‘देहाती दुनिया’ :
अनुवाद-प्रसंग
और गौतम चौबे से भेंट
गौतम चौबे से मेरा परिचय प्रसंगवश हुआ. प्रसंग था ‘देहाती दुनिया’ का अंग्रेजी अनुवाद. यह ‘देहाती दुनिया’ का शती-वर्ष है: २०२६. सौ वर्ष पहले प्रकाशित आ. शिवपूजन सहाय के इस उपन्यास का एक नया अंग्रेजी अनुवादित संस्करण भी इसी वर्ष प्रकाशित करने की योजना है. इसका अंग्रेजी अनुवाद एक चुनौतीपूर्ण कार्य है. लेकिन मैं अब सारा समय लगाकर इस अंग्रेजी अनुवाद को मार्च तक पूरा कर लूँगा. ‘देहाती दुनिया’ हिंदी का एक विशिष्ट उपन्यास है. अंग्रेजी में अनुवाद से यह और व्यापक प्रसार पा सकेगा. इसी प्रसंग में हाल में गौतम चौबे से मेरा संपर्क हुआ. उनके दो अनुवाद प्रकाशित हुए हैं – एक भोजपुरी के उपन्यास ‘फुलसुंघी’ का, और दूसरा निराला के लघु उपन्यास - ‘बिल्लेसुर बकरिहा’ और कुछ कहानियों का, अंग्रेजी में ‘A Portrait of Love’ (‘प्रेमिका परिचय’) नाम से. उनकी ये दोनों किताबें पेंग्विन से प्रकाशित हुई हैं. उनका अपना भी एक मौलिक हिंदी उपन्यास ‘चक्का जाम’ राधाकृष्ण प्रकाशन से आया है. उनकी कुछ और भी पुस्तकें प्रकाशित हैं. हिंदी-अंग्रेजी और अनुवाद पर एक साथ ऐसा प्रभूत अधिकार उनकी प्रतिभा की ओर सहसा ध्यान आकृष्ट करता है. जीवन के अंतिम चरण में मेरा-उनका यह सानिध्य एक सहज सौभाग्य ही है. उनके स्वभाव की सौम्यता उनके मुखमंडल से ही प्रभासित होती है. किसी पारिवारिक प्रसंग में जब वे लखनऊ आये तो फोन करके मुझसे एक ‘छोटी सी मुलाकात’ के लिए भी मेरे पास चले आये.
उनकी अंग्रेजी अनुवाद वाली दो किताबें मैंने अमेज़न से पहले ही मंगाई थीं. अपना सद्यः प्रकाशित हिंदी उपन्यास ‘चक्का जाम’ उन्होंने मुझे भेंट में दिया. ‘देहाती दुनिया’ के अनुवाद पर मेरी उनसे संक्षिप्त बातचीत हुई. उनके दोनों अंग्रेजी अनुवाद बहुत सफल और सुन्दर हैं. हिंदी के लेखकों की रचनाओं का अंग्रेजी में अच्छा अनुवाद तो सचमुच बहुत कम हुआ है. गीताश्री के हिंदी उपन्यास ‘रेत समाधि’
का अनुवाद डेज़ी रॉकवेल ने अंग्रेजी में किया जिसे अनुवाद का बुकर पुरस्कार मिला. पुरस्कारों की अलग राजनीति है, नोबेल शांति पुरस्कार के बाद अब यह बिलकुल स्पष्ट है. लेकिन अंग्रेजी अनुवाद से हिंदी के लेखन को राष्ट्रिय ही नहीं वैश्विक दृष्टिगोचरता मिलती है. उसका आर्थिक पक्ष भी अधिक संपुष्ट हो जाता है. हिंदी के अपने समालोचना क्षेत्र में तो बहुत घालमेल है. हिंदी पुस्तकों के अंग्रेजी में अनूदित होने पर उनकी समालोचनात्मक संभावनाएं भी अधिक पूर्वाग्रहमुक्त हो जाती हैं.गौतम
चौबे के निराला के अनुवाद निराला के कथा-साहित्य पर नयी रोशनी डालते हैं. मेरी समझ
में, एक अर्थ में पद्य के अनुवाद से गद्य का अनुवाद अधिक संश्लिष्ट हो जाता है,
क्योंकि उसमें शैली के स्वर का महत्त्व अधिक हो जाता है. पद्य में भी मुक्त छंद की
स्वायत्तता उसे गद्य-शैली की ओर ही ले जाती है, जैसे ‘कुकुरमुत्ता’ को
उसकी पद्यात्मकता के बरक्स भी हम एक गद्य-रचना के रूप में देख सकते हैं, जिसमें निराला
की टकसाली गद्य-शैली की स्पष्ट झलक दिखाई देती है. गद्य के अनुवाद में इस शैली के
स्वर को ठीक-ठीक उतरना लगभग असंभव होता है. सच कहें तो, त्रिलोचन के हिंदी सानेटों
में सानेट की संश्लिष्ट पद्यात्मकता से अधिक गद्यात्मकता के लक्षण दिखाई देते हैं.
उनमें पद्य के स्वाभाविक गुण उस तरह नहीं दिखाई देते. लेकिन उनके सानेटों में स्वायत्त
गद्य-शैली का एक आभास बराबर बना रहता है; उनमें हर जगह त्रिलोचन की विशिष्ट गद्य-शैली
की एक स्पष्ट छाप बनी रहती है, जिससे उनके छंद-बद्ध गीत प्रायः मुक्त लगते हैं.
इससे इस बात की पुष्टि होती है कि गद्य में शैली की उपस्थिति प्रखरतर होती है,
जिसे अनुवाद में उतारना बहुत कठिन हो जाता है. फलतः हिंदी या किसी अन्य भारतीय
भाषा के कथा-गद्य के अंग्रेजी अनुवाद में शैली की गमक इसीलिए वैसी नहीं मिल पाती. उदाहरण
के लिए हजारी प्रसाद द्विवेदी के ललित निबंधों के अंग्रेजी अनुवाद में उनकी
निबंध-शैली को प्रतिच्छवित करना इसी कारण बहुत कठिन होगा.
अनुवाद
एक अत्यंत संश्लिष्ट सृजन-क्रिया है, लेकिन उसका उद्देश्य किसी रचना के मूल-कथ्य
को किसी दूसरी भाषा में अधिक-से-अधिक सम्पूर्णता के साथ, एक सामान्य स्वीकृत
भाषा-शैली में अभिव्यक्त करना ही हो सकता है | किसी भी रूप-परिवर्त्तन में मूल
को परिवर्त्तित रूप में ही देखा-दिखाया जा सकता है, जो सौ प्रतिशत सफल होकर भी एक
नवीन भिन्नता ले ही लेगा. इसीलिए किसी अच्छे अनुवाद की एक नई मौलिक कृति के रूप
में ही परख होनी चाहिए – वह प्रतिच्छाया न होकर एक स्वतंत्र नवीन कृति जैसी लगनी
चाहिए |
‘देहाती
दुनिया’ में कथा-गद्य का एक अन्यतम रूप
परिलक्षित होता है. उसकी कथा-भाषा एक क्षेत्र-विशेष की बोल-चाल की नवोन्वेषित भाषा
है, जो हिंदी उपन्यास-विधा के प्रारंभिक विकास के दिनों की कथा-भाषा से अपनी भिन्नता
और नवीनता के बारीकी से देखे जाने की मांग करती है. उसमें सारी मुहावरेबाजी और
लोकोक्तियाँ उस अंचल-विशेष के, उन दिनों के ग्रामीण सामाजिक जीवन को आश्चर्यजनक
रूप से जीवंत और उजागर करती हैं. सामान्यतः उपन्यासों में कथा-भाषा का कथावस्तु के
चरित्र से अनिवार्य सामंजस्य होता है. अर्थात, एक ही
लेखक को अपने हर उपन्यास के लिए एक तदनुकूल कथा-भाषा सृजित करनी पड़ती है, जिसमें
ही उसका वह कथा-संसार चित्रित हो पाता है. लेकिन महत्त्वपूर्ण यह है कि हिंदी
उपन्यास के विकास के प्रारम्भिक दिनों में जब प्रेमचंद – उसी समय हिंदी के सबसे
सफल औपन्यासिक - भी अपने उपन्यासों के लिए उर्दू की बोझिलता से मुक्त हिंदी-मुखी एक
उपयुक्त कथा-भाषा के निर्माण के लिए संघर्ष कर रहे थे (जिसका प्रमाण है उनके
उपन्यास ‘रंगभूमि’ का
शिवपूजन सहाय द्वारा उन्हीं दिनों किया जा रहा सम्पादकीय संशोधन, जो प्रेमचंद की
उर्दू-प्रधान कथा-भाषा को एक स्वीकार्य हिंदी कथा-भाषा के रूप में ढालने का एक सुचिंतित
प्रयास ही है) उसी समय शिवपूजन सहाय अपनी कुछ प्रकाशित कहानियों की अनुप्रास-अलंकृत
भाषा से बिलकुल भिन्न एक सुदूरवर्त्ती ग्रामीण क्षेत्र की बोलचाल की भाषा का हिंदी
में एक संस्कारित रूप – जो उस क्षेत्र-विशेष के लोगों के लिए स्वीकार्य था – वहां के
जीवन को चित्रित करने वाले अपने उपन्यास ‘देहाती दुनिया’ के
लिए जैसे कुम्हार की चाक पर एक नये रूप में गढ़ रहे थे. और यह भी उसी समय जब वे ‘रंगभूमि’ का
संशोधन भी कर रहे थे. हिंदी औपन्यासिक समालोचना में कथा-भाषा की इस विकास-यात्रा
पर, और उसके विशिष्ट शैली-पक्ष पर, अबतक भी संभवतः पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया
है. लेकिन गद्य में कथा-साहित्य के अनुवादक के लिए कथा-भाषा का यह प्रश्न विशेष
महत्त्वपूर्ण हो जाता है. बच्चनजी की ‘आत्मकथा’ का
अंग्रेजी में अनुवाद करने वाले रूपर्ट स्नेल ने अनुवाद में गद्य-शैली के इस प्रश्न पर गम्भीरता से विचार
किया है.
गौतम
चौबे के निराला के कथा-साहित्य के अनुवादों को पढ़ते हुए, और इन्हीं दिनों शिवपूजन
सहाय की ‘देहाती दुनिया’ का
अनुवाद करते हुए, इस प्रसंग में उनसे संपर्क-बातचीत और भेंट-संयोग एक अत्यंत
समीचीन घटना थी. इस प्रसंग में मेरी उनसे बातचीत और विमर्श का मेरे लिए बहुत
महत्त्व है, और मुझको अपने अनुवाद-कर्म में इससे बहुत लाभ होगा, ऐसा सहज अनुमेय है.
गौतम
चौबे इसी ११ जनवरी को लखनऊ से अपनी वापसी में एअरपोर्ट जाते समय १५-२० मिनट के लिए
मुझसे मिलने आये. उनकी अंग्रेजी में अनुवाद वाली दो पुस्तकें मैं पहले ही मंगा चुका
था, हिंदी का अपना नया उपन्यास ‘चक्का
जाम’ उन्होंने मुझको भेंट किया.
मैंने देखा २०२४ में प्रकाशित हिंदी के इस छोटे-से उपन्यास का २०२५ में ही दूसरा
संस्करण आ गया है. पेशे से अंग्रजी प्रोफ़ेसर एक नए लेखक का यह हिंदी में पहला
उपन्यास है जिसका कथा-फलक बिहार के एक अंचल-विशेष का जीवन बड़ी कुशलता और संयम से
चित्रित करता है. जिसके कथन में भाषा की चुस्ती-ताज़गी के साथ बुनावट की कारीगरी –
अल्बम के उलटते पृष्ठों पर लगे छोटे-छोटे चित्रों के साथ आगे बढ़ती कहानी - कथाकार
के भविष्य की संभावनाओं की ओर बार-बार इंगित करती है.
‘फूलसूंघी’
बिहार के एक अल्पज्ञात लेखक पाण्डेय कपिल के भोजपुरी उपन्यास का सुन्दर हिंदी
अनुवाद है. उनके पितामह दामोदर सहाय ‘कविकिंकर’(1875-1932)
भारतेंदु हरिश्चंद्र की अगली पीढ़ी के साहित्यकार थे, और
मेरे पिता के परिचित बुज़ुर्ग साहित्यकार थे. ‘फूलसूंघी’ का कथा-आधार मुजफ्फरपुर की
गायिका तवायफ ढेलाबाई और भोजपुरी के कवि-गायक महेंदर मिसिर की प्रेम-कहानी पर
आधारित है, जो दोनों वास्तविक जीवन की लोक-कथा के चरित्र थे. भोजपुरी में लिखे गए
इस उपन्यास के अंग्रेजी में अनुवाद से एक भूली-बिसरी कहानी आज के अभिजात्य
पाठक-वर्ग के लिए प्रकाश में आ गयी है, और अंग्रेजी में अनूदित होने से उसकी
पठनीयता और रोचकता सहसा बहुत व्यापक हो गयी है. गौतम चौबे का एक लघु उपन्यास का भोजपुरी
से अंग्रेजी में यह अनुवाद एक स्वागतयोग्य प्रयोग है.
लेकिन गौतम
चौबे द्वारा अनूदित निराला-कथा-साहित्य में सबसे महत्त्वपूर्ण है निराला के एक लघु-उपन्यास
‘बिल्लेसुर बकरिहा’ और छः
कहानियों (‘सुकुल की बीवी’,’ज्योतिर्मयी’, ‘प्रेमिका-परिचय’, ‘क्या
देखा’, चतुरी चमार’ और ‘देवी’) का ‘A
Portrait of Love’ शीर्षक से अंग्रेजी में सुन्दर
अनुवाद. छायावाद-युग के कवियों में – विशेषकर प्रसाद,
निराला और महादेवी ने विपुल परिमाण में गद्य-लेखन किया है. उपन्यास, कहानी,
संस्मरण, गंभीर समालोचना और पत्रकारिता –
इन सभी विधाओं में यह लेखन प्रसरित है. उस युग में – कविता से इतर – इन गद्य-विधाओं
में इतना प्रचुर लेखन साहित्य सेवा-भाव के साथ-साथ (विशेषकर निराला द्वारा, जिनकी
जीवन-परिस्थितियाँ अत्यंत संघर्षपूर्ण रहीं) जीविकोपार्जन की विवशताओं में भी किया
जाता रहा, यद्यपि इनकी कथायें हिंदी के प्रकाशकों की हृदयहीनता के कारण अत्यधिक करुण
ही रहीं.
कथा-साहित्य
में निराला की तीन प्रकाशित पुस्तकें विशेष उल्लेखनीय हैं – ‘कुल्ली भाट’ (१९३९) ‘बिल्लेसुर
बकरिहा’ (१९४१), और ‘देवी’ (१९४८:कहानी-संग्रह जिसमें १० कहानियां हैं, जिनमें ५ यहाँ
अनूदित हैं). ‘कुल्ली भाट’ और ‘देवी’ (कहानी-संग्रह)
की शेष ५ कहानियों का अनुवाद संभवतः अभी नहीं हुआ है. निराला के समालोचनात्मक-गद्य
और पत्रकारिता-लेखन का भी एक अंग्रेजी-अनूदित संचयन साहित्य अकादेमी को प्रकाशित
करना चाहिए*. एक ऐसा अंग्रेजी में अनूदित संचयन भी प्रकाशित हो सकता है
जिसमें निराला की श्रेष्ठ कवितायें और गद्य-लेखन एकत्र उपलब्ध हों.
‘देहाती
दुनिया’ का मेरा अंग्रेजी अनुवाद भी
शीघ्र ही पूरा होकर इस शती-वर्ष में ही प्रकाशित हो जायेगा ऐसी आशा है. उस
अंग्रेजी अनुवाद का एक छोटा-सा नमूना भी अभी मेरे ब्लॉग पर पढ़ा जा सकता है*.
हिंदी-साहित्य के गौरव-ग्रंथों के अंग्रेजी में अनुवाद का यह सिलसिला आगे बढ़ता रहे
तो यह हिंदी साहित्य के लिए एक शुभ संकेत है.
*निराला
की प्रसिद्ध कविता ‘कुकुरमुत्ता’ का मेरा अंग्रेजी अनुवाद और उस
पर अंग्रेजी में मेरी टिपण्णी साहित्य अकादेमी की पत्रिका Indian
Literature (#341, May-Jun. 2024) में
प्रकाशित हो चुकी है और मेरे ब्लॉग vibhutimurty.blogspot.com (13
May 2024) पर भी पढ़ी जा सकती है.
* देखें vagishwari.blogspot.com (20 Jan 2026)
आलेख एवं चित्र (C) डा. मंगलमूर्त्ति




