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Saturday, August 8, 2026

 

आचार्य शिवपूजन सहाय

अनुस्मरण : जयंती - 133












आचार्य शिवपूजन सहाय का नाम हिन्दी नव-जागरण के सुदृढ़ स्तंभों में गिन जाता है। हिन्दी भाषा ओर साहित्य की आधारशिला के संस्थापकों में उनका प्रमुख स्थान है। सम्पूर्ण हिन्दी-जगत में उन्हें आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की समतुल्यता प्राप्त है। उनके अनन्य उपन्यास ‘देहाती दुनिया’ का भी यह शती-वर्ष है और यथाशीघ्र उसका एक शती-संस्करण कुछ विशेष सामग्री से संवलित प्रकाशित हो रहा है। उस उपन्यास का मेरा अंग्रेजी अनुवाद तथा वाचित- और ई-बुक संस्करण भी न्यास द्वारा शीघ्र प्रकाशित होगा। नेट पर भी उन पर श्रव्य ओर दृश्य प्रचुर सामग्री उपलब्ध है। ‘देहाती दुनिया’ का प्रारम्भिक एक छोटा-सा अंश दशम वर्ग के अखिल भारतीय हिन्दी पाठ्यक्रम में भी वर्षों से निर्धारित है। मेरे द्वारा संपादित उनका सम्पूर्ण साहित्य ‘शिवपूजन सहाय साहित्य-समग्र’ के 10 खंडों में भी उपलब्ध है। यहाँ उनकी पुण्य-स्मृति में श्रद्धांजलि-स्वरूप अभिव्यक्त कुछ प्रमुख उद्गार प्रकाशित किए जा रहे हैं। उनपर इधर प्रकाशित कुछ पुस्तकों के विवरण भी नीचे देखे जा सकता हैं।        

 

‘मूक हिन्दी सेवा ही उनका व्रत था’

- डॉ. राजेंद्र प्रसाद

हिन्दी-सेवा अपने में एक बड़ी राष्ट्र-सेवा है। मूक हिन्दी-सेवा ही व्रत था जाचार्य शिवजी का। मेरे ऊपर तो सदा उनका बहुत स्नेह रहा। अभी पिछले तीन दिसम्बर की बात है-जब शिवजी द्वारा सम्पादित एक 'अभिनन्दन ग्रन्थ' मुझे पुनः भेंट किया गया। इस ग्रन्थ का प्रकाशन महिला चर्खा समिति, पटना की ओर से हुआ था। 1950 में भी आरा नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा प्रकाशित 'अभिनन्दन ग्रन्थ' मुझे शिवजी के ही सद्भावना स्वरूप प्राप्त हुआ था।

मैं अपने को अभिनन्दनीय नहीं मानता। अगर कोई चीज अभिनन्दनीय है, तो वे आदर्श या उद्देश्य जिनके लिए हम काम करते हैं। शिवजी-ऐसे तपःपूत साहित्यकारों के प्रेम-भाव से मुझे बराबर प्रेरणा मिलती रही है, गांधीजी द्वारा बताये गये सत्य के मार्ग पर और साहस के साथ आगे बढ़ने की।

एक साहित्य-प्रेमी के नाते मेरा साहित्यकार शिवजी से परिचय बहुत पुराना था। निजी परिचय भी काफी पहले हुआ। मेरे लिए यह कहना भी सम्भव नहीं है कि मेरा निजी परिचय आचार्य शिवपूजन सहाय के साथ कब हुआ। उनकी हिन्दी की सेवा की ख्याति उनसे मिलने से पहले ही मुझ तक पहुंच चुकी थी। शुरू से ही शिवजी हिन्दी के एक अत्यन्त निस्पृह, मूक सेवक थे और अपनी सारी जिन्दगी इसी प्रकार की मूक-सेवा में उन्होंने बिता दी। फिर भी धीरे-धीरे उनके त्याग का सौरभ फैलने लगा। उन्हें ख्याति मिली और यश भी।

मेरा भी उनसे एक निजी काम पड़ा और मेरा उनका परिचय घनिष्ठ सम्बन्ध में परिणत हो गया। मैंने जेल में बैठकर अपनी 'आत्मकथा' लिखी थी। जेल से निकलने पर मुझे इतना समय नहीं मिला कि मैं उसको दोहराऊं। यह शिवजी की ही कृपा का फल था कि वह 'आत्मकथा' प्रकाश में आ सकी। अत्यन्त अपनापे से उन्होंने हस्तलिखित प्रति ले ली और बहुत परिश्रम कर के आद्योपान्त सब कुछ पढ़ा ही नहीं, बल्कि जहां-तहां लिखने में जो थोड़ी भूलें रह गई थीं उनको भी सुधारा और मुद्रण प्रति तैयार कर दी। मैं उनकी इस प्रेमपूर्ण सहायता की जितनी प्रशंसा करूं, वह थोड़ी है।

इसका महत्व तब बढ़ जाता है, जब हम जानते हैं कि इस प्रकार की सहायता नामालूम कितने लोगों की की थी।  उनके पास समय का नितांत अभाव था। फिर भी सृजन,संशोधन तथा सम्पादन के गुरुतर-भार का सतत निर्वाह करते हुए उन्होंने अपने वरदहस्त द्वारा कितने नये लेखक पैदा किए। पुराने लेखकों को तो उनसे सहारा मिलता ही था। बिहार के हिन्दी साहित्य की जानकारी जितनी उनको थी, शायद ही और किसी को हो। उनके निधन से बिहार ही नहीं समस्त हिन्दी-जगत को बड़ी क्षति पहुंची है। बिहार के साहित्यसएवी तो एक प्रकार से निस्सहाय से हो गए हैं। मेरी यह आशा और कामना है कि इस प्रकार के हिन्दी-सेवक देश में और अधिक पैदा हों। हिन्दी-सेवा देश-सेवा का अभिन्न यंग है।   

 

साहित्य-साधन के प्रतीक आचार्य शिवपूजन सहाय

- सेठ गोविन्ददास

साहित्यकार तो बहुत हो सकते हैं, हैं भी, पर साधक बिरले ही होते हैं। आचार्य शिवपूजन सहाय को मैं साहित्यकार से कहीं अधिक साधक के रूप में देखता था, और जो साधक होगा, उसका प्रत्येक पग, प्रवृत्ति और प्रकृति ही प्रज्ञापूर्ण और प्रेरणा-मूलक होगी।

शिवपूजनजी के कृतित्व के अनुरूप उनका व्यक्तित्व भी था। अनवरत श्रम और साधना से वह ज्यों-ज्यों साहित्य भण्डार को भरते गये, एक साधक की भांति उनका शरीर जीर्ण होता गया। प्रायः देखने में आता है कि साधक का शरीर जीर्ण-शीर्ण होता है, पर आत्मा बलवान । फिर साधक सदा ही शरीर (आत्मा) की सत्ता से काम करते हैं, शरीर की नहीं। शिवपूजनजी भी अपनी शारीरिक सत्ता से अनासक्त पर आत्मिक सत्ता से बलशाली थे। एक ओर वह सतत श्रम कर हिन्दी को उसके शब्द भण्डार से नहीं, अपितु साहित्य भण्डार से समृद्ध करते गये, और ज्यों-ज्यों उनकी साधना के अंतिम दिन आये, अपनी शारीरिक अक्षमता के बावजूद पूरी आत्मिक शक्ति से उन्होंने हिन्दी को समृद्ध किया।

इस प्रकार साहित्य के विविध सोपानों से साहित्य जगत में कुछ प्रेरणा, कुछ प्रसाद और कुछ परम्पराएं छोड़ जाने में सफल शिवपूजनजी अपने व्यक्तित्व और कृतित्व के साम्य से अपने जीवनकाल में और उसके बाद तो और अधिक सशक्त और बलशाली बन गए।

 

 विनय और शील के मूर्तिमान रूप 'शिवजी'

- डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी

आचार्य शिवपूजन सहाय जी विनय और शील के मूर्तिमान रूप थे। साहित्य-सेवा उनके स्वभाव का अंग थी। कालिदास ने जिसे 'काञ्चन-पद्म-धर्मिता' कहा है, वह पूर्णरूप से उनमें मिलती थी-दृढ़, उज्ज्वल और कोमल !

उन्हें जीवन में बहुत संघर्ष करना पड़ा। बहुत विषपान करके उन्होंने साहित्य को अमृत दान किया था। संघर्षों से वे कभी विचलित नहीं हुए। 'प्राप्तं प्राप्त-मुपासीत हृदये नापराजितः' वाले आदर्श ने उनके भीतर स्थिर निवास पाया था। वे बड़े ही स्वाभिमानी और मनस्वी थे, परन्तु स्वाभिमान अनेक कवचों से सुरक्षित था। मैं ऐसे स्वाभिमानियों को जानता हूँ जो । दूसरों का असम्मान ही आत्म-गौरव का चिह्न मानते हैं। शिवजी बिलकुल भिन्न थे। वे सच्चे हृदय से दूसरों का सम्मान करते थे। अपने से बहुत कनिष्ठ लोगों के गुणों का भी वे सम्मान करते थे। उनका स्वाभिमान कभी भी आक्रामक नहीं हुआ। क्योंकि वे भीतर से महान थे। अपने गौरव के प्रति उनके मन में दृढ़ आस्था थी, इसलिए वे खुले हृदय से दूसरों का सम्मान कर सकते थे। वे सही अर्थों में 'अजातशतु' थे।

चरित्रगत दृढ़ता, लेखनगत ईमानदारी और मनुष्य के सहज चरित्रगुण में अटूट आस्था ने उन्हें अपने ढंग का अद्वितीय व्यक्तित्व दिया था। वे अपना उपमान आप ही थे- 'गगनं गनाकारम्'

 

निष्ठावान् कार्यकर्त्ता आ.शिवपूजन सहाय  

- वासुदेव शरण अग्रवाल

श्रीशिवपूजन सहाय व्यक्ति नहीं, एक संस्था थे। उन्होंने लगभग दस वर्षों के भीतर जो महनीय कार्य किया, वह बिहार के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखा जायगा। हिन्दी-साहित्य के क्षेत्र में आज कोई संस्था ऐसी नहीं दिखायी देती, जिसने इतने सीमित समय में, साहित्य के इतने अधिक क्षेत्रों में, इतने अधिक विद्वानों का सहयोग प्राप्त करके इतना अधिक कार्य किया हो। कभी-कभी यह सोचकर आश्चर्य होता है कि शिवपूजनजी के भीतर वह कौन-सी शक्ति थी, जिसके बल से उनकी कार्यसिद्धि ऐसी बहुमुखी हो सकी। इसमें एक हेतु तो उनका अपरम्पार सौजन्य था। सच्चे साहित्यिक को तो वे अपना इष्टदेव समझते थे और उसके प्रति उनका निजी अहं नितान्त विगलित हो जाता था, जिसका हमने प्रत्यक्ष अनुभव किया।

बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् शिवपूजन बाबू की कीर्त्तिपताका है। परिषद् की ध्वजा पर शिवपूजनजी का नाम स्वतः अंकित है और जो उसका अर्थ पढ़ सकते हैं, उन्हें प्रतीत होता कि कर्मण्यता, व्यवस्था, सत्य और नवीन कल्पना के स्वस्तिक से परिषद् के जीवन का विकास हुआ है, और जबतक उसके अधिकारियों में ये चार गुण बने रहेंगे, तब तक परिषद् की प्राणवत्ता भी बनी रहेगी। भूत शरीर धारण करके आवागमन सबके लिए है, जो आया है उसके लिए यात्रा का अन्त भी निश्चित है। किन्तु अपने अन्तवान् नश्वर शरीर के द्वारा शिवपूजनजी जो मूर्त्ति ढाल गये हैं, उसका सौन्दर्य अनन्त है, और वह बिहार एवं उससे बाहर भी सभी हिन्दी-सेवियों के मानस को प्रफुल्लित करता है।

 

‘विनय के वास्तविक रूप’ आ.शिवपूजन सहाय

-    फा. कामिल बुल्के

मुझे लगभग पंद्रह वर्ष पहले आचेरी शिवपूजनजी के संपर्क में आने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। हर मुलाकात से उनके प्रति मेरी श्रद्धा बढ़ती गई और अब मेरे हृदय-मंदिर की दीवार पर विणयमूर्त्ति,सौजाण्यावतार, परमपूज्य एवं परम प्रिय शिवपूजनजी का चित्र सदा-सर्वदा के लिए अंकित है।

परलोक में पहुँचने पर मुझे अपनी जन्मभूमि के काम लोगों से मिलने कि उत्सुकता रहेगी;क्योंकि वहाँ के काम लोगों से ही मेरा निकट का संपर्क हो पाया है। अपनी नई मातृभूमि भारत के बहुत से अच्छे-अच्छे लोगों का मुझे परिचय प्राप्त हो सका है, और उनमें एक शिवपूजनजी हैं। परलोक में पहुंचकर मुझे उनसे मिलकर अनिर्वचनीय आनंद का अनुभव होगा और मैं उनके सामने नतमस्तक होकर उनको धन्यवाद भी दूंगा कि उनसे मैंने जान लिया था कि विनय का वास्तविक स्वरूप क्या है।     

 

'तुम्हें प्रणाम'

- डॉ. हरिवंश राय 'बच्चन'

हिन्दी का एक और महारथी

लुप्त नहीं, प्रकट हुआ,

अविचल रहेगा सदा

अपनी जगह

अपने पूर्वजों की तरह

वाणी का क्षेत्र है,

मृत्यु जहां जन्म दिया करती है।

भस्म हुई काया थी-

यश-काया जलती है, न मरती है,

काल-जयी युग-युग निखरती है।

वाङ्मयस्वरूप धार

खड़ा हुआ ज्यों पहाड़,

पीठ पर बहुत बड़ा साया है।

आओ, नव जोधाओ !

सन्मुख बाधाओं, विरोधों का

निर्भय करो निदान, हिन्दी की शक्ति और क्षमता का

 देना तुम्हें प्रणाम !


Monday, May 25, 2026

 

२५ मई २०२६  

नई किताब

हिंदी नव जागरण के एक प्रतिष्ठित लेखक हैं – शिवपूजन सहाय | लेखक-सम्पादक के रूप में हिंदी भाषा के प्रमुख प्रवर्त्तकों-उन्नायकों में उनका नाम अग्रगण्य है | अपनी उच्च-स्तरीय साहित्यिक पत्रकारिता के अलावा उन्होंने हिंदी साहित्य को कुछ अविस्मरणीय कहानियों और एक सर्वथा अतुलनीय उपन्यास ‘देहाती दुनिया के साथ अपने संस्मरण, साहित्यिक निबंध और हास्य-व्यंग्य लेखन की अप्रतिम और विपुल राशि से समृद्ध किया है | हिंदी भाषा और साहित्य के आधुनिक काल में आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की परंपरा में आचार्य शिवपूजन सहाय का आचार्यत्त्व समतुल्य माना जाता है | यह वर्ष २०२६ उनके विस्मयकारी-रूप से आधुनिक और प्रयोग-धर्मी एक ही उपन्यास ‘देहाती दुनिया’ का शती-वर्ष भी है, और इसी वर्ष उस उपन्यास के कई विशेष हिंदी-अंग्रेजी संस्करण प्रकाशित हो रहे हैं | हाल के वर्षों में शिवपूजन सहाय पर केन्द्रित कई और पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं जिनके विषय में सूचनाएं इन ब्लोगों पर पहले भी पढ़ी गयी हैं |

अभी आज जो नई पुस्तक ‘शिवपूजन सहाय: जीवन और साहित्य’ भारत सरकार के प्रकाशन विभाग से छप कर आई है उसकी प्रस्तावना का मुख्यांश आप यहाँ पढ़ सकते है | पुस्तक पेपरबैक में मात्र २९०/- में प्रकाशन विभाग के सभी विक्रय केन्द्रों (दिल्ली, कलकत्ता, पटना, लखनऊ) में उपलब्ध है | अपने २७० पृष्ठों में आचार्य शिवजी के जीवन और साहित्य का एक  संक्षिप्त अपितु सम्यक प्रामाणिक परिचय पहली बार अपनी सम्पूर्णता में आपके लिए अब सुलभ है |

 






शिवपूजन सहाय

जीवन और साहित्य

लेखक :मंगलमूर्त्ति

भूमिका                                                 

शिवपूजन सहाय ने १९२७ में अपने एक पत्र में लिखा था – “मेरा जीवन एक निराला उपन्यास ही है |” 

किसी रचनाकार अथवा कलाकार का जीवन उसके कृतित्त्व से अविभाज्य और एकाकार होता है | उसका व्यक्तित्त्व और कृतित्त्व एक ही सिक्के के दो पहलू जैसे होते हैं | शिवपूजन सहाय के ‘निराला उपन्यास पद में संभवतः यही प्रछन्न संकेत है – उसका ‘निरालापन उस जीवन की इसी व्यक्ति-कृति की एकात्मता में निहित है | इसी अर्थ में किसी रचनाकार अथवा कलाकार की जीवनी में व्यक्ति को उसकी कृति से अलग न देख पाने की विशेषता में ही उसका ‘निरालापन रेखांकित होता है - जैसे रेल की दोनों पटरियों की सार्थकता केवल उनके द्वैत में ही निहित होती है | ‘साहित्य शब्द ही इसी सह-भावना को इंगित करता है | इस शब्द से स्पष्टतः शिवपूजन सहाय यही रेखांकित-संकेतित करना चाहते थे कि किस तरह साहित्य-साधना के पथ पर चलते हुए वे एक ऐसा जीवन जी रहे थे जो अनजान बीहड़ों की ओर जाने वाला एक अलग ही रास्ता था, कई प्रकार के अलौकिक प्रान्तरों से गुजरने वाला, जिस पर उनके जीवन-साथी को भी उनके साथ हाथ-में-हाथ लिए चलना पड़ेगा |

इसी अर्थ में एक साहित्यकार की जीवनी सामान्य जीवनियों से भिन्न होती है | जीवन के प्रारम्भ से ही उसका रंग-ढंग अलग होता है, जैसा शिवपूजन सहाय की आत्मकथा ‘मेरा बचपन और उनके उपन्यास ‘देहाती दुनिया के प्रारम्भिक अध्याय ‘माता का अंचल’ की झिलमिल समानांतरता से विदित होता है | शिवपूजन सहाय के लिए उनका जीवन बचपन से ही एक जादुई कथा (‘निराला उपन्यास) की तरह पल्लवित हुआ, जिसका संकेत उन्होंने अपने जीवन के प्रारम्भ में ही अपने उपन्यास ‘देहाती दुनिया में दे दिया था |

विश्व-साहित्य की तुलना में हिंदी में जीवनी-साहित्य उतना प्रचुर नहीं है | हिंदी में तीन साहित्यिक जीवनियों की चर्चा अधिक होती है – ‘कलम का सिपाही’(अमृत राय, १९६२), ‘निराला की साहित्य-साधना’ (रामविलास शर्मा, १९६९) और ‘आवारा मसीहा (विष्णु प्रभाकर, १९७४) | रामविलासजी ने निराला की जीवनी और उनके साहित्य पर अलग-अलग दो खण्डों में लिखा है, जैसा सामान्यतः साहित्यकारों की अन्य जीवनियों में नहीं होता, लेकिन अमृत राय और विष्णु प्रभाकर की जीवनियों में जीवन और साहित्य पर साथ-साथ विचार किया गया है, जो शायद अधिक तर्क-संगत है | हालांकि यहाँ, प्रस्तुत प्रयास में भी जीवन और साहित्य पर अलग-अलग खण्डों में – लेकिन एक ही पुस्तक में, किंचित संक्षिप्त रेखांकन शैली में - विचार किया गया है | यहाँ दृष्टिकोण यह है कि जीवन और साहित्य के विमर्श के मानदंड और प्रकार अलग-अलग रखने से दोनों का स्वरूप अधिक स्पष्टता से उभर पाता है, यद्यपि दोनों में जगह-ब-जगह अभिसारिता (‘कन्वर्जेन्स) भी अनिवार्यतः आ जाती है | और एक ही जिल्द में जीवन और साहित्य की चर्चा अलग-अलग होने से दोनों का परस्पर अवलोकन निकट और सुविधाजनक हो जाता है, और इस तरह अलग-अलग होने पर भी दोनों एक-दूसरे से सुविधापूर्वक जुड़े रहते हैं |

रेखांकन शैली से यहाँ तात्पर्य एक ऐसे आख्यान से है जिसमें बहुत सारे सूत्र-संकेत हैं, जो पाठक को सम्बद्ध प्रसंगों के विस्तार की ओर इंगित करते हैं जिससे आख्यान का आकार अनावश्यक अथवा आनुषांगिक प्रसार से बचा रह सके | टिप्पणियों को भी यथासंभव संक्षिप्त रखने की चेष्टा रही है | बहुत सारी प्रासंगिक सामग्री को परिशिष्ट अथवा सन्दर्भ-टिप्पणियों के रूप में दिया गया है | इस दृष्टिकोण से शिवपूजन सहाय की यह जीवनी उनके जीवन और साहित्य के दोनों पक्षों का गहरी रेखाओं से अंकित एक सांकेतिक रेखाचित्र प्रस्तुत करती है, और इस अर्थ में यह जीवनी-पुस्तक उपर्युल्लिखित तीनो जीवनियों से अलग है | यहाँ प्रयास है शिवपूजन सहाय के ‘निराले उपन्यास’ को लिखना नहीं, वरन उसका एक छाया-चित्र प्रस्तुत करना, पाठक को उसके ‘निरालेपन का एक आभास उपलब्ध कराना, क्योंकि सहायजी का यह ‘निराला उपन्यास उस ज़माने की कहानी है, जो कविवर ‘बच्चन के इन शब्दों में व्यक्त हुआ है - “सहायजी को पढ़ना उनकी आँखों से एक ऐसे युग का साक्षात्कार करना है जो अपनी सदाशयता, आदर्शवादिता, तथा रोचकता लिए सदा के लिए चला गया है |”

शिवजी के जीवन का यह ‘निराला उपन्यास सचमुच एक बीते हुए ‘युग का साक्षात्कार ही है जिसको लिखने का प्रयास कुछ जेम्स ज्वायस के ‘युलिसीज़ के एक दिन के इतिहास को लिखने जैसा होता | शिवजी के जीवन के विस्तार में एक विशेष प्रकार के उथल-पुथल-भरे जीवन और समाज का एक विराट चित्र दीखता है, जिसे किसी सामान्य जीवनी के रूप में चित्रित नहीं किया जा सकता | उस युग के लोगों के चित्रों को देखने के लिए शिवपूजन सहाय के संस्मरणों, उनकी साहित्यिक पत्रकारिता, उनकी डायरियों, उनके साहित्यिक पत्राचार के अनदेखे गलियारों से गुज़रना होगा, उस युग के साहित्य के उन बीहड़ों में जाना होगा जिन सब को उनके ‘साहित्य-समग्र में संचित करने का प्रयास हुआ है |

एक क्षीण-काय, औसत कद-काठी के तन वाले शिवपूजन सहाय के व्यक्तित्व में उनके अनेक समकालीन समानधर्माओं ने एक विराट मानव के दर्शन किये थे, और इस लेखक को तो उसी रक्त-मांस की दुर्बल काया से अपना जीवन-धारण करने का सौभाग्य ही नहीं प्राप्त हुआ, वरन उस विराट महापुरुष के जीवन के अंतिम तृतीयांश के साथ-साथ छायावत अपने जीवन के प्रथम तृतीयांश का समय बिताने का दुर्लभ संयोग प्राप्त हुआ, जिससे वह उस विराटता की वात्सल्य-परिधि में ही पला-बढ़ा | उपर्युल्लिखित जीवनियों के तीनों लेखकों के अपने चरित-नायकों के साथ सम्बन्ध बिलकुल वैसे ही नहीं रहे | विष्णु प्रभाकरजी ने तो शरतचन्द्र को कभी देखा भी नहीं था | अमृतराय ने भी अपने पिता प्रेमचंद को आगे चलकर उनके और उनसे सम्बद्ध साहित्य से ही जाना | पिता की मृत्यु का वास्तविक चित्र भी उन्होंने ‘कलम का सिपाही में अपनी माता शिवरानी देवी की संस्मरण-पुस्तक ‘प्रेमचंद घर में से ही उद्धृत किया | रामविलास शर्मा का निराला के साथ साहचर्य भी एक साहित्य-प्रेमी सहयोगी का ही रहा | निराला के व्यक्ति और आत्मा को यदि किसी ने प्रत्यक्ष और निकटतम देखा तो वे शिवपूजन सहाय ही थे, और निराला के उनके लिखे संस्मरण ही इसका प्रमाण हैं | निराला के अन्तरंग मानव-व्यक्तित्त्व का जैसा सच्चा चित्र शिवपूजन सहाय के संस्मरणों में मिलता है, कहीं अन्यत्र नहीं मिलता | उसी प्रकार प्रेमचंद का जैसा चित्र शिवपूजन सहाय के संस्मरणों में मिलता है वैसा और कहीं नहीं मिलता, जबकि प्रेमचंद और निराला – दोनों की जीवनियाँ लिखने वाले उनके आत्मज या अभिन्न मित्र ही रहे |   

साहित्यकारों अथवा कलाकारों की जीवनियाँ अन्य प्रकार (राजनीति, धर्म, दर्शन, व्यवसाय, जैसे क्षेत्रों) की जीवनियों से कुछ अर्थों में भिन्न या ‘निराली होती हैं, क्योंकि उनमें चरित-नायक और उसकी कला अधिक सांद्रता से एकाकार हो जाती हैं, और वह जीवनी उस अर्थ में स्वयं एक कलात्मक रचना हो जाती है, जिसको शिवपूजन सहाय (यदि लिखा जा सके तो ) एक ‘निराला उपन्यास कहते हैं – ‘निराला शायद उसके यथार्थ के अनिवार्य जादुइकरण के कारण, जो गुण साहित्य और कला में अन्तर्निहित होता है |

उपन्यास जीवन को ही उसकी समग्रता में चित्रित करने का एक अनिवार्यतः अधूरा प्रयास होता है, और जिस तरह उपन्यास में एक (यथार्थ अनुभवों से उद्भूत) चरित-नायक का काल्पनिक जीवन-संसार चित्रित होता है, किसी साहित्यकार अथवा कलाकार का जीवन-चरित एक विशिष्ट कल्पना-जगत में अवस्थित होने के कारण, उसमें एक अनिवार्य ‘निरालापन आ जाता है, क्योंकि अन्य प्रकार की जीवनियों की तुलना में वह आदि से अंत तक सदा एक कल्पना-जगत (साहित्य अथवा कला) की परिधि में ही घूमता रहता है | शिवपूजन सहाय के अपने जीवन को एक अलिखित ‘निराला उपन्यास कहने का अभिप्राय यह भी है कि उसका सारा यथार्थ उसके सीमान्त तक सर्वथा विलक्षण और अविश्वसनीय है | और उनके यह कहने में एक और संकेत छिपा है कि इसका एक सामान्य औपन्यासिक कथा के रूप में लिखा जाना उस तरह शायद संभव भी नहीं है |

शिवपूजन सहाय के उसी जीवन को जिसे वे ‘एक निराला उपन्यास कहते हैं, इस दृष्टि से देखते हुए, उसकी ‘अलेख्यता’ को ध्यान में रखते हुए, इस जीवनी की रूप-रेखा एक संक्षिप्त जीवन-रेखांकन के रूप में प्रस्तुत की गई है, जिसकी ‘अलेख्य व्यापकता को हर जगह सीमित उद्धरणों और सन्दर्भ सूत्रों से इंगित किया गया है | और इस जीवनी के साहित्य-पक्ष को उस जीवनी की पृष्ठभूमि की तरह विवरणित किया गया है, जो पाठक की सुविधा के लिए एक ही पुस्तक में साथ-साथ उपलब्ध होने से - कंठ-संगीत में ताल-वाद्य की तरह – समानांतर रूप से उसको समृद्धि प्रदान करता रहता है |

शिवपूजन सहाय के जीवन को उनके युग से एकीकृत रूप में ही देखा जा सकता है, पूरी तरह अपने युग की विषमताओं, विसंगतियों से प्रताड़ित-प्रभावित, किन्तु उसके साथ ही उच्चतम धार्मिक-नैतिक मूल्यों से अभिषिक्त एक आदर्श जीवन, जो सहज-भाव से समय के थपेड़े खाता उसकी लय और उसके प्रवाह में बहता चला, और इसी में उस जीवन का ‘निरालापन निहित रहा | उनका ‘साहित्य-समग्र (१० खंड) इसी अर्थ में उनकी यथार्थ जीवनी है, जिसमें उनके जीवन और समय की सारी सामग्री– उनके लिखित साहित्य, संस्मरणों, डायरियों, पत्रों में -  सब कुछ एकत्र संचित है; जिसको उनके इस जीवन-रेखांकन के विशद भाष्य की तरह साथ-साथ पढ़ा जा सकता है, और जिससे उसके ‘निरालेपन को प्रच्छन्न रूप में सहज ही अनुभव किया जा सकता है, क्योंकि किसी लिखित ‘उपन्यास-रूप जीवनी के सीमित आकार में उस ‘निरालेपन को देखना शायद संभव भी नहीं होता |

अंगरेजी साहित्य में भी साहित्यिक जीवनियाँ कई प्रकार से लिखी जाती रही हैं, जैसे हिंदी साहित्य में भी; एक तो, औपन्यासिक शैली में, जिसमें कल्पना के तत्त्व की प्रधानता होती है – जैसे विष्णु प्रभाकर का ‘आवारा मसीहा’; या जिसमें, औपन्यासिक शैली में ही, तथ्यों को एक विशेष दृष्टिकोण से छानकर-सजाकर रखा जाता है, एक पूर्व-कल्पित चित्रांकन की तरह – जैसे अमृतराय का ‘कलम का सिपाही’; या फिर पत्रकारिता की मुक्त रिपोर्ताज शैली में – जैसे रामविलास शर्मा की ‘निराला की साहित्य साधना | इन सबकी अपनी-अपनी सार्थकता भी है, और सीमाएं भी हैं | परन्तु, जीवनी-लेखन का एक और तथ्य-परक, व्यापक संकेतों और सन्दर्भों से संवलित रूप भी संभव है – जैसा इस प्रस्तुत जीवनी में है - जिसमें चरित-नायक के संस्मरणों, डायरियों, उद्धरणों से उसके जीवन-क्रम को संपुष्ट करते हुए, उनको अधिक प्रामाणिकता प्रदान करते हुए, और फिर उनको लेखक के अपने अविरल साहचर्य के अनुभवों से संपूरित करते हुए एक रेखा-चित्रित कथानक की तरह प्रस्तुत किया गया है | यह शिवपूजन सहाय के उस प्रकल्पित विस्तारित ‘निराला उपन्यास की एक संक्षिप्त आख्यायिका जैसा प्रयास है, जो उस विराट जीवन की विशिष्टता को हर जगह इंगित करता चलता है | इसमें औपन्यासिक कथा-रचना, चरित्र-चित्रण, कल्पना-प्रसूत संवाद, आदि से – जो उपर्युल्लिखित तीनों जीवनियों में प्रचुरता से मिलते हैं - परहेज रखा गया है | इसके जीवनी पक्ष में एक सीधी कहानी शुरू से आखिर तक चलती है, जिसे निश्चित काल-खण्डों में बंटा रखा गया है, और जो अलग-अलग परिस्थितियों में अलग-अलग शहरों में घूमती आगे बढती है |

शिवपूजन सहाय मेरे पिता थे जिन्हें मैंने अपनी हथेली की लकीरों की तरह देखा-जाना-छुआ था | उनके जीवन के अंतिम दो दशकों में उनकी छाया की तरह मैं उनके साथ रहा था | उनकी साहित्यिक संग्राहक-वृत्ति का भी मैं सबसे घनिष्ठ साझीदार रहा; और उनके साहित्यिक बहुमूल्य संग्रह के संरक्षण-व्यवस्थापन में उनके निधन के बाद तो और सन्नद्ध हो गया; उनके रुग्ण जीवन में, उनके स्वास्थ्य-सेवा में, उनकी देख-भाल में, एक प्रकार से उनका सबसे प्रतिबद्ध निजी सेवक और सहायक ही रहा | फिर आगे चल कर एक साहित्य-अध्येता की तरह उनके समस्त साहित्य का प्रारम्भ से सर्वाधिक समर्पित पाठक रहा, और ‘साहित्य-समग्र के रूप में उस सम्पूर्ण साहित्य का एक परिश्रमशील सम्पादक भी रहा | और अब मैं, उनका आत्मज, अपने जीवन के इस अंतिम चरण में, उनके घनिष्ठ साहचर्य में बीते दो दशकों के वात्सल्य-पूरित अनुभवों से अभिसिंचित, और वर्षों तक  उनसे सम्बद्ध सघन अध्ययन-मनन से समृद्ध, इस जीवनी-लेखन के माध्यम से, उनको इस रूप में अपनी श्रद्धांजलि समर्पित करते हुए अपने को परम सौभाग्यशाली मानता हूँ |

-    मंगलमूर्त्ति




[ आ. शिवपूजन सहाय स्मारक न्यास के अधिकृत ब्लॉग shivapoojan.blogspot.com पर न्यास की गतिविधियों की सूचना यथासमय प्रकाशित होती रहती है | आ. शिव से सम्बद्ध हाल में प्रकाशित अन्य  सभी पुस्तकों के विवरण वहाँ देखे जा सकते हैं | उनका लिखा सम्पूर्ण प्रकाशित-अप्रकाशित साहित्य भी न्यास के स्वत्त्वाधिकार (C) के अंतर्गत’ शिवपूजन सहाय साहित्य-समग्र’ नाम से १० खण्डों में अनामिका प्रकाशन, दरिया गंज, नई दिल्ली से २०११ में प्रकाशित हो चुका है (सजिल्द-११,०००/-, अजिल्द-४,०००/-, मो. 9773508632) और उसमें प्रकाशित समस्त साहित्य का एकमात्र स्वत्त्वाधिकार केवल न्यास के पास वैधानिक निबंधन के अंतर्गत सुरक्षित है | (C) से सम्बद्ध विज्ञप्ति के विषय में न्यास के ब्लॉग पर अलग से भी सूचना प्रकाशित की गई है | आ. शिव से सम्बद्ध इनमें से कुछ पुस्तकें न्यास के (C) के अधीन ही इधर वैल्यू पब्लिकेशन्स, दिल्ली (मो.9868035385) से भी प्रकाशित हुई हैं | ये सभी पुस्तकें अनामिका या वैल्यू पब्लिकेशन्स से फोन करके विशेष छूट पर मंगाई जा सकती हैं | जीवनी वाली यह नई पुस्तक भी पटना और लखनऊ में उपलब्ध है |]