शमशाद की याद
मंगलमूर्त्ति
एक :
शमशाद का जीवन एक अधूरा गीत था जिसके दर्द और
मिठास का पैमाना भी उसका अधूरापन
ही था। कीट्स के हाइपीरियन की तरह वह एक खंडित महाकाव्य था जिसके अधूरेपन में ही गीतकाव्य
की पूर्णता के दर्शन होते हैं ।
जब कोई शायर कलियों के चिटखते-चिटखते ही मौत की गर्म आंधी में मुरझा जाता है, तो कीट्स
और शेली की तरह ही वह खुद एक दर्दीला नगमा बन कर रह जाता है। उसकी मौत ही मानों
उसकी शायरी को अमर बना देती है, उसकी पोर-पोर में एक कभी नहीं मिटने वाला दर्द समो देती
है। फिर जब भी हम उसकी शायरी से रूबरू होते हैं, हर बार उसकी मौत का दर्द
उसी के शब्दों की शक्ल में हमको घेरता और रूलाता है।
पुकार लें न कहीं भरी घूप में घनी शाखें
बस एक खौफ यही दोस्तों सफर में था
उभरते-डूबते रिश्तों की घनी छांवों में
एक अजनबी की तरह मैं भी अपने घर में था।
हर शायर अपनों से घिरा एक अजनबी होता है, जिसे अक्सर जिंदगी के शोर-शराबे-भरे मेले
से मौत बहलाकर ले जाती है। शमशाद भी जिंदगी के उभरते-डूबते रिश्तों में उलझा एक ऐसा
ही अजनवी शायर था, मौत जिसका हाथ थामे अपना बना कर ले गई ।
साल का एक वरक़ हटाता हूँ। शमशाद के लिए खून की जरूरत है। अस्पताल से डॉक्टर का
एक पुर्जा कल शाम ही मिला था - ग्रुप ‘ए’ का ६०० सी.सी. खून
चाहिए। आज ही दिन में एन० एस० एस० के लड़के फिर खून देने जाने वाले हैं। डॉक्टर ने
मुझको पहले ही बता दिया है, अब सिर्फ वक्त की बात है; फिर भी खून देने वालों की कतार
तैयार है। तभी उनका छोटा भाई रूमी अहले सुबह मेरे यहाँ आता है - मैं समझता
हूँ, तुरत खून देना है शायद । लेकिन वह मेरे सामने चुप खड़ा है। बड़ी मुश्किल से कह
पाता है - अभी-अभी सुबह भैया चले गये, छह बज कर पाँच में सांस टूट गई।
शमशाद को लोग घर ले आये हैं। उसका अदना-सा जिस्म एक खटोले पर लिटाया गया
है। बाहर वाली उस दालान में जिसको बड़े शौक से वही बनवा रहा था।
लोग खामोश घेरे खड़े हैं। खामोशी में डूबी दालान भी शायद पूछना चाहती है, अपनी शायरी की ही
तरह मुझे भी अधूरी ही छोड़े जा रहे हो? छत से मेरी निगाह धीरे-धीरे उतर कर उस ज़र्द चेहरे पर टिक जाती
है -
उभरते-डूबते रिश्तों की घनी छावों में
एक अजनबी की तरह मैं भी अपने घर में था।….
मैं झुक कर गुलाब की वह कली जो आज ही सुबह मेरे यहाँ खिली थी, उस अजनबी
चेहरे के पास आहिस्ता रख देता हूँ।
कब्रगाह में मैं कुछ देर से पहुंचा हूँ । मस्जिद और कसाईखाने के बीच वीराने
में शमशाद को दफनाया जा चुका है। जंगली घास-पौधों के बीच थोड़ी-सी जगह साफ की गई है,
जहाँ अब कब्र के ऊपर मिट्टी का एक छोटा-सा टीला-सा बना दिया गया है, जिसे फावड़े से
संवार कर एक साफ-सुथरी शक्ल दे दी गयी है। बहुत सारी अगरबत्तियाँ और ढेर सारे फूल सजे
हैं मिट्टी के उस टीले पर, जिसके नीचे शमशाद को हमेशा के लिए सुला दिया गया है। लोग
अब धीरे-धीरे लौट रहे हैं। आलोकधन्वा लेकिन सर झुकाए वहीं खड़े हैं। मैं भी फूल चढ़ाकर
सर झुका लेता हूँ। शेली ने कीट्स की मौत पर जो अमर शोकगीत लिखा है - एडोनेस,
उसकी भूमिका में वह कहता है – ‘जूही, चमेली और गुलबनफ्शा से भरे-सजे इस कब्रगाह को
- जहाँ कीट्स को दफनाया गया है- देखकर तो मुझे भी मौत से प्यार हो गया ।
शमशाद ने हमेशा ही मौत से प्यार का रिश्ता निबाहा। यही प्यार उसकी शायरी
को भी एक दुल्हन की तरह संवार गया। मौत से हमेशा उसने हंस-हंसकर बातें कीं, उसे गले
से लगाये रहा। और हंसी- हंसी में ही उसने मौत का दिल जीत लिया, और उससे अपनी शायरी
के लिए अमरता का वरदान पा लिया। इस दिल्लगी में शमशाद ही जीता और मौत की हार हुई ।
यादों के अलबम के कई पन्ने और उलटता हूँ। हवेली खड़गपुर के वनवर्षा गाँव
में हमने एन० एस० एस० का शिविर लगाया है। पिछले साल भी हमने यहीं शिविर
लगाया था। इस बार फिर शमशाद हमारे साथ हैं। हरिजन टोला वाली कच्ची सड़क की मरम्मत
की जा रही है, और बच्चों के स्कूल के अधूरे कमरे को पूरा किया जा रहा है। स्वयंसेवकों
में काफी उत्साह है।
काम के बीच में विश्राम के क्षण आते हैं, और कभी सड़क पर ही और
कभी स्कूल के पास लड़के मुझको, शमशाद को घेर कर बैठ जाते हैं, और गीत-संगीत,
लतीफों और चुहल में हम सब कुछ भूल जाते हैं। फिर काम शुरू हो जाता है; मैं भी उसमें
मशगूल हो जाता हूँ। और पता नहीं कब शमशाद वहाँ से झील की ओर बढ़ गये,
अकेले, धीरे-धीरे, लंगड़ाते, क्योंकि उनके बायें पाँव में एक जख्म हो गया है,
जो भरना नहीं चाहता, मधुमेह के कारण। काम से हम शिविर को लौट रहे हैं, तब रास्ते में
उनको किसी मेड़ पर लेटा पाते हैं, और वे फिर धीरे-धीरे लंगड़ाते हुए हमारे साथ हो लेते
हैं।
शाम में सकुचाते हुए मुझसे बताते हैं कि उन्होंने वह गीत पूरा कर लिया
है, जो उन्होंने एन० एस० एस० के जवानों के लिए खास तौर से लिखा है। दोपहर भर राजकुमार
के साथ उसकी धुन बनाने में वे लगे रहे हैं, और संध्या के सांस्कृतिक कार्यक्रम में
राजकुमार वह गीत पेश करते हैं-
कदम-कदम पे साथियो चिराग सौ जलायेंगे
नये सफर के वास्ते डगर नयी बनायेंगे
तरस रही हैं लालियों को गाँव की हथेलियाँ
लहू जिगर का दे के उनमें मेंहदियाँ
रचायेंगे
खिला चुके कलम से खूब अक्षरों के फूल हम
जमीं की अब पुकार पर कुदाल भी उठायेंगे
चलेंगी सज के गांव में ये शहर की जवानियाँ
हलों के साज पर हसीन गीत हम भी गायेंगे
सितम की आँधियां हजार जाल फेंकती रहें
दिशा-दिशा में फिर भी एक इन्कलाब लायेंगे
अपने जिगर का लहू देकर सचमुच शमशाद ने इस कूचगीत में भावों की मेंहदी रचाई
है, और उस शिविर के बाद से तो हमेशा-हमेशा यह गीत हमारे होठों पर लरजता रहा है। मुझको
याद है उसके बाद शमशाद अक्सर बीमार-ही-बीमार रहे, और अगले शिविर में जब वे गंभीर रूप
से मुंगेर के अस्पताल में बीमार थे, तो कॉलेज-प्रांगण में लगे शिविर से एक सौ शिविरार्थी
लड़कों की कतारें सुबह-सुबह पूरे शहर के मुख्य मार्गों से अपने प्यारे शायर टीचर प्रो०
शमशाद साहब का यही गीत गाते-गाते उनके अस्पताल के कमरे में उनके बेड तक चली गई थीं,
और शमशाद ने भाव-विह्वल होकर लड़कों को कलेजे से लगा लिया था ।
यादों के अलबम में तस्वीरों की लम्बी कतारें सजी हैं। आँखें उनमें खो जाती
हैं, और भर-भर आती हैं। बारिश हो रही है। रात के नौ बजे हैं - २१ अगस्त,
१९८२; शमशाद को गये अभी तीन ही दिन बीते हैं। बारिश और जोर
से होने लगी है। रोशनी देर से गायब है । लेकिन अंधेरे में काले आसमान में बिजली अक्सर चमक उठती है, जोरों से कड़क उठती है, जैसे धरती का कलेजा चाक
हो रहा हो । और मैं रोशनी की वही लकीर पकड़कर पहुंच गया हूँ कसाईखाने
और मस्जिद के बीच के उस वीराने में, जहाँ जंगली घास-पौधों के बीच मिट्टी के भारी ढेर
के नीचे दबा पड़ा है हमारा अजीज शायर और साथी शमशाद । मैं देख रहा हूँ बिजली की ये
लपलपाती तलवारें बार-बार चूम रही हैं उसकी कब्र को, सलाम पेश कर रही हैं उसे । और मैं
उस अंधेरी रात में हाथ बाँधे वहीं कहीं उस कब्र के पास खड़ा हूँ । बारिश का पानी धरती
में रिस-रिस कर उसको नहला रहा है। कीड़े-मकोड़े उसके इर्द-गिर्द चक्कर लगाने लगे
हैं, उसके रेशे-रेशे को खाक में बदल देना चाहते हैं ।
बारिश अब खुद-ब-खुद थम गई है। ....
दो :
वह एक छोटा–सा शहर था
जहां पूरे शहर के लिए सिर्फ एक पानी टंकी थी । लेकिन छोटा भले ही हो, उस शहर में इतिहास के कई खंडहर थे, और गनीमत थी शहर के
किनारे एक दरिया भी था जिसकी मछलियां बहुत मीठी होती थीं। शहर में एक घंटाघर था और
एक पुराने किले की ढही दीवारें और नेस्तनाबूद कई बुर्ज़ भी थे । किले के एक सिरे
पर एक दरगाह थी
जिसको सदियों पहले शायद किसी मुगल बादशाह ने बनवाया था । वहां चारों ओर एक पवित्र सुगंध
फैली होती थी जिसमें कस्तूरी जैसी एक अजीब खुशबू का अहसास होता था जो लोगों को
अक्सर मज़ार की सीढ़ियां चढ़ने को मजबूर कर देती थी । किले के दूसरे सिरे पर, दरिया किनारे, एक
यूरोपियन सेमेटरी थी जिसमें उस इलाके में हुई किसी लड़ाई में मारे गए योद्धाओं के दर्जनों
कब्र थे जिनमें कई के माथे के सलीब टूट चुके थे, और जिन पर अब कोई चिराग जलाने या फूल
चढ़ाने नहीं आता था ।
एक ऐसा ही यूरोपियन
कब्रगाह शहर की दक्खिनी सीमा पर भी था जिसमें संगमरमरों वाले कई खूबसूरत कब्र थे, जिनमें एक, जैसा उसके संगमरमर पर
बड़े–बड़े हर्फ़ों में लिखा था, उस अंगरेज का भी था जिसने वह घंटाघर उस शहर के लिए एक तोहफे के
तौर पर बनवाया था। यह एक इत्तेफ़ाक ही था कि वह उस शहर में एक लंबे अर्से तक रह गया । उसने कई बार
उस शहर से बाहर किसी बड़े शहर में जाकर रहने का मन बनाया । कई ऐसे मौके खुद–ब–खुद आए
भी, लेकिन जैसे उस
छोटे–से शहर ने उसका दामन थाम लिया हो कि कहां जाओगे, यहीं रहो न ? और इसीलिए वह
कहीं और नहीं जा सका, वहीं रह गया ।
वह अक्सर टहलता हुआ उस ढहे दीवारों वाले किले की
ओर निकल जाता, और कभी–कभी उन कब्रगाहों में भी मन बहलाने चला जाता जिनमें उस छोटे–से शहर का अतीत
दफ़न था । वह एक–एक कब्र पर रुक कर उसकी इबारत को पूरा पढ़ता और उन कब्रों के इर्द–गिर्द चक्कर
लगाते हुए जैसे वह अपने अतीत के खंडहरों में पहुंच जाता जहां नागफनी के उंचे–उंचे मनहूस
दरख़्त बाहें फैलाए चुपचाप खड़े दिखाई देते । जैसे वे कुछ कहना नहीं, बल्कि उसकी अपनी कहानी उससे सुनना चाहते
हों, बस ।
वह अक्सर दरिया के किनारे
भी जाता और वहां देर तक बैठा करता जहां दरिया का बहाव अचानक मुड़कर दूसरी ओर दूर तक जाता दिखाई देता था, और उस मोड़ पर जहां वह अक्सर जाकर बैठता, पानी
की धारा गोल–गोल बड़ी–बड़ी भवरें बनाती तेजी से आगे बढ़ती–बहती दिखाई देती, जिन्हें वह
देर–देर तक बुत की तरह बैठा देखा करता । दरिया का बहाव जिधर से आता और मोड़ से आगे दूसरी ओर जिधर
को जाता – दोनों ओर उसके चौड़े पाट बिलकुल सपाट और स्थिर दिखाई देते, खलबली सारी बस वहीं दिखाई देती जहां आकर दरिया
अचानक मुड़ गया था, और जहां जाने के बाद जैसे वक्त
के बीतने का अहसास ही गुम हो जाता । वहां के क्षितिज में ऐसा विस्तार था जैसा उसने
और कहीं नहीं देखा था, और जब सूरज डूबने को होता, तब तो उस फैले हुए
क्षितिज पर ऐसी सतरंगी आभा छा जाती जो हर लमहा बदलती हुई देखने वाले की आंखों को जैसे
एकटक अपने में बांध लेती, और तब लगता उस सपाट, खामोश दरिया के फैलाव
पर भी वह सतरंगी, पल–पल अपना रूप बदलती आभा दरिया के साथ गलबहिंयां में मिलकर एक हो गई हो । शहर की एक छोर पर एक
ब्रांच लाइन का रेलवे स्टेशन था जिसके पास वाले मुहल्ले में ही वह रहता था । वहां
से शहर के बाजार की ओर
जाने के लिए रेलवे वाली गुमटी को पार करना पड़ता था । बाजार की ओर बढ़ने पर थोड़ी ही
दूर पर एक मस्जिद थी जो
शहर की तीन मस्ज्दिों में सबसे बड़ी थी और जुमें की नमाज में वहां अच्छी–खासी भीड़
जमा होती थी । मस्जिद के
ठीक पीछे एक बूचड़खाना था जिसकी बगल से होकर एक कच्चा रास्ता मुसलमानों के मुहल्ले
को जाता था । वह
अक्सर उस मुहल्ले में जाता था, जहां उसके कई दोस्त रहते थे । मुहल्ले का नाम भी किसी
मुसलमान जागीरदार के नाम पर था
जिसकी कब्र उसी मुहल्ले के किसी गुमनाम कोने में खस्ताहाल पड़ी थी, जिसके बारे में कोई कुछ बता नहीं पाता था
।
उस मुहल्ले के ज्यादातर
लोग मुझे जानते थे, हालांकि वहां की बहुत सारी संकरी, घुमावदार गलियों से मैं नावाक़िफ़ ही रह गया, केवल उस एक गली को छोड़कर
जहां मेरा शागिर्द वह नौजवान शायर रहता था । उस गली का मुहाना बाज़ार की मुख्य सड़क पर
निकलता था और इसका पिछला सिरा मेरे रोज़ के आने–जाने वाले रास्ते से जुड़ा था । लेकिन अब लगता है शायद दो
ही बार मैं उस गली से गुजरा था – एक बार जब ईद की सेवंई खाने के लिए मेरे शागिर्द ने अपने घर पर मुझे
बुलाया था, और दूसरी बार, वही आख़िरी बार, जब मैं उसके सिरहाने एक गुलाब का फूल रखने कुछ देर से वहां पहुंचा
था, जहां गुमसुम सर
झुकाए आठ–दस लोग उसके बिस्तर के चारों ओर खड़े थे । बाहर के छोटे से आयताकार बरामदे में ही
उसकी खाट रखी गई थी जिस पर वह उसी धारीदार कमीज और पाजामे में लेटा था जो उसका रोज का पहनावा था ।
उसकी आंखें बंद थीं और होंठ नीले लग रहे थे । बाल उसके संवार दिये गये थे और सोच में डूबे उसके चेहरे को
देखकर लगता था वह अपनी ही किसी बेरहम ग़ज़ल का मतला हो ।
उस शायर ने अपना एक उपनाम
भी रखा था, लेकिन उसको जानने वाले सब उसको उसके नाम से ही बुलाते थे । उसकी नज़्मों में वह नाम
सबसे निचली सीढ़ी पर गुमसुम बैठा मिलता था जिस पर सुबह की धूप धीरे-धीरे सीढ़ी–दर–सीढ़ी चढ़ रही होती
थी ।
उसके ज्यादातर दोस्त हिंदू
थे, और शहर में उर्दू
की अदबी जमात से उसका लगाव नहीं के बराबर ही था । वह अपनी नज़्मों को कभी–कभार शहर की
काव्य–गोष्ठियों में ही पढ़ता था, दोस्तों की बहुत ज़िद पर ।आज भी ऐसा ही लग रहा था कि वह अपनी
नज़्म पढ़ने से बचने के लिए बहाना बनाकर लेट गया है । मेरी आंखें उसी के चेहरे पर जैसे एकटक थम गई
थीं, जैसै कुछ भूल कर
वहीं बैठ गई हों किसी याद में खोई–खोई । या शायद मैं ही कहीं और भटक गया था किसी दूसरी गली
में, या कहीं किसी झील
के किनारे किसी खेत की मेंड़ पर जा पहुंचा था भटकते–भटकते । अचरज यह देखकर हो रहा था कि वहां
भी वह उसी तरह लेटा–लेटा किसी सोच में डूबा है । उसके होंठ कुछ बुदबुदा रहे हैं । और दूर से एक
गीत सुनाई दे रहा है । मेरी आंखें ने अब जैसे अपना काम मेरे कानों के जिम्मे लगा दिया हो । गीत
के स्वर अब साफ सुनाई देने लगे थे –
कदम कदम पे’ साथियों चिराग सौ जलाएंगे
नए सफ़र के
वास्ते डगर नई बनायेंगे...
क्षितिज की ओर जाते गीत के उन्हीं सुरों में खोया मैं वहीं बैठ
रहा।
[शमशाद ‘सहर’ इसी तखल्लुस से शायरी करते थे – १९७०-’७२ में मुंगेर में मेरे छात्र रहे, और फिर शायद १९७६ तक कॉलेज में मेरे सहकर्मी भी हो गए। एक मध्यवित परिवार में मुंगेर के दिलावरपुर मुहल्ले की एक गुमनाम गली में रहते थे। लेकिन मेरे करीबी बन गए – क्योंकि हमारी साहित्यिक अभिरुचियाँ मिलती थीं। मैं १९७६ में कॉलेज एन.एस.एस. का प्रभारी बनाया गया तो मेरे साथ मेरे हर शिविर में शामिल रहते थे। मेरे शिविरों में साहित्य ओर संगीत का विशेष माहौल रहता था। हिन्दी विभाग के रामनाथ ‘मिलिंद’ भी मेरे स्थायी सहचर थे। राजमणि राय ‘मणि’ (जिला सूचना प्रभारी) भी सुकंठ कवि थे। और भी लोग मेरे शिविरों में जाया करते थे। छात्रों में भी संगीत-प्रेमी-छात्रों का दल जरूर साथ रहता था। हर संध्या में सांस्कृतिक कार्यक्रम मेरे शिविरों के विशेष आकर्षण थे, जो छात्रों को बहुत भाते थे। शमशाद शायर-मिजाज अपने सेहत पर बहुत ध्यान नहीं देते थे और मधुमेह-ग्रस्त हो गए थे, जिससे आगे चलकर और समस्याएं बढ़ती गईं। मेरे पहले दोनों शिविरों में वे मेरे साथ गए। वहीं दूसरे शिविर में उन्होंने हमारा प्रबोधन-गीत लिखा। लेकिन १९८० के बाद उनकी बीमारी बढ़ने लगी। १९८२ में वे अचानक चले गए। उन्हीं की याद में मैंने १९८३ में और उसके कई साल बाद जो लिखा उसे अब सामने कर देना चाहता हूँ। शमशाद बहुत जल्दी चले गए इसलिए उनकी नज़्म किसी किताब की शक्ल में शाया न हो सकी। यहाँ केवल उनकी याद दुहराई जा सकी है। - मंगलमूर्त्ति]





