आचार्य शिवपूजन सहाय
अनुस्मरण : जयंती - 133
आचार्य शिवपूजन सहाय का नाम हिन्दी नव-जागरण के सुदृढ़
स्तंभों में गिन जाता है। हिन्दी भाषा ओर साहित्य की आधारशिला के संस्थापकों में
उनका प्रमुख स्थान है। सम्पूर्ण हिन्दी-जगत में उन्हें आचार्य महावीर प्रसाद
द्विवेदी की समतुल्यता प्राप्त है। उनके अनन्य उपन्यास ‘देहाती दुनिया’ का भी यह
शती-वर्ष है और यथाशीघ्र उसका एक शती-संस्करण कुछ विशेष सामग्री से संवलित
प्रकाशित हो रहा है। उस उपन्यास का मेरा अंग्रेजी अनुवाद तथा वाचित- और ई-बुक
संस्करण भी न्यास द्वारा शीघ्र प्रकाशित होगा। नेट पर भी उन पर श्रव्य ओर दृश्य
प्रचुर सामग्री उपलब्ध है। ‘देहाती दुनिया’ का प्रारम्भिक एक छोटा-सा अंश दशम वर्ग
के अखिल भारतीय हिन्दी पाठ्यक्रम में भी वर्षों से निर्धारित है। मेरे द्वारा
संपादित उनका सम्पूर्ण साहित्य ‘शिवपूजन सहाय साहित्य-समग्र’ के 10 खंडों में भी
उपलब्ध है। यहाँ उनकी पुण्य-स्मृति में श्रद्धांजलि-स्वरूप अभिव्यक्त कुछ प्रमुख
उद्गार प्रकाशित किए जा रहे हैं। उनपर इधर प्रकाशित कुछ पुस्तकों के विवरण भी नीचे
देखे जा सकता हैं।
‘मूक हिन्दी सेवा ही उनका व्रत था’
- डॉ. राजेंद्र प्रसाद
हिन्दी-सेवा अपने में एक बड़ी राष्ट्र-सेवा है। मूक हिन्दी-सेवा ही व्रत था जाचार्य शिवजी का।
मेरे ऊपर तो सदा उनका बहुत स्नेह रहा। अभी पिछले तीन दिसम्बर की बात है-जब शिवजी द्वारा सम्पादित एक 'अभिनन्दन ग्रन्थ'
मुझे पुनः भेंट किया गया। इस ग्रन्थ का प्रकाशन महिला चर्खा समिति,
पटना की ओर से हुआ था। 1950 में भी आरा नागरी प्रचारिणी
सभा द्वारा प्रकाशित 'अभिनन्दन ग्रन्थ' मुझे शिवजी के ही सद्भावना स्वरूप प्राप्त हुआ था।
मैं अपने को अभिनन्दनीय नहीं मानता। अगर कोई चीज अभिनन्दनीय
है,
तो वे आदर्श या उद्देश्य जिनके लिए हम काम करते हैं। शिवजी-ऐसे तपःपूत साहित्यकारों के प्रेम-भाव से मुझे बराबर
प्रेरणा मिलती रही है, गांधीजी द्वारा बताये गये सत्य के मार्ग
पर और साहस के साथ आगे बढ़ने की।
एक साहित्य-प्रेमी के नाते मेरा साहित्यकार शिवजी से परिचय
बहुत पुराना था। निजी परिचय भी काफी पहले हुआ। मेरे लिए यह कहना भी सम्भव नहीं है कि
मेरा निजी परिचय आचार्य शिवपूजन सहाय के साथ कब हुआ। उनकी हिन्दी की सेवा की ख्याति
उनसे मिलने से पहले ही मुझ तक पहुंच चुकी थी। शुरू से ही शिवजी हिन्दी के एक अत्यन्त
निस्पृह, मूक सेवक थे और अपनी सारी जिन्दगी इसी प्रकार की मूक-सेवा में उन्होंने बिता दी। फिर भी धीरे-धीरे उनके त्याग
का सौरभ फैलने लगा। उन्हें ख्याति मिली और यश भी।
मेरा भी उनसे एक निजी काम पड़ा और मेरा उनका परिचय घनिष्ठ सम्बन्ध
में परिणत हो गया। मैंने जेल में बैठकर अपनी 'आत्मकथा' लिखी थी। जेल से निकलने पर मुझे इतना समय नहीं मिला कि मैं उसको दोहराऊं। यह
शिवजी की ही कृपा का फल था कि वह 'आत्मकथा' प्रकाश में आ सकी। अत्यन्त अपनापे से उन्होंने हस्तलिखित प्रति ले ली और बहुत
परिश्रम कर के आद्योपान्त सब कुछ पढ़ा ही नहीं, बल्कि जहां-तहां लिखने में जो थोड़ी भूलें रह गई थीं उनको भी सुधारा और मुद्रण प्रति तैयार
कर दी। मैं उनकी इस प्रेमपूर्ण सहायता की जितनी प्रशंसा करूं, वह थोड़ी है।
इसका महत्व तब बढ़ जाता है, जब हम जानते
हैं कि इस प्रकार की सहायता नामालूम कितने लोगों की की थी। उनके पास समय का नितांत अभाव था। फिर भी सृजन,संशोधन
तथा सम्पादन के गुरुतर-भार का सतत निर्वाह करते हुए उन्होंने अपने वरदहस्त द्वारा
कितने नये लेखक पैदा किए। पुराने लेखकों को तो उनसे सहारा मिलता ही था। बिहार के
हिन्दी साहित्य की जानकारी जितनी उनको थी, शायद ही और किसी को हो। उनके निधन से
बिहार ही नहीं समस्त हिन्दी-जगत को बड़ी क्षति पहुंची है। बिहार के साहित्यसएवी तो
एक प्रकार से निस्सहाय से हो गए हैं। मेरी यह आशा और कामना है कि इस प्रकार के
हिन्दी-सेवक देश में और अधिक पैदा हों। हिन्दी-सेवा देश-सेवा का अभिन्न यंग है।
साहित्य-साधन के प्रतीक आचार्य शिवपूजन
सहाय
- सेठ गोविन्ददास
साहित्यकार तो बहुत हो सकते हैं, हैं भी,
पर साधक बिरले ही होते हैं। आचार्य शिवपूजन सहाय को मैं साहित्यकार से
कहीं अधिक साधक के रूप में देखता था, और जो साधक होगा,
उसका प्रत्येक पग, प्रवृत्ति और प्रकृति ही प्रज्ञापूर्ण
और प्रेरणा-मूलक होगी।
शिवपूजनजी के कृतित्व के अनुरूप उनका व्यक्तित्व भी था। अनवरत
श्रम और साधना से वह ज्यों-ज्यों साहित्य भण्डार को भरते गये, एक साधक की भांति उनका शरीर जीर्ण होता गया। प्रायः देखने में आता है कि साधक
का शरीर जीर्ण-शीर्ण होता है, पर आत्मा
बलवान । फिर साधक सदा ही शरीर (आत्मा) की
सत्ता से काम करते हैं, शरीर की नहीं। शिवपूजनजी भी अपनी शारीरिक
सत्ता से अनासक्त पर आत्मिक सत्ता से बलशाली थे। एक ओर वह सतत श्रम कर हिन्दी को उसके
शब्द भण्डार से नहीं, अपितु साहित्य भण्डार से समृद्ध करते गये,
और ज्यों-ज्यों उनकी साधना के अंतिम दिन आये,
अपनी शारीरिक अक्षमता के बावजूद पूरी आत्मिक शक्ति से उन्होंने हिन्दी
को समृद्ध किया।
इस प्रकार साहित्य के विविध सोपानों से साहित्य जगत में कुछ
प्रेरणा, कुछ प्रसाद और कुछ परम्पराएं छोड़ जाने में सफल शिवपूजनजी अपने
व्यक्तित्व और कृतित्व के साम्य से अपने जीवनकाल में और उसके बाद तो और अधिक सशक्त
और बलशाली बन गए।
- डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी
आचार्य शिवपूजन सहाय जी विनय और शील के मूर्तिमान रूप थे। साहित्य-सेवा उनके
स्वभाव का अंग थी। कालिदास ने जिसे 'काञ्चन-पद्म-धर्मिता' कहा है, वह पूर्णरूप से उनमें मिलती थी-दृढ़, उज्ज्वल और कोमल !
उन्हें जीवन में बहुत संघर्ष करना पड़ा। बहुत विषपान करके उन्होंने
साहित्य को अमृत दान किया था। संघर्षों से वे कभी विचलित नहीं हुए। 'प्राप्तं
प्राप्त-मुपासीत हृदये नापराजितः' वाले
आदर्श ने उनके भीतर स्थिर निवास पाया था। वे बड़े ही स्वाभिमानी और मनस्वी थे,
परन्तु स्वाभिमान अनेक कवचों से सुरक्षित था। मैं ऐसे स्वाभिमानियों
को जानता हूँ जो । दूसरों का असम्मान ही आत्म-गौरव का चिह्न मानते
हैं। शिवजी बिलकुल भिन्न थे। वे सच्चे हृदय से दूसरों का सम्मान करते थे। अपने से बहुत
कनिष्ठ लोगों के गुणों का भी वे सम्मान करते थे। उनका स्वाभिमान कभी भी आक्रामक नहीं
हुआ। क्योंकि वे भीतर से महान थे। अपने गौरव के प्रति उनके मन में दृढ़ आस्था थी,
इसलिए वे खुले हृदय से दूसरों का सम्मान कर सकते थे। वे सही अर्थों में
'अजातशतु' थे।
चरित्रगत दृढ़ता, लेखनगत ईमानदारी और मनुष्य के
सहज चरित्रगुण में अटूट आस्था ने उन्हें अपने ढंग का अद्वितीय व्यक्तित्व दिया था।
वे अपना उपमान आप ही थे- 'गगनं गनाकारम्' ।
निष्ठावान् कार्यकर्त्ता
आ.शिवपूजन सहाय
- वासुदेव शरण अग्रवाल
श्रीशिवपूजन सहाय व्यक्ति नहीं, एक संस्था
थे। उन्होंने लगभग दस वर्षों के भीतर जो महनीय कार्य किया, वह
बिहार के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखा जायगा। हिन्दी-साहित्य
के क्षेत्र में आज कोई संस्था ऐसी नहीं दिखायी देती, जिसने इतने
सीमित समय में, साहित्य के इतने अधिक क्षेत्रों में, इतने अधिक विद्वानों का सहयोग प्राप्त करके इतना अधिक कार्य किया हो। कभी-कभी यह सोचकर आश्चर्य होता है कि शिवपूजनजी के भीतर वह कौन-सी शक्ति थी, जिसके बल से उनकी कार्यसिद्धि ऐसी बहुमुखी
हो सकी। इसमें एक हेतु तो उनका अपरम्पार सौजन्य था। सच्चे साहित्यिक को तो वे अपना
इष्टदेव समझते थे और उसके प्रति उनका निजी अहं नितान्त विगलित हो जाता था, जिसका हमने प्रत्यक्ष अनुभव किया।
बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् शिवपूजन बाबू की कीर्त्तिपताका है।
परिषद् की ध्वजा पर शिवपूजनजी का नाम स्वतः अंकित है और जो उसका अर्थ पढ़ सकते हैं, उन्हें प्रतीत
होता कि कर्मण्यता, व्यवस्था, सत्य और नवीन
कल्पना के स्वस्तिक से परिषद् के जीवन का विकास हुआ है, और जबतक
उसके अधिकारियों में ये चार गुण बने रहेंगे, तब तक परिषद् की
प्राणवत्ता भी बनी रहेगी। भूत शरीर धारण करके आवागमन सबके लिए है, जो आया है उसके लिए यात्रा का अन्त भी निश्चित है। किन्तु अपने अन्तवान् नश्वर
शरीर के द्वारा शिवपूजनजी जो मूर्त्ति ढाल गये हैं, उसका सौन्दर्य
अनन्त है, और वह बिहार एवं उससे बाहर भी सभी हिन्दी-सेवियों के मानस को प्रफुल्लित करता है।
‘विनय के वास्तविक रूप’ आ.शिवपूजन
सहाय
- फा. कामिल बुल्के
मुझे लगभग पंद्रह वर्ष पहले आचेरी शिवपूजनजी के संपर्क में
आने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। हर मुलाकात से उनके प्रति मेरी श्रद्धा बढ़ती गई और अब
मेरे हृदय-मंदिर की दीवार पर विणयमूर्त्ति,सौजाण्यावतार, परमपूज्य एवं परम प्रिय
शिवपूजनजी का चित्र सदा-सर्वदा के लिए अंकित है।
परलोक में पहुँचने पर मुझे अपनी जन्मभूमि के काम लोगों से मिलने
कि उत्सुकता रहेगी;क्योंकि वहाँ के काम लोगों से ही मेरा निकट का संपर्क हो पाया
है। अपनी नई मातृभूमि भारत के बहुत से अच्छे-अच्छे लोगों का मुझे परिचय प्राप्त हो
सका है, और उनमें एक शिवपूजनजी हैं। परलोक में पहुंचकर मुझे उनसे मिलकर अनिर्वचनीय
आनंद का अनुभव होगा और मैं उनके सामने नतमस्तक होकर उनको धन्यवाद भी दूंगा कि उनसे
मैंने जान लिया था कि विनय का वास्तविक स्वरूप क्या है।
'तुम्हें प्रणाम'
- डॉ. हरिवंश राय 'बच्चन'
हिन्दी का एक और महारथी
लुप्त नहीं, प्रकट हुआ,
अविचल रहेगा सदा
अपनी जगह
अपने पूर्वजों की तरह
वाणी का क्षेत्र है,
मृत्यु जहां जन्म दिया करती है।
भस्म हुई काया थी-
यश-काया जलती है, न मरती है,
काल-जयी युग-युग निखरती है।
वाङ्मयस्वरूप धार
खड़ा हुआ ज्यों पहाड़,
पीठ पर बहुत बड़ा साया है।
आओ, नव जोधाओ !
सन्मुख बाधाओं, विरोधों का
निर्भय करो निदान, हिन्दी की शक्ति और क्षमता का
देना तुम्हें प्रणाम !





