का काम एक साथ करता है बेनीपुरीजी के लेखन की यह एक सबसे बड़ी विशेषता है पाठक में अतृप्ति के इस भाव को एक साथ जागृत और शमित करना

पुस्तक के पहले भाग में - राजनीति के तूफान मेंशीर्षक के अंतर्गत उन्होंने अपने १९२० से १९४० तक के राजनीतिक जीवन के संस्मरण ही लिखे हैं लेकिन आजादी के बाद जब कांग्रेस और समाजवादी पार्टी का सीधा टकराव शुरू हुआ तब वे पटना से निकलने वाले अखबारजनताका संपादन करने लगे थे उन दिनों उनका निवास महेंद्रू मुहल्ले में, लोअर रोड पर - जो बाद में अब्दुल बारी पथ कहलाने लगा - शीतल भवननामक एक मकान में था अब उनका परिवार वहीं उनके साथ रहता था बड़े लड़के देवेंद्र की शादी हो चुकी थी, तब तक शायद दो पोते भी चुके थे लेकिन रानी - उनकी पत्नी, जिन्हें हम सबलोगदीदीकहते थे - ज्यादातर बेनीपुर में ही रहती थीं खेतीबारी के कारण ही दीदी वहीं ज्यादा रहना पसंद करती थीं, और पटना बेनीपुर के बीच की डोर बंधी रहती थी

इसी बीच एक और डोर बंध गई बेनीपुरीजी के साथ हीजनतामें सहायक संपादक के रूप में तब २२२३ वर्ष के एक युवक श्रीवीरेंद्र नारायण काम कर रहे थे वे भागलपुर के निवासी थे और समाजवादी पार्टी से भी जुड़े थे १९४२ वाले आंदोलन में वे तीन साल भागलपुर जेल में भी सजा काट चुके थे, जहां रेणुजी औरढोढ़ाई चरित मानसके लेखक सतीनाथ भादुड़ी भी उनके साथ बंदी थे वीरेंद्रजी ने जेल में रहते हुए ही अपनी बीएस. सी.  की परीक्षा पास की थी बेनीपुरीजी और जयप्रकाशजी, गंगा बाबू, अवधेश्वर बाबू, श्यामनंदन सिंहबाबा -  समाजवादी पार्टी की पूरी जमात के वे चहेते थे उन दिनों वे बहुत मुफलिसी में पटना के लंगरटोली मुहल्ले में बिहारी साव लेन के एक सस्ते होटल में रहा करते थे उन्हीं दिनों शिवजी के बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना के मंत्रिपद पर आने की चर्चा चल रही थी स्वयं बेनीपुरीजी, दिनकरजी आदि चाहते थे कि शिवजी छपरा से पटना के साहित्यिक केंद्र में जाएं इसकी एक लंबी डोर इस तरह बंधी कि बेनीपुरीजी और महारथीजी के प्रयास से वीरेंद्रजी का विवाह शिवजी की बड़ी बेट - मेरी बड़ी बहन सरोजिनी से हो गया बिहारी साव लेन में ही उसके दक्खिनी सिरे पर एक खपरैल मकान में वीरेंद्रजी सपरिवार रहने लगे, जिसमें अब मैं भी शामिल था इसके कुछ ही दिन बाद मेरे पिता बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् में गए मेरा नाम भी पास के ही पटना कॉलेजिएट स्कूल में लिखवा दिया गया यह मेरा विशेष सौभाग्य था कि दसवीं के मेरे क्लासटीचर थे हिंदी के प्रसिद्ध कवि श्रीरामगोपाल शर्मारुद्रजिनका स्नेह मुझे तबसे ही मिलने लगा - मेरे पिता के यश के कारण ही

अब  मेरी बड़ी दीदी सरोजिनी बेनीपुरीजी की अपनी बेटी और वीरेंद्रजी उनके अपने जामाता बन गये मेरे पिता को तो बेनीपुरीजी कलकत्ताप्रवास के दिनों से हीभैयाकहा कहते थे, और अब दोनों के बीच का वह सुदीर्ध साहित्यिक बंधुत्व एक विशेष सौहार्दपूर्ण पारिवारिक भ्रातृत्व में बदल गया मेरी और जित्तिन की दोस्ती उस पारिवारिक संबंध की डोर में एक नई गांठ बंधी स्थिति यही थी कि मैं अब बेनीपुरीजी को एक साहित्यिकार से अधिक एक वात्सल्यपूर्ण अभिभावक के रूप में देखने लगा था

मेरी यह सारी याददेहानी उस विस्तृत जीवंत साहित्यिक परिवेश की एक झलकभर है जिसकी पूरी पृष्ठभूमिकुछ मैं, कुछ वेपुस्तक में चित्रित है अभी मैं केवल इतना रेखांकित करना चाहता हूं कि आज फिर से बेनीपुरीजी के लेखन को पढ़ने की जरूरत है चाहे गांव हो या शहर, समाज हो या राजनीति, संस्कृति हो या साहित्य, धर्म हो या अध्यात्म, किसी भी जीवनक्षेत्र में आज जो अटपटे, उटपटांग परिवर्त्तन दिखाई पड़ रहे हैं, उनको समझने और उनसे निबटने के लिए कल के इतिहास को दुहराना जरूरी है, और इसी अर्थ में आज बेनीपुरी का साहित्य बहुत प्रासंगिक है उनकी सभी पुस्तकेंµ ‘जंजीरें और दीवारें’, ‘मुझे याद है’, ‘डायरी के पन्ने, ‘माटी की मूरतें’, ‘अंबपाली’, आदि को आज नये सिरे से पढ़ने की जरूरत है - खास तौर से उनकी पहली तीन संस्मरणात्मक पुस्तकें कुछ मैं, कुछ वेमें १९२२ वाले गया कांग्रेस में परिवर्त्तनवादी और अपरिवर्त्तनवादी दलों कीकुश्तमकुश्तीकी चर्चा है समझौते के मुताबिक स्वराजपार्टी के कौंसिलों के चुनाव में हिस्सा लेने के निर्णय को मान लिया गया था बेनीपुरी लिखते हैं -

इसके चलते बिहार में हमने बड़े बुरे दृश्य देखे कौंसिल और बोर्डों में किन्हें भेजा जाए, इसको लेकर कांग्रेस में फूट फैली जातीयता ने सिर उठाया बिहार में कायस्थभूमिहार विवाद का सर्वनाशी तांडव होने लगा भूमिहारों के नेता सर गणेशदत्त सिंह थे और उनके प्रमुख प्रचारक स्वामी सहजानंद सरस्वती स्वामीजी ने असहयोग के पहले भूमिहारों को संगठित करने में बड़ा काम किया था असहयोग में वह शामिल होकर जेल भी गए थे वह राष्ट्रीयता को छोड़कर फिर जातीयता पर जाएंगेµऐसा किसने सोचा था फिर सर गणेशदत्त ऐसे प्रतिक्रियावादी के नेतृत्व में काम करेंगे, इसकी तो कल्पना भी नहीं हो सकती थी लेकिन बाबू गणेशदत्त सिंह या स्वामीजी के किए कुछ नहीं होता, अगर कांग्रेस के अंदर के नेताओं में इस विवाद ने घर नहीं कर लिया होता कांग्रेस का नेतृत्व कायस्थों और भूमिहारों की होड़ाहोड़ी में उलझा था बाकी जाति के लोग दोनों दलों में विभक्त थे गांवगांव, थानेथाने, जिलेजिले में जातीयता के आधार पर पार्टियां बन रही थी और आपस में जूतमपैजार चल रही थी

यह एक धरातल की तस्वीर है, यथार्थ के निकट नहीं, बिलकुल सोलह आने यथार्थ ही अब इसी फ्रेम में आज की तस्वीर को फिट करने से समझना आसान हो जाएगा कि आज जो हो रहा है वह नया नहीं है, बल्कि जो पहले होता रहा है वह अब बद से बदतर हो चुका है गांधी ने अंगरेजों से कहा था - ‘‘तुमलोग चले जाओ, हम अपना झगड़ा खुद सलटा लेंगे ’’ लेकिन ये झगड़े कांग्रेस में ही कितने पुराने हैं, यह बेनीपुरी से सुनिए वे यह भी कहते हैं - ‘‘प्रांतीय राजनीति की जातिगत दलबंदी के लिए सदाकत आश्रम बदनाम   था ’’

बात १९२२ के आसपास की है और यह वही सदाकत आश्रम है - सचाई का आश्रम - जिसे कभी मजहरुल हक़ साहब ने कायम किया था, आजादी की फौज तैयार करने के लिए, और जो शुरू से कांग्रेस का एक अहम मरकज़ रहा लेकिन यह किस्सा भी तभी का है जब आजादी की लड़ाई का आग़ाज़ था और कांग्रेस को देश के दिल की धड़कन माना जा रहा था लेकिन अंगरेज तो जनता की पेट में समाकर यह सब देख ही रहे थे

बेनीपुरी ने हजारीबाग जेल में सबसे ज्यादा सजा काटी वे वहांबीऔर कभीकभीसीक्लास के भी कैदी रहे जेलजीवन के उनके कुछ संस्मरण इस किताब में भी मिलते हैं, लेकिनजंजीरें और दीवारेंमें तो आप उस जमाने के कांग्रेसीगैरकांग्रेसीस्वतंत्रतासेनानियोंकी पूरी नौटंकी ही देख सकते हैं उस किताब में कुछ तस्वीरें तो ऐसी हैं जिन्हें देखकर आप अपनी आंखें मोड़ लेंगे लेकिन वैसी तस्वीरें दिखाने की नहीं, खुद देखने की हैं बेनीपुरी ने उस किताब में लिखा है कि उस दौरान वे बिहार के दर्जनभर जेलों में रहे - कहीं कुछ दिन, कहीं कुछ महीने, और कहीं कुछ साल हजारीबाग जेल में वे जयप्रकाशजी के साथ भी रहे, और जयप्रकाश के जेलपलायन में उन्होंने हाथ भी बंटाया था इसका पूरा विवरणजंजीरें और दीवारेंमें भी है औरजयप्रकाश - उनकी लिखी अन्यतम जीवनी में भी मैंने १९७४ के आंदोलन के समयजयप्रकाशका एक विशेष संक्षिप्त संस्करण भी प्रकाशित कराया था जिसमें उस जेलसाहचर्य की विस्तार से चर्चा हुई है जयप्रकाशकी यह मूल जीवनी भी इधर फिर दुबारा प्रकाशित हुई

जंजीरें और दीवारेंमें १९३१ में वायसराय विलिंग्डन के आने के बाद जेलों  में दी जाने वाली यंत्रणाओं के रोंगटे सिहराने वाले चित्र हैं हालांकि तिकटी पर बांधकर कोड़े लगाने की सजा तो पहले से ही जारी थी नेहरूजी ने भी अपनी आत्मकथा में चंद्रशेखर आजाद की - जो तब केवल १६१७ साल के थे - कोड़ों से पिटने की चर्चा की है वायसराय विलिंग्डन ने आते ही जैसे मुश्कें कस दी थीं बेनीपुरी फिर हजारीबाग जेल में गये थे जेल सुपरिंटेंडेंट बर्क नाम का एक अंगरेज था - कहीं आदमी इतना कुरूप होता है ? - बेनीपुरी को आश्चर्य हुआ

लंगड़ा; झुककर, गुरिल्ले की तरह उचकउचक कर चलता चेहरे पर मानो किसी दूसरे बदमाश बच्चे ने लाल रोशनाई की दवात फेंककर फोड़ डाली हो छोटीछोटी गोलमोल आंखें, जिनकी नीली पुतलियों से शैतान झांकता बाएं हाथ पर गोदने से सांप की तसवीर बनवा रखी थी उसने, यह तसवीर क्या उसकी मानसिक वृत्ति को सूचित नहीं करती  ? और शायद गोदने की यही तस्वीर नये वायसराय के पथरीले रुख की भी तस्वीर पेश कर रही थी

वहीं एक दूसरे अंगरेज जेल आइजीमैकरे का भी एक खून खौलाने वाला चित्र अंकित है यहभारत छोड़ो आंदोलनके समय का वाकया है जेल भी भागलपुर का, जहां वीरेंद्र नारायण भी उन दिनों सजायाफ्ता थे मैकरे अपने जांचदौरे पर वहां आया था वहां उसकी मुठभेड़ रामजी प्रसाद वर्मा से हो गई वर्मा हिंदू विश्व विद्यालय में इंजीनियरिंग के अत्यंत मेधावी छात्र थे बाद में वे पटना इंजीनियरिंग कालेज के प्रिंस्पल भी हुए आंदोलन में उन दिनों ज्यादातर ऐसे ही तीक्ष्ण प्रतिभा वाले युवक कूद पड़ते थे किसी बात पर कहासुनी के बाद मैकरे ने वर्मा को दस बेंत मारने की सजा दे दी

झट रामजी को तिकटी पर चढ़ा दिया गया तिकटी लकड़ी का वह ढांचा होता है, जिस पर कैदी को औंधे मुंह बांध कर उसकी चूतड़ पर बेंत लगाए जाते हैं सभी राजबंदियों को कतार में बिठला दिया गया यह दृश्य देखने को मैकरे भी सदलबल वहां खड़ा था नंगे चूतड़ पर बेंत बरसने लगे बरसों तेल में पोसे हुए वे बेंत तड़ाकतड़ाक जहां पड़ते, खाल उधड़ आती किंतु वाह रे रामजी! हर बेंत पर - महात्मा गांधी की जय, भारतमाता की जय - आदि नारे लगाता ही रहा जब दस बेंत पूरे हुए, मैकरे उसके निकट गया रामजी ने कहा बस इतना ही! वह गुस्से में लाल हो उठा हुक्म दिया - दस बेंत और! अब तो चूतड़ से मांस कटने लगा, किंतु वे ही नारे और अंत में फिर वही - बस इतना ही! मैकरे अब होश में नहीं था, दस बेंत और फिर बेंत तड़ाक्तड़ाक् तिकटी के नीचे मांस के टुकड़े कट कर गिर रहे हैं, रक्त की बूंदें टपक रही हैं रामजी का समूचा शरीर थरथर कांप रहा है, किंतु मुंह से क्षीण स्वर में नारे जारी हैं कहते हैं, इस दृश्य से मैकरे इतना प्रभावित हुआ कि दो बेंत और रह गए थे, तभी बेंत लगवाना बंद करा दिया और उसके निकट जाकर करुण स्वर में बोला - मैंने ईसा की कहानी सुनी थी, आज प्रत्यक्ष देख लिया यही नहीं, वहां से लौटकर वह अपने पद से इस्तीफा देकर इंग्लैंड वापस चला गया

रामजी वर्मा दूर से मेरे संबंधी लगते थे रिश्ते में वे दिवाकर प्रसाद विद्यार्थी के साले थे मुझे याद है एक बार मैं उनके साथ, जब राजेंद्र बाबू राष्ट्रपति पद से मुक्त होकर सदाकत आश्रम गये थे, हमलोग उनसे मिलने गये थे राजेंद्र बाबू उनको बहुत मानते थे, और पिताजी के कारण राजेंद्र बाबू ने मेरे प्रति भी उस समय बहुत स्नेह प्रदर्शित किया था बेनीपुरी जी की किताबों में त्याग और तपस्या की ऐसी मिसालों  की बारबार चर्चा हुई है

बेनीपुरी हिंदी के ऐसे लेखक थे जिसने हिंदी की अपनी रोटी खुद पकाकर खाई, और आज भी उस रोटी का  सोंधापन भूला नहीं जा सकता यहां मैंनेकुछ मैं, कुछ वेकी चर्चा के बहाने बेनीपुरी और उनके जमाने की याद ताजा करने की एक छोटीसी कोशिश की है, मगर यादें अभी बहुत सारी बाकी हैं, और वे फिर कभी जरूर उभरेंगी

अम्बपाली

बेनीपुरीजी विलक्षण बहुविध प्रतिभा के धनी थे नाटक उनकी प्रिय विधा थी जीवन भी उनके लिए एक रंगमंच ही था और इसीलिए बेनीपुर में उन्होंने अपना जो घर बनवाया, उसका पोर्टिको रंगमंच के प्रारूप में बनवाया - सामने प्रोसेनियम के साथ अम्बपाली - उनका सबसे प्रिय नाटक था उसके कई सफल प्रदर्शन हुए पटना में और फिर १९५५ में राष्ट्रीय नाट्य समारोह, दिल्ली में, सप्रू हाउस की रंगशाला में, जिसमे राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद भी उपस्थित थे मैं उस नाट्यमंडली का प्रतिभागी था - वृन्दवाद्य का वंशीवादक और छायाकार भी नाटक की प्रस्तुति बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन केकला केंद्रके कलाकारों ने की थी - और जिस कलाकेन्द्र की स्थापना सम्मेलनमंत्री के रूप में बेनीपुरीजी ने स्वयं की थी मेरे पिता तब सपरिवार सम्मेलनभवन परिसर में ही रहते थे, और मैं कला केंद्र में अयोध्या बाबू से बांसुरी सीखता था फोटोग्राफी का भी ज़बरदस्त जुनून सवार रहता था मुझ पर अम्बपाली’–नाट्यदल के साथ लगभग पचास लोगों की जमात दिल्ली के राष्ट्रीय नाट्यसमारोह में भाग लेने गयी थी एक पूरा तीसरे दर्जे का रेलवे डिब्बा रिज़र्व था वापसी में हम आगरा रुकते हुए आये थे और उस पूरी यात्रा और नाटक के चित्र आज भी मेरे संग्रह में सुरक्षित हैं अम्बपालीमें नायक की भूमिका में थे वीरेन्द्र नारायण और अम्बपाली बनी थी एक १६१७ साल की इसाई लड़की - शोभा सिमोर और उपनायिका मधूलिका थी अमला वर्मा नाटक के निर्देशक थेसर्चलाइटअखबार के वरिष्ठ पत्रकार - गोपाल प्रसाद सिंह अब कुछ नाम भूलने भी लगा हूं संगीतमंडली में निदेशक थे- अयोध्या बाबू और नृत्यनिर्देशक थे भगवती गुरु और इन सबके ऊपर बेनीपुरी जी तो थे ही!

उस प्रसंग का पूरा संस्मरण मेरे जीवनवसंत का एक अलग अध्याय है बस इतना जोड़ना चाहता हूं कि वह वसंती बयार मेरे जीवन में बेनीपुर से ही प्रवाहित हुई, जहां के सरसों खेतों की उसी लहलहाती हरियाली की मदमाती सुगंध मेरी स्मृति में भरी रही आज बेनीपुरीजी (‘चाचाजी’) कि पुण्य-स्मृति में एक-के बाद-एक न जाने ऐसी कितनी यादें कतार बांधे चली आईं|


मेरी संस्मरणों की पुस्तक (c)'दर्पण में वे दिन' (२०२१) में प्रकाशित, 

अनामिका प्रकाशन,नई दिल्ली, मो. ९७७३५०८६३२