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Thursday, August 4, 2022

 




प्रेमचंद और शिवपूजन सहाय : कथा-भाषा का प्रश्न                 

जब कोई लेखक अपनी किसी कृति के कारण साहित्य-दीर्घा में स्थापित हो जाता है, तब जैसे-जैसे युगानुसार साहित्य कि प्रगति होती है, वह लेखक सामान्यतः अपनी उस कृति के साथ एकाकार हो जाता है | अर्थात आज जब हम प्रेमचंद अथवा शिवपूजन सहाय की चर्चा करते हैं तो प्रायः उनके जीवन प्रसंगों से लगभग अलग उनकी कृतियों पर ही अपना ध्यान केन्द्रित करते हैं | जब लेखक का जीवन लोकान्तरित हो चुका होता है तब उसका व्यक्तित्त्व उसकी कृतियों में ही जीवित रहता है | लेकिन आज हिंदी के जिन दो कथा-लेखकों का हम स्मरण कर रहें हैं, उनके प्रसंग में हम उस शहर और उस वर्ष पर भी ध्यान केन्द्रित करेंगे जहाँ कथा-भाषा के प्रसंग में हम उन दोनों कथा-लेखकों कि उन दो कृतियों पर दृष्टि-पात करेंगे जो एक ही शहर में लगभग एक ही समय लिखी गयीं, और एक-दूसरे के आस-पास ही प्रकाशित भी हुईं | वह शहर यही लखनऊ था और वह वर्ष भी १९२४ था – आज से ठीक लगभग १०० साल पूर्व | और ये दो कृतियाँ थीं प्रेमचंद का प्रसिद्ध उपन्यास ‘रंगभूमि’ और शिवजी का अपने समय में लगभग  उतना ही प्रसिद्ध उपन्यास ‘देहाती दुनिया’ | आज इसी साहित्यिक संयोग पर हम विचार करेंगे – जिसके केंद्र में होगी हिंदी में धीरे-धीरे अपना स्वरुप निर्धारित कर रही उपन्यास की विधा, जिसका शिल्प उन दिनों उसके साथ ही निर्मित हो रही ‘कहानी’ विधा के शिल्प से बहुत भिन्न नहीं था, और यही बात काफी हद तक उस समय विकसित हो रहे समग्र कथा-साहित्य में इन दोनों विधाओं की कथा-भाषा पर भी लागू होती दीखती है | एक और बात की ओर ध्यान रखना आवश्यक है कि उस समय बीसवीं सदी प्रारम्भ में हिंदी की इन दोनों विधाओं के विकास में उर्दू-फारसी कथा-परंपरा के साथ-साथ तत्कालीन अंग्रेजी और बंगला कथा-साहित्य का स्पष्ट प्रभाव दिखाई दे रहा था | 

यह प्रसंग वर्ष १९२४ का है | लखनऊ का नवल किशोर प्रेस तब अखिल भारत का संभवतः सबसे बड़ा प्रकाशन संस्थान था, और उसी समूह के दुलारे लाल भार्गव, जो हिंदी साहित्य के प्रेमी थे, उनके सम्पादन में उसी समय लखनऊ से एक साहित्यिक पत्रिका निकली थी ‘माधुरी’ | इससे पूर्व आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी के गौरवशाली सम्पादन में दो दशकों के अपने नियमित प्रकाशन से ‘सरस्वती’ ने जैसे साहित्यिक पत्रकारिता की पृष्ठभूमि तैयार कर दी थी | लखनऊ की इसी ‘माधुरी’ के सम्पादन विभाग में, इसी वर्ष १९२४ में, पहले शिवपूजन सहाय और उसके कुछ महीनों बाद प्रेमचंद लगभग एक साथ शामिल हुए | शिवजी कलकत्ता से, १९२३ से लिखे जा रहे और वहीँ अर्द्ध-मुद्रित अपना उपन्यास ‘देहाती दुनिया’ लेकर लखनऊ आये, और प्रेमचंद आये अपना उपन्यास ‘रंगभूमि’ लेकर, जिसे दुलारेलाल छापना चाहते थे | यह सारा साहित्यिक घटना-क्रम लखनऊ में अप्रैल, १९२४ से जनवरी, १९२५ के बीच का रहा | यहाँ यह स्मरणीय है कि प्रेमचंद ने अपना यह उपन्यास, जो उन्होंने पहले उर्दू में ‘चौगाने-हस्ती’ नाम से लिखा था, लेकिन जिसे अब वे हिंदी का अच्छा पाठक-प्रसार देखकर हिंदी में प्रकाशित करना चाहते थे, और जिसे उन्होंने पहली बार अपनी कलम से हिंदी में दुबारा लिखा था, जो बिलकुल उर्दू का हिंदी में सीधे-सीधे अनुवाद भी नहीं था, लेकिन जिस पर अब भी उर्दू कथा-भाषा की स्पष्ट छाया मौजूद थी | और शायद इसीलिए प्रेमचंद की सहमति से ही दुलारेलाल ने ‘रंगभूमि’ को शिवजी को भाषा-संशोधन-परिमार्जन के लिए दिया था, जिनको अपने ‘मतवाला’-सम्पादन के कारण हिंदी के एक सुयोग्य सम्पादक के रूप में तब तक पर्याप्त ख्याति मिल चुकी थी | प्रेमचंद और शिवजी दोनों एक-दूसरे से तबतक पूर्ण परिचित हो चुके थे | प्रेमचंदजी से शिवजी कि पहली भेंट कलकत्ता में १९२१ में ही हो चुकी थी | प्रेमचंद वाले अपने विशेष महत्त्वपूर्ण संस्मरण में शिवजी ने लिखा है –

दूसरी बार (१९२४ में) उनसे घनिष्ठता बढाने का सुयोग मिला लखनऊ में | मैं ‘माधुरी’ के सम्पादन विभाग में काम करता था | कुछ दिनों बाद वे भी ‘माधुरी’ के सम्पादक होकर आये | उसी समय उनका ‘रंगभूमि’ नामक बड़ा उपन्यास वहाँ छपने के लिए आया था | उसकी पूरी पांडुलिपि उन्होंने पहले-पहल देवनागरी लिपि में अपनी ही लेखनी से तैयार की थी | श्री दुलारेलालजी भार्गव ने उसकी प्रेस-कॉपी तैयार करने के लिए मुझे सौंपी | उस समय ‘माधुरी’-सम्पादन-विभाग अमीनाबाद पार्क से उठकर लाटूश रोड पर आ गया था |.....वह नागरी लिपि में लिखा पहला उपन्यास दर्शनीय था | शायद ही कहीं लिखावट की भूल हो तो हो | भाषा तो उनसे कोई बरसों सीखे | लेखनी का वेग ऐसा कि संयोगवश ही कहीं कट-कूट मिले | कथा-वस्तु की रोचकता लिपि-सुधार में बाधा देती थी | घटना-चक्र में पड़ जाने पर सम्पादन शैली के निर्धारित नियम भूल जाते थे |....

आपको आश्चर्य होगा, शिवजी और प्रेमचंद का महीनों तक एक साथ ‘माधुरी’ के सम्पादकीय विभाग में रहने, और ‘रंगभूमि’ के शिवजी द्वारा संपादित होने का यह पूरा प्रसंग जिसका शिवजी के संस्मरण में अविस्मरणीय चित्रण है -  उसका अमृत राय के ‘कलम का सिपाही’ में कोई चर्चा ही नहीं है | अमृत राय पटना में कई बार मेरे पिता से मिलने आये थे, प्रेमचंद की चिट्ठियां मांग कर ले गए थे, जिसे ‘चिट्ठी-पत्री’ में छापा भी था, फिर प्रेमचंद का नया साहित्य ८ या १० खंडो में प्रकाशित होने पर – जिसमें ‘कलम का सिपाही’ भी था – उसे लेकर मेरे पिता को भेंट करने और उसकी बिहार में खरीद की सिफारिश करने पटना आये थे, जब मैं वहीं था | लेकिन ‘कलम का सिपाही’ में, लखनऊ वाले विवरण में भी, कहीं एक बार भी शिवपूजन सहाय का नाम नहीं आया है, बल्कि ‘रंगभूमि’ के सम्पादन की कोई चर्चा ही उसमें नहीं हुई है | मदन गोपाल ने अपनी जीवनी में ज़रूर इस प्रकरण का हल्का-सा उल्लेख किया है | आज यहाँ इसका उल्लेख इसलिए ज़रूरी है, क्योंकि आज की इस चर्चा का पूरा प्रसंग ‘रंगभूमि’-सम्पादन के उसी कथा-भाषा प्रकरण से जुड़ा है | क्या प्रेमचंद की कथा-भाषा की चर्चा में ‘रंगभूमि’ के भाषा-सम्पादन के इस पक्ष पर गंभीरता से विचार नहीं होना चाहिए? लेकिन इस पूरी चर्चा के प्रसंग में यह याद रखना ज़रूरी है कि प्रेमचंद शिवजी से उम्र में १३ साल बड़े थे, और एक प्रकार से शिवजी की ज्येष्ठ पीढी के साहित्यकार थे | क्योंकि शिवजी की पहली रचना जब १९१२ में छपी थी, तबतक प्रेमचंद हिंदी कथा-साहित्य में एक विख्यात कथाकार के रूप में स्थापित हो चुके थे | कलकत्ते में जब पहली बार शिवजी से उनकी भेंट हुई थी, तब तक प्रेमचंद के कई कहानी-संग्रह और कम-से-कम तीन उपन्यास हिंदी में प्रकाशित हो चुके थे, जबकि शिवजी अभी अपना साहित्यिक जीवन शुरू ही कर रहे थे, जो पहली बार १९२३ में ‘मतवाला’ के सम्पादन के साथ हिंदी-जगत में सुख्यात हुआ था |

यह भी ध्यान में रखना होगा कि प्रेमचंद का शुरूआती लेखन उर्दू में होता रहा, जो पहले पहल उनके उर्दू कहानी-संग्रह ‘सोजे-वतन’ के प्रकाशन के साथ सामने आया था | और जब १९२० के आसपास वे अंततः उर्दू से हिंदी की ओर लौटे तो स्वाभाविक रूप से उर्दू-लेखन का वह लम्बा अभ्यास उनकी हिंदी पर अपनी गहरी छाप डाल चुका था | प्रेमचंद और शिवजी - दोनों की उम्र में तेरह साल का यह अंतर, फिर शिवजी का १९१० में संकल्पपूर्वक उर्दू-फारसी की पढ़ाई छोड़कर हिंदी-लेखक बनने का निर्णय, और उन्हीं दिनों उर्दू-फारसी से हिंदी को मुक्त करने का चल रहा उग्र  आन्दोलन, ‘सरस्वती’ में हिंदी को उर्दू-फारसी से मुक्त एक विकसित और मानक रूप देने का आचार्य द्विवेदीजी का संकल्पित प्रयास - इन सभी बातों को इस प्रसंग में हमें ध्यान में रखना होगा | यही समय था जब हिंदी कथा-साहित्य और उसकी कथा-भाषा का एक साथ निर्माण हो रहा था जिसमें हिंदी को उसके मौलिक रूप में सजाने-संवारने का एक विशेष आग्रह था | शिवजी जब उर्दू-फारसी से छूटकर हिंदी की ओर आये तब उनकी हिंदी सायास तत्सम-बहुल अनुप्रास-अलंकृत रूप लेकर उभरी, जैसा उस समय के अन्य हिंदी लेखकों में भी दिखाई देता है | शिवजी की शुरू (१९१४) की कहानी ‘तूती-मैना’ की कथा-भाषा की तुलना प्रेमचंद की उसी के आस-पास प्रकाशित कहानियों – ‘सौत’, ‘पञ्च परमेश्वर’ और ‘नमक का दारोगा’ – की कथा-भाषा से करने पर यह अंतर अधिक स्पष्ट हो जाता है |  दोनों ही कथा-लेखकों में तेरह साल का उम्र का अंतर और उर्दू से हिंदी की ओर वापसी का स्वाभाविक उत्प्रेरण, उनके कथा-लेखन और कथा-भाषा में किस तरह प्रतिच्छवित हुआ इसकी तुलना दोनों की कथा-भाषा के बाद के विकास में देखी जा सकती है | और यह प्रश्न तब और महत्त्वपूर्ण हो जाता है जब इन दो लेखकों की कथा-भाषा का परस्पर आग्रह और संस्कार शिवजी द्वारा प्रेमचंद के उपन्यास ‘रंगभूमि’ के परिमार्जन द्वारा प्रेमचंद की कथा-भाषा को एक ऐसा स्वरुप प्रदान करता है जो प्रेमचंद के बाद के उपन्यासों में भी अपना स्वाभाविक प्रवाह बनाए रखता है | किसी हद तक यह कहना अनुचित नहीं होगा कि प्रेमचंद कि कथा-भाषा के स्वरुप-स्थिरीकरण में शिवजी का महत्त्वपूर्ण योगदान है, और निश्चय ही यह भाषा-शोध का एक अच्छा विषय होगा |                        

कमल किशोर गोयनका प्रेमचंद-साहित्य के बहुत गंभीर अध्येता हैं | उनकी प्रेमचंद की कथा-भाषा पर पाठ-शोध की एक महत्त्वपूर्ण पुस्तक है ‘प्रेमचंद और शतरंज के खिलाड़ी’, जो उन्होंने लोथार लुत्से के साथ लिखी है | उसमें उन्होंने उस कहानी के तीन पाठों का तुलनात्मक विश्लेषण किया है – ‘ज़माना’ में प्रकाशित उसके उर्दू पाठ, ‘माधुरी’ (अक्टूबर, १९२४) में प्रकाशित उसका हिंदी पाठ, और प्रेमचंद की हस्तलिपि में लिखी उसकी मूल हिंदी पांडुलिपि का पाठ -  जिसका पूरा चित्र भी उन्होंने उस पुस्तक में प्रकाशित किया है | ‘माधुरी’ में प्रकाशित पाठ और मूल पाण्डुलिपि के विषय में उन्होंने लिखा है कि प्रकाशित कहानी ‘शतरंज के खिलाडी’ के अंतिम प्रकाशित पाठ का सम्पादन दुलारेलाल ने किया था, जो स्पष्टतः भ्रांतिपूर्ण है, क्योंकि प्रेमचंद की कथा-भाषा के सम्पादन का यह कार्य दुलारेलाल की क्षमता के बाहर था | शिवजी को लिखे दुलारेलाल के पत्रों की भाषा देखने से तो यह बिलकुल स्पष्ट हो जाता है | फिर उस समय शिवजी ‘माधुरी’ के सम्पादन-विभाग में इसी भाषा-सम्पादन के लिए बुलाये गए थे, और उसी समय (अप्रैल से सितम्बर, १९२४ में) वे वहां रह कर ‘रंगभूमि’ का सम्पादन कर रहे थे | फिर उस कहानी और ‘रंगभूमि’ की प्रकाशित कथा-भाषा को मिला कर देखने पर, और गोयनका के पाठ-शोध को ध्यान से देखने पर वह तुलनात्मक अध्ययन तो शिवजी के अत्यंत सतर्क सम्पादन-कार्य को ही उजागर करता है | अर्थात, गोयनका द्वारा ‘ शतरंज के खिलाड़ी’ के हिंदी प्रकाशित पाठ का पाठ-शोध जहाँ एक तरफ शिवपूजन सहाय के सम्पादन-कार्य का सूक्ष्म दिग्दर्शन कराता है, वहीं दूसरी तरफ वह उसी समय उन्हीं के द्वारा चल रहे ‘रंगभूमि’ के सम्पादन की पूरी तफसील भी प्रच्छन्न रूप से पूरी तरह उजागर कर देता है | यहाँ उस सूक्ष्म विश्लेषण को विस्तार में बताना अनावश्यक है, और संभव भी नहीं, पर यहाँ यह रेखांकित कर देना ही पर्याप्त है कि गोयनका का ‘शतरंज के खिलाड़ी’ का पाठ-शोध वास्तव में शिवजी द्वारा ‘रंगभूमि’ के सम्पादन का प्रकार और आयाम कैसा था, इसे ही विगोपित करता है | मैंने जब गोयनकाजी का ध्यान इस ओर खींचा तो वे इस विषय में मेरे साथ पूरी तरह सहमत भी हुए, और कहा कि इस तरफ तो मेरा ध्यान ही नहीं गया था !

निष्कर्ष यह, कि गोयनका द्वारा ‘शतरंज के खिलाडी’ का पाठ शोध वह स्पष्ट संकेत है जो हमें भाषा-वैज्ञानिक रूप में साफ़ दिखा देता है कि शिवजी द्वारा ‘रंगभूमि’ के सम्पादन का असली स्वरुप कैसा था | शिवजी  ने अपने संस्मरण में जब लिखा कि  ‘भाषा तो उनसे कोई बरसों सीखे’ तो यह एक वाक्य एक साथ कई बातों की ओर संकेत करता है, जिसमें यह इशारा भी है कि प्रेमचंद उनसे पहले कि पीढ़ी के स्थापित कथाकार थे, और शिवजी केवल विकसित हो रही हिंदी की कथा-भाषा की दृष्टि से उनकी भाषा का परिमार्जन कर रहे थे, और उस पर जो अभ्यस्त उर्दू-लेखन का बोझ था उसे बस हल्का कर रहे थे | ‘रंगभूमि’ को पढने पर आज भी यह स्पष्ट दिखाई देता है | शिवपूजन सहाय प्रेमचंद की कथा-भाषा के प्रवाह और उसकी जादुई रोचकता की भी बात करते हैं, जो शिवजी के भाषा-परिमार्जन से बहुत ऊपर की कलात्मक वस्तु थी | इस कार्य में शिवजी तो साहित्य-मंदिर के उस सेवक की तरह थे जो आराध्य प्रतिमा के चारों और की उतरी हुई बासी फूल-पत्ती की सफाई-धुलाई करके, नए फूलों से प्रतिमा की नई सजावट कर रहा हो | शिवजी का सम्पादन कहीं प्रतिमा के मूल सौन्दर्य से छेड़छाड़ नहीं करता, वह केवल बहुत कलात्मक ढंग से उसके शोभा-श्रृंगार की अभिवृद्धि ही करता है, जिससे प्रतिमा का सौन्दर्य और उद्भासित हो जाय | उनका सारा सम्पादन कार्य इसी का प्रमाण है |  आचार्य द्विवेदीजी के सम्पादन में जहाँ भाषा की सादगी और शुद्धता पर जोर होता था, शिवजी के सम्पादन में लेखन के सम्पूर्ण कलात्मक सुष्ठुता का सौन्दर्य उभरता था | ‘रंगभूमि’ की मूल पांडुलिपि का बहुत खोजने पर भी मुझे पता नहीं चला, लेकिन गोयनका द्वारा ही संपादित उसके मूल संस्करण का पुनर्प्रकाशित संस्करण, जो इधर सस्ता साहित्य मंडल से छप कर आया है (जिसमें भी मुद्रण की कई नई भूलें दिखाई देती हैं) उसको देखने से मुझे अपने इन निष्कर्षों की पुष्टि होती दिखाई देती है | कुछेक उद्धरण वहीँ से शिवजी के सम्पादन की विशिष्टता को उजागर करते लगते हैं, जैसे – “यहाँ के न्यायालयों से न्याय की आशा रखना चिड़िया से दूध निकालना है|” यह प्रेमचंद का अपना टकसाली वाक्य है, जिसमें यह मुहावरा हिंदी का नहीं है, और जिसे शिवजी ने बिलकुल नहीं छेड़ा है | अथवा दीवान साहब की यह पात्रोचित प्रसंगानुकूल प्रेमचंद की टकसाली उर्दू-भाषा  –“हम सब इस हरमसरा के हब्शी ख्वाजासरा हैं|” इसमें भी कहीं  कोई छेड़छाड़ नहीं हुई है | या यह वाक्य – “उसकी निगाह में धार्मिकता से बढ़कर कोई अवगुण न था”  जहाँ शिवजी के कोमल स्पर्श कि संभावना स्पष्ट दिखाई देती है  जिसमें ‘निगाह’ प्रेमचंद का अपना शब्द है, और ‘अवगुण’ शिवजी का शब्दांतर हो सकता है |

शिवजी के सम्पादन की गुणवत्ता को सम्मानित करते हुए प्रेमचंद ने ‘रंगभूमि’ की जो पहली प्रति शिवजी को भेंट में भेजी थी, उसके साथ संलग्न २२ फरवरी, १९२५ के पत्र की उनकी यह पंक्ति विशुद्ध प्रेमचंद की गंगा-जमुनी भाषा-शैली की परिचायक है – “ लीजिये जिस पुस्तक पर आपने कई महीने दिमागरेज़ी  की थी वह आपका एहसान अदा करती हुई आपकी खिदमत में जाती है और आपसे विनती करती है कि मुझे दो-चार घंटों के लिए एकांत का समय दीजिये और तब आप मेरी निस्बत जो राय कायम करें वह अपनी मनोहर भाषा में कह दीजिये |” यही प्रेमचंद की मौलिक भाषा-शैली थी, उर्दू के गुलाबी रंग में रंगी हुई, जो उनके कथेतर गद्य में हर जगह  नमूदार होती है, और चूंकि  शिवजी उर्दू-फारसी का भी उतना ही गहन ज्ञान रखते थे, इस लिए प्रेमचंद कि कथा-भाषा में उर्दू-फारसी के स्वाद को अच्छी तरह पहचानते हुए उन्होंने उस विशिष्ट शैली से कहीं छेड़-छाड़ नहीं की है, इसे ‘रंगभूमि’ को इस दृष्टि से ध्यान से पढ़ कर समझा जा सकता है |

कथा-भाषा के प्रसंग में हिंदी के दो प्रारम्भिक कथा-लेखकों का परस्पर भाषिक सम्बन्ध कैसा था, और उसमें उर्दू-फारसी से हिंदी की ओर वापसी से कैसा परिवर्त्तन आया, तथा एक बड़े उर्दू-दां- कथा-लेखक की कथा-भाषा का दूसरे कनीय हिंदी-प्रधान लेखक के सम्पादन से कैसा स्वरुप-निर्धारण हुआ इसकी थोड़ी चर्चा मैंने अभी की, यद्यपि इस पर अभी और सूक्ष्म दृष्टि से विचार किया जाना चाहिए | लेकिन प्रेमचंद ने भाषा-परिष्कार के उस ऋण को कैसी शालीनता से स्वीकार किया यह भी हमने उनके पत्र में देखा | अब कथा-भाषा के प्रसंग में ही मैं आपका ध्यान एक दूसरे पक्ष की ओर आकृष्ट करना चाहूँगा – शिवजी के उपन्यास ‘देहाती दुनिया’ और उसकी विशिष्ट आंचलिक कथा-भाषा की ओर | यद्यपि आज की इस चर्चा की सीमा में इस पर भी विस्तार से विचार करना संभव नहीं है |

शिवजी जब असहयोग आन्दोलन में प्रेमचंद की ही तरह सरकारी नौकरी से इस्तीफ़ा देकर साहित्यिक पत्रकारिता में आजीविका की तलाश में १९२१ में कलकाता पहुंचे थे, तो सबसे पहले तो उन्होंने अपनी तब तक की लिखी, और विभिन्न साहित्यिक पत्रिकाओं में प्रकाशित अपनी १० कहानियों का संग्रह ‘महिला-महत्त्व’ १९२२ में प्रकाशित किया जिसकी कथा-भाषा में स्पष्टतः उर्दू-फारसी से परहेज करते हुए शुद्ध तत्समी हिंदी की ओर लौटने का आग्रह था, जैसा प्रेमचंद की उसी दौर में लिखी हिंदी कहानियों में बिलकुल नहीं था | और जब कलकत्ता ‘मतवाला’ में ही रहते हुए शिवजी ने अपने पूर्व-संचित विचार के अनुसार अपने देहाती भाइयों के लिए उन्हीं की बोलचाल और समझने की भाषा में एक उपन्यास ‘देहाती दुनिया’ अपने एक भोजपुरी-भाषी मित्र-प्रकाशक के उत्प्रेरण से लिखना शुरू किया, और उसके ४-५ फर्में वहां छपने भी लगे, तभी कुछ कारणों से शिवजी को ‘मतवाला’ छोड़कर अप्रिल, १९२४ में लखनऊ की ‘माधुरी’ में आना पड़ा | ‘देहाती दुनिया’ के वे ५ छपे फर्में  शिवजी अपने साथ लेते आये और लखनऊ में रहते हुए उस उपन्यास को दुबारा शुरू से पूर्णतर रूप में लिखने लगे | लेकिन सितम्बर, १९२४ में लखनऊ में जब दंगा हुआ तब शिवजी अमीनाबाद के जिस होटल में रहते थे वहां कमरे में अपना सारा सामान, जिसमें ‘देहाती दुनिया’ की वह नई पूर्णतर पांडुलिपि भी थी, छोड़-छाड़ कर भागे और काशी होते हुए अपने गाँव चले गए | बाद में होटल से शिवजी का वह सारा सामान - जिसमें ‘देहाती दुनिया’ की वह नई पांडुलिपि और उनकी तब तक की लिखी बहुत-सी डायरी आदि साहित्यिक सामग्री थी – दुलारेलाल ने मंगवा ली, लेकिन जो शिवजी को कभी वापस नहीं मिल सकी | शिवजी अक्टूबर में फिर लखनऊ लौटे लेकिन थोड़े दिन बाद ही दुलारेलाल के व्यवहार से असंतुष्ट होकर कलकत्ता लौट गए, जहाँ से मई, १९२६ में वे काशी आये और तीसरी बार फिर ‘देहाती दुनिया’ का अंतिम ड्राफ्ट पूरा किया जो अंततः ‘पुस्तक-भण्डार’ लहेरियासराय से प्रकाशित हुआ | ध्यातव्य है कि बाद में दुलारेलाल के व्यवहार से क्षुब्ध होकर प्रेमचंद भी काशी आ गए, और १९२६ से १९३३ के बीच एक बार फिर प्रेमचंद और शिवजी काशी में निरंतर घनिष्ठ संपर्क में रहे, जैसा शिवजी के संस्मरणों से ज्ञात होता है |

मैंने प्रारंभ में कथा-भाषा के प्रसंग में हिंदी के दो कथाकारों – प्रेमचंद और शिवपूजन सहाय की लगभग एक ही समय और एक ही स्थान पर लिखी गयी दो कृतियों की ओर आपका ध्यान आकृष्ट किया था | शिवपूजन सहाय की ‘देहाती दुनिया’ वह दूसरी कृति है जो लगभग ‘रंगभूमि’ के साथ ही लिखी गयी और प्रकाशित भी हुई | कथा-भाषा के प्रसंग में उस छोटे से उपन्यास  पर विचार करने के लिए कुछ बिंदु हैं जिन पर अब मैं आपका ध्यान आकृष्ट करना चाहूंगा |

पहला, ये दोनों औपन्यासिक कृतियाँ हिंदी-साहित्य के कथा-साहित्य के प्रारम्भिक निर्माण काल में, एक ही समय में, दो परिचित, एक-साथ रहने वाले, दो हिंदी लेखकों द्वारा, एक ही विधा में लिखी जाने के बावजूद, अपने शिल्प और अपनी कथा-भाषा में बिलकुल भिन्न हैं | यहाँ यह भी रेखांकित करना आवश्यक है कि शिवजी उसी समय प्रेमचंद कि कथा-भाषा का परिमार्जन भी कर रहे थे, किन्तु जहां एक ओर वे प्रेमचंद की कथा-भाषा से ‘सीखने’ कि बात कर रहे थे, वहां दूसरी ओर ‘देहाती दुनिया’ के लिए एक विशेष प्रकार की कथा-भाषा भी आविष्कृत कर रहे थे, जो ‘रंगभूमि’ की भाषा से बिलकुल भिन्न थी | दोनों उपन्यासों की चित्रभूमि गाँव ही थे, लेकिन दोनों के परिवेश, उनका कथा-शिल्प, उनका चरित्र-संयोजन, उनका अभिप्रेत आदि सब कुछ एकदम भिन्न थे | कथा-भाषा के प्रसंग में यहाँ एक महत्त्वपूर्ण अंतर यह था कि जहाँ प्रेमचंद की कथा-भाषा नगरीय पाठक-वर्ग के लिए लिखी जा रही थी, और उसका सारा सन्देश भी उसी नगरीय पाठक-वर्ग को संबोधित था, शिवजी के उपन्यास ‘देहाती दुनिया’ की विशिष्ट कथा-भाषा तुलसीदास के ‘रामचरितमानस’ की तरह प्रमुखतः ऐसे  ग्रामीण श्रोता-वर्ग के लिए सृजित हुई थी जिसको “ठेठ देहाती निरक्षर हलवाहे और मजदूर भी उसकी हरेक बात को अच्छी तरह समझ जाएँ” | अपनी उसी भूमिका में शिवजी आगे लिखते हैं : ‘भाषा का प्रवाह भी मैंने ठीक वैसा ही रखा है जैसा ठेठ देहातियों के मुख से सुना है |....गाँव-गवंई में यह खूब पसंद किया गया |”

निश्चय ही जहाँ प्रेमचंद कि कथा-भाषा, हिंदी की एक टकसाली कथा-भाषा बनने के प्रयास में,  उर्दू से चलकर, शिवपूजन सहाय के सहयोग से, अपने को हिंदी में संस्कारित कर रही थी, वहीँ शिवपूजन सहाय हिंदी कथा-साहित्य में एक ऐसी ग्रामीण-जन-सुलभ भाषा का सृजन कर रहे थे जो अपनी मिसाल खुद बन कर रह गयी | उसका फिर आगे कोई दूसरा उदाहरण सामने नहीं आ सका | इस दृष्टि से ‘देहाती दुनिया’ की कथा-भाषा की तुलना आगे उसी मॉडल पर लिखे गए अन्य आंचलिक उपन्यासों - ‘मैला आँचल’, ‘बलचनमा’ आदि से करने पर ‘देहाती दुनिया’ की कथा-भाषा की मौलिकता और स्पष्ट हो सकेगी | रचना के पाठक-वर्ग को सामने रख कर रचना की भाषा के निर्माण का ‘देहाती दुनिया’  हिंदी में शायद अकेला प्रायोगिक उदाहरण है | मैं यहाँ जो कह रहा हूँ, उसकी तस्दीक ‘देहाती दुनिया’ को दुबारा गहराई से पढ़ कर किया जा सकता है | यह भी मनोरंजक है कि जहाँ एक ओर शिवजी प्रेमचंद की कथा-भाषा का हिंदी-संस्कार कर रहे थे, वहीँ वे हिंदी में एक सर्वथा नये प्रकार की ग्रामोन्मुखी कथा-भाषा का सृजन भी कर रहे थे | प्रेमचंद ने शिवजी की जिस ‘मनोहर’ भाषा का हलके से अपने पत्र में ज़िक्र कर रहे थे, वह एक संकेत था कि हिंदी के दो प्रतिष्ठित कथा-लेखक एक दूसरे के भाषा-सामर्थ्य का कितना सम्मान करते थे |

लेशमात्रस्पर्द्धा कहीं थी भी तो कितनी प्रच्छन्न और अलक्षित थी, और कथा-साहित्य के विकास के लिए एक स्तरीय और मानक कथा-भाषा और उसके नगरीय और ग्रामीण प्रकार के निर्माण के प्रति कैसा समर्पण-भाव था | साहित्य-सृजन को एक मिशन की तरह देखा जाता था – चाहे वह कथा-साहित्य के लेखन में हो, पत्रकारिता में हो, अथवा किसी साहित्यिक विधा में हो | कहीं कुछ कटुता भी थी तो कितना मर्यादापूर्ण उसका व्यवहार था | शिवपूजन सहाय ने अपने संस्मरणों में उस युग का जैसा जीवंत चित्र खींचा है - ‘बच्चनजी’ के शब्दों में – “खेद के साथ कहना पड़ता है, (कि वह युग) अपनी सदाशयता, आदर्शवादिता तथा रोचकता लिए सदा के लिए चला गया” | वस्तुतः, हिंदी के कथा-साहित्य में कथा-भाषा के निर्माण और विकास पर एक संगोष्ठी अलग से आयोजित की जानी चाहिए | आज की इस चर्चा में प्रेमचंद और शिवपूजन सहाय के स्मरण के साथ इसी प्रसंग को उजागर करने का एक छोटा-सा विनम्र प्रयास किया गया है | लखनऊ प्रेमचंद, निराला और शिवपूजन सहाय की स्मृतियों से सदा इसी तरह जुड़ा रहे, इसी कामना के साथ -  अंत में मैं हिंदी संस्थान, लखनऊ में आयोजित इस विशेष समारोह के लिए जिसमें हिंदी के दो महान कथा-मनीषियों को स्मरण किया जा रहा है, हिंदी संस्थान के वर्त्तमान अध्यक्ष डा. सदानंदजी और अन्य पदाधिकारियों के प्रति अपना विशेष आभार व्यक्त करना चाहता हूँ, और सभागार में उपस्थित सभी मित्रों का भी कृतग्य हूँ कि उन्होंने धैर्यपूर्वक मेरे वक्तव्य को सुनाने कि कृपा की | धन्यवाद !

[मेरे अस्वस्थ होने के कारण] उत्तर  प्रदेश हिन्दू संस्थान, लखनऊ में 3 अगस्त, २०२२ को पठित मेरा आलेख |

सभी चित्र एवं आलेख (C) डा. मंगलमूर्त्ति

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Sunday, April 17, 2022

 

लेखक-प्रकाशक-सम्बन्ध : प्रसंग-4                               

राष्ट्रकवि दिनकर के ‘कुरुक्षेत्र’ की ये पंक्तियाँ एक विशेष प्रसंग को आलोकित करती हैं :

            “क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो

            उसका क्या जो दंतहीन, विषहीन, विनीत सरल हो |”

बहुत गहराई में ये पंक्तियाँ शिवपूजन सहाय और उनके प्रकाशकों के सन्दर्भ में भी बहुत अर्थपूर्ण प्रतीत होती हैं | शिवजी ने अपने कंठ में गरल धारण किया, जो वे ही कर सकते थे | उनके विनीत और सरल होने को जो लोग उनकी सांकल्पिक दुर्बलता समझते थे, उन लोगों की दृष्टि बहुत संकीर्ण थी | इस बात के प्रमाण शिवजी की  डायरी के पृष्ठों में भरे पड़े हैं | यह और बात है कि अपनी समग्रता में उपलब्ध हो जाने के बाद आज भी हिंदी संसार उस महत्त्वपूर्ण साहित्य से  प्रायः अनवगत ही है | हिंदी के प्रकाशकों पर उनकी नीचे उद्धृत पंक्तियाँ हिंदी के लिए एक भविष्यवाणी जैसी हैं | पहले इन पंक्तियों को पढ़ें, फिर हम इस विमर्श की कड़ियाँ जोड़ेंगे |

हिंदी के प्रकाशक

साहित्यिकों के पैसे हड़प कर प्रकाशक धनी हो गए हैं | देश में जब क्रांति मचेगी तब गरीबों को चूसने वाले पूँजीपतियों के साथ बेईमान प्रकाशक भी  लूटे जायेंगे | लेखक और कवि उस लूटपाट का लोमहर्षक  वर्णन करेंगे (१२.११.५५)|  लेखक को प्रकाशक के सामने याचना करते देख विधाता की निर्ममता पर क्षोभ होता है  (१४.११.५५)| हिंदी संसार के प्रकाशक यदि लेखकों के स्वार्थ की भी चिंता रखते तो साहित्य निर्माण में बड़ी सहायता मिलती |...जब तक नैतिक बल की ओर प्रकाशक और लेखक ध्यान नहीं देंगे तब तक हिंदी की अभीष्ट उन्नति नहीं होगी |...देशवासियों का नैतिक बल भी तभी बढेगा जब साहित्यकारों में सच्चा नैतिक बल आ जायेगा  | साहित्य निर्माता ही राष्ट्र निर्माता है | जिस देश में त्यागी और तपस्वी साहित्यसेवी होते थे, उस देश में कीर्तिलोलुप और अहंकारी लोगों के हाथ में साहित्य पड़ गया है | युग की गतिविधि देख बड़ी चिंता होती है कि आगे का युग कैसा होगा  (३०.९.५८) | आजकल के प्रकाशक यदि उदार होते तो साहित्य का बहुत उपकार होता और साहित्यसेवकों को प्रोत्साहन और अवलंबन मिलता | हमारे हिंदी के प्रकाशक कब अंग्रेजी के प्रकाशकों के आदर्श पर ध्यान देंगे (२०-२१.५.४९) | बार-बार लिखने पर भी प्रकाशक  कभी रॉयल्टी का हिसाब नहीं समझाते – चुकाना तो दूर रहा | प्रकाशक अहंकारवश समझते हैं कि निर्धन असहाय लेखक हमारा क्या बिगाड़ सकते हैं (९.१२.५३) | हिंदी के प्रकाशक हम लेखकों का खून चूस कर मोटे हो गए है | उनके बच्चे दूध-घी चाबते हैं और हमलोगों के बच्चे सूखी रोटी पर नमक भी नहीं पाते (९.१२.५३) | पटना के  हिंदी पुस्तक प्रकाशकों में एक भी ईमानदार होता तो हिंदी साहित्यसेवियों की दशा दयनीय न होती | ईमान  खो देने पर जो उन्नति नज़र आती है वह चार दिन की चाँदनी है | कभी-न-कभी पाप का घड़ा भर कर फूटता ही है (२.५.५६)|

ये प्रामाणिक पंक्तियाँ हैं, शिवजी की कलम से लिखीं |  जो लोग उनको ‘विनीत सरल’ कह कर उनको अव्यावहारिक करार देते थे, ये हिंदी के वही साहित्यकार थे जिनकी अपनी साहित्यिक नैतिकता सदा प्रश्नांकित रही | वास्तव में साहित्यिक नैतिकता आचरण और सृजन के बीच के संतुलन पर आश्रित होती है | आचरण और सृजन में यदि एकमेकता बनी रहेगी, यदि वे एक दूसरे को संपुष्ट करते रहेंगे,  यदि उनमें परस्पर विलोम-सम्बन्ध नहीं होगा, तब वे कभी साहित्यिक नैतिकता को क्षत-च्युत नहीं करेंगे | परन्तु आचरण और सृजन की यह एकमेकता, यह सम्पृक्ति बहुत कम साहित्यकारों में देखी जाती है | शिवजी में यह एकमेकता अनन्य थी, वैसी जैसी उन्हीं के समय के अन्य किसी साहित्यकार में नहीं दिखाई देती | जिन  लोगों ने उनके साहित्य को पढ़ा है, उनके संस्मरणों, उनकी साहित्यिक पत्रकारिता और उनकी डायरी अथवा पत्रों को ध्यान से पढ़ा है, वे जानते हैं की अपने समय में हिंदी साहित्य-लेखन में वे अकेले साहित्यकार हैं जिनके लेखन में साहित्य के आदर्श मूल्यों का जैसा प्रतिपालन दिखाई देता है, उन मूल्यों का वैसा ही प्रतिबिम्बन उनके भौतिक जीवन में भी देखा जा सकता है | वास्तव में, उनका पूरा जीवन ही आदर्श साहित्यिक मूल्यों का प्रमाणीकरण प्रतीत होता है, जिसमें किसी प्रकार के कलुष का एक भी दाग कहीं नहीं दिखाई देता | साहित्य को उसकी सम्पूर्णता और श्रेष्ठता में अपने जीवन में पूरी तरह सार्थक करने वाले – अपने सभी समकालीनों के बीच भी – वे अकेले साहित्यकार हैं | इसका एक प्रमाण बेल्जियन संत फादर कामिल बुल्के की श्रद्धांजलि में पढ़ा जा सकता है –

परलोक में पहुँचने पर  मुझे अपनी जन्मभूमि के कम लोगों से मिलने की उत्सुकता रहेगी; पर अपनी नई मातृभूमि भारत के बहुत से अच्छे-अच्छे लोगों का मुझे परिचय प्राप्त हो सका है, और उनमें एक शिवपूजन जी हैं | परलोक में पहुंचकर मुझे उनसे मिलकर अनिर्वचनीय आनंद का अनुभव होगा और मैं उनके सामने नतमस्तक होकर उनको धन्यवाद भी दूंगा कि उनसे मैंने जान लिया था कि विनय का वास्तविक स्वरुप क्या है |   

मैं स्वयं फादर बुल्के से रांची में उनके टिन छत वाले एक कमरे के आवास में मिला था और उनकी आँखों में अपने दिवंगत पिता के प्रति गहन श्रद्धा की वह झांकी देखी थी | वैसे भी शैशव में ही मातृहीन हो जाने के कारण, और सबसे छोटी संतान होने के कारण, मैं अपने पिता के जीवन के अंतिम २५ वर्षों में छाया की तरह उनके साथ रहा, और मेरा यह दुर्लभ एवं ईर्ष्य सौभाग्य रहा कि मैंने उस देवतुल्य साहित्य-पुरुष  की पावन जीवन लीला का अंतिम संघर्षित परिच्छेद अपनी इन भौतिक आँखों से देखा | मेरे सामने घटित हुआ १९४० से १९६३ का यह कालखंड तो पिता के जीवन में किंचित स्थिरता का समय रहा, जब कि ठीक उससे पहले के डेढ़ दशक (१९२६-१९३९) उनके जीवन के कठिनतम संघर्ष के वर्ष रहे जिनका संकेत पिछले विवरणों में उद्धृत पत्रों में आया है | लेकिन मेरे समय के स्थिरता के वर्षों में भी मेरे पिता के जीवन में शोषण की वह गाथा अविरत  चलती रही जिसका संकेत भी उन्हीं पत्रों से मिल जाता है, जहाँ १९५०-६२ के बीच दो प्रेसों  द्वारा  उनका गर्हित शोषण किया गया था (देखें पिछला प्रसंग-३) |

पूर्वोल्लिखित डायरी अंशों में एक अन्य  प्रकार के शोषण की भी चर्चा है, जो उनके जीवन में समय का शोषण था, जब लोग जैसे-तैसे लिखे अपने मोटे-मोटे ग्रंथों को उन पर सम्पादन-संशोधन के लिए लाद देते थे, जिसकी चर्चा भी बार-बार उनकी डायरियों में भरी पड़ी है – लोग एक, घंटा, एक दिन भी उनका अपना नहीं होने देते थे ताकि वे कुछ अपना लिख-पढ़ सकें; दूर-दराज़ के शहरों के सम्मेलनों में, अस्वष्ठाता की स्थिति में भी, जबरदस्ती खींच कर ले जाया करते थे  | और यह सब कुछ मेरी आँखों के सामने ही होता रहा | जब मेरे पिता को  – जिनको राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने अपनी विशेष अनुशंसा पर ‘पद्मभूषण’ प्रदान किया. और जिन्होंने राज्यसभा की सदस्यता का बिहार कांग्रेस का प्रस्ताव भी अस्वीकृत कर दिया था  -  बिहार की ही सरकार ने समय से पूर्व अवैधानिक ढंग से सेवानिवृत्त कर दिया, जिससे उनको पेंशन नहीं मिल सका, और १९५९ से १९६३ के ४ वर्ष किस मुफलिसी में बीते, जब मेरे पिता को दवा, दूध और फल तक नहीं मिलते थे, जिसके कारण समय से पूर्व उनका शरीरांत हुआ | इन सब के पीछे प्रकाशकों का, साहित्यिक मित्रों का और सबसे बढ़कर बिहार सरकार का निर्मम व्यवहार था जिससे हिंदी के एक संत का असमय जीवनांत हुआ, और जिस कारण हिंदी को बहुत कुछ और नहीं मिल सका, जो उसे मिलता | उनके जीवन के अंतिम दो वर्षों (१९६१-’६२) में यह कहानी और भी दारुण हो गयी जब ‘हिंदी साहित्य और बिहार’ के खण्डों का सम्पादन करने के लिए बिहार सरकार ने उनके लिए केवल रिक्शा-भाड़ा की मंज़ूरी दी, और उसी क्रम में जनवरी में वे परिषद् से १० से ५ तक खट कर रिक्शे से लौटते हुए वे वर्षा में भींग गए, बीमार होकर अस्पताल गए, और वहीँ ५  दिन बाद  उनका निधन हो गया |

अंत में दो शब्द इस बात पर कि इतने महान हिंदी-सेवी और रचनाकार को रामविलास शर्मा और उसी स्तर के  कुछ अन्य साहित्यकारों ने केवल प्रूफ-रीडर और भाषा-संशोधक की तरह मूल्यांकित किया, उनके साहित्यिक सृजन-कार्य को कभी ठीक से समालोचित नहीं किया | क्या यह हिंदी के लिए शोभा की बात है ? प्रूफ-रीडिंग और भाषा-सम्पादन क्या होता है, अगर ऐसे साहित्यकार समझते तो वे हिंदी गद्य की महिमा समझते और यह समझते कि निराला ने क्यों रामविलासजी को कहा था कि वे उनकी जीवनी शिवजी को समर्पित करें – “शिवपूजन जी को समर्पण बहुत अच्छा है, बड़े सज्जन और चारु साहित्यिक हैं |”  मेरी समझ से निराला और शिवजी के अनन्य स्नेह-सम्बन्ध को समझने के लिए, और निराला शिवजी को और सभी साहित्यकारों से कितना अलग मानते थे यह जानने के लिए, ऐसे लोगों को शिवजी का निरालाजी पर लिखा संस्मरण ‘देवोपम पुरुष निराला’ (सा. हिंदुस्तान,५.११.६१)  पढना चाहिए था | निराला शिवजी के गद्य-लेखन की महिमा को समझते थे| यह और बात है कि बहुत से ऐसे लोग जो निराला को समझने वाले माने जाते रहे, वे शिवजी को एक भाषा-संशोधक और प्रूफ-रीडर से बहुत ऊपर हिंदी का एक श्रेष्ठ साहित्य-सर्जक कभी नहीं समझ सके |

शिवजी उस युग के लेखक थे जब हिंदी अभी साहित्य की भाषा के रूप में निर्मित ही हो रही थी | आप उस  युग के लेखकों के संस्मरणों और चिट्ठियों में पढ़िए कि वे शिवजी की साहित्य-साधना को किस समादर-दृष्टि से देखते थे | शिवजी के ‘साहित्य समग्र’ में प्रकाशित श्रीधर शर्मा,महावीर प्रसाद द्विवेदी, प्रेमचंद, प्रसाद, निराला, मैथिलीशरण गुप्त, बनारसी दास चतुर्वेदी, माखनलाल चतुर्वेदी से लेकर प्रभाकर माचवे और अज्ञेय के पत्रों को पढ़ने पर यह जाना जा सकता है | मैंने अपनी संस्मरणों की नई प्रकाशित पुस्तक ‘दर्पण में वे दिन’ में ऐसे बहुत से अल्पज्ञात प्रसंगों की चर्चा की है जिनसे पता चलता है कि हिंदी नवजागरण के उत्तर-कालखंड में हिंदी के साहित्य-निर्माताओं का जीवन कितना असुरक्षित और संघर्षपूर्ण था, और वे सब शिवजी को कितना सम्मान देते थे |

सम्पादन और प्रूफ-रीडिंग उस लेटर-प्रेस युग में कितने अनिवार्य, संश्लिष्ट और कठिन कार्य थे जिन्हें निराला, प्रसाद और प्रेमचंद की कोटि के लेखक भी स्वयं नहीं कर सकते थे, और इसके लिए भाषा की उच्च-स्तरीय समझ और सामर्थ्य उस समय के बहुत कम ही लोगों में थी | यह दुष्कर कार्य शिवजी ने इसलिए अपने ऊपर नहीं ले लिया था कि यह उनके लिए कोई सुखदायी कर्म था, जैसा भ्रम कुछ लोगों को था, जैसे जगदीश चन्द्र माथुए का यह लिखना कि “शिवपूजन जी को एक त्रुटिपूर्ण पृष्ठ का सांगोपांग प्रूफ संशोधन करने में वही आनंद मिलता था, जो किसी सेठ को अपने शेयरों के सूद का मिलान करने पर मिलता है, अथवा किसी पेटू पांडे को सुस्वादु भजन पाने पर “! लेकिन पिछले प्रसंगों में  विनोदशंकर व्यास ने अपने संस्मरण में  शिवजी के इस प्रकार के हृदयहीन श्रम-शोषण का वास्तविक चित्र अंकित किया है | यह सच है कि प्रूफ-संशोधन भले ही एक मशीनी हुनर हो, लेकिन उसमें आँखों का तेल तो निकल ही जाता था, और अच्छे प्रूफ-रीडर उस ज़माने में भी बहुत नहीं  होते थे, लेकिन गहन भाषा-साधना से अर्जित भाषा का जैसा ज्ञान शिवजी को था, वह उनके समय में किसी और के पास नहीं था | इसका एक छोटा-सा उदाहरण ‘जागरण’ में प्रकाशित, शिवजी द्वारा संशोधित ‘प्रसाद’ जी की कविता की दो पंक्तियाँ हैं: – “विभुता विभु-सी दुख-सुख  वाली, दिखलाती हो सत्य बनी रे” (मूल), और शिवजी द्वारा  संशोधित : “विभुता पड़े दिखाई विभु-सी, दुख-सुख वाली सत्य बनी रे”| यहाँ यह बिलकुल स्पष्ट हो जाता है कि गद्य के प्रसाद गुण की प्राप्ति  से कविता कैसे स्वाभाविक रूप से निखर जाती है | इस प्रसंग पर अलग से विस्तार से विचार हो सकता है |  इसे  पेट-पूजा और सूद-मिलान का वासना-शमन  जैसा कार्य समझना अपनी नासमझी को ही दर्शाना है |

 ‘जागरण’ में प्रकाशित, शिवजी द्वारा संशोधित लगभग सभी पांडुलिपियाँ शिवजी के संग्रह में उपलब्ध हैं | ‘ द्विवेदी अभिनन्दन ग्रन्थ’, राजेंद्र अभिनन्दन ग्रन्थ’, ‘प्रवासी-प्रपंच’ (ब्रह्मदत्त भवानी दयाल का उपन्यास) – इन सबकी मूल पांडुलिपियाँ संग्रहालयों में आज भी सुरक्षित हैं, और उनको देखकर समझा जा सकता है कि शिवजी के संशोधनों में इनमें भाषा की कैसी बारीक कारीगरी दिखाई देती है | ‘रंगभूमि’ संशोधन भी शिवजी ने किया था, पर वह प्रेस-कॉपी दुलारेलाल के गोदाम में गुम हो गयी | फिर भी भाषा-वैज्ञानिक शोध से यह देखा जा सकता है कि प्रेमचंद की कथा-भाषा का स्वरूप उसके पहले और बाद के उनके  उपन्यासों में कितना अप्रभावित या प्रभावित रहा है | डा. कमल किशोर गोयनका ने ‘शतरंज के खिलाडी’ (‘माधुरी’, अक्टूबर, १९२४) का पाठ-शोध लोथार लुत्से के साथ प्रकाशित किया है, पर उसमें भी कई प्रकार की असंगतियाँ रह गयी हैं | क्योंकि जिस कहानी का संशोधन-सम्पादन  निश्चय ही शिवजी ने अगस्त-सितम्बर, १९२४ में, लखनऊ में रहते हुए ‘रंगभूमि’ के साथ ही किया था, उसको दुलारेलाल द्वारा किया मान लिया गया है, जबकि दुलारेलाल में  प्रेमचंद की भाषा का सम्पादन करने में क्षमता भला कहाँ  होती, यह तो शिवजी को लिखे (‘समग्र’-८ में प्रकाशित) उनके पत्रों की भाषा को पढ़ कर ही जाना जा सकता है | इसीलिए हिंदी के समीक्षात्मक इतिहास-लेखन की यह सबसे बड़ी कमी है कि वह शिवजी के साहित्यिक अवदान का केवल उचित मूल्यांकन नहीं करती, इतना ही नहीं है, वह निश्चित रूप से उसका अवमूल्यन और उसकी असंगत उपेक्षा करती है, और उनके श्रम और हिंदी-हित में किये गए आदर्श समर्पण और त्याग की अवमानना करती हुई आगे बढ़ जाती है | वह इस पर रुक कर सोचने की जहमत ही  नहीं उठाती कि क्यों प्रेमचंद ने ‘रंगभूमि’ के शिवजी द्वारा संशोधन-सम्पादन को उनकी ‘महीनों की दिमाग-रेज़ी’ कह कर अपना आभार जताया था |

अभी इस लेखक-प्रकाशक-शोषण प्रसंग का समापन शिवजी के एक वैसे ही मार्मिक वाक्य से किया जा रहा है, जो  प्रकाशकीय शोषण से किसी हद तक मुक्त होकर कॉलेज की प्राध्यापकी में आने पर अनुभूत राहत से फिर और उच्चतर साहित्य-सेवा के नाम पर वहां से भी खींच कर सरकारी शिक्षा विभाग की सेवा में बिहार राष्ट्र-भाषा परिषद् के मंत्री पद पर आने के बाद, उनकी डायरी में,  शिवजी की करुण-कथा का एक शीर्ष-वाक्य बन गया -                 

 राजेन्द्र कॉलेज छोड़कर मैंने बहुत भारी भूल की | परिषद् में साहित्यसेवा करने आया; पर यहाँ तो बस कुटिलों का कुचक्र ही आगे आया (४.७.५६) | “

चित्र: १. जब राजेन्द्र कॉलेज में थे  २. छात्र  की रचना का संशोधन   ३. उस समय के प्रूफ-पाठ का नमूना  ४. सिंघासन बत्तीसी (मूल पुस्तक) जिसका हिंदी अनुवाद 'तोता-मैना' की तरह करना चाहते थे, पर वह पूरी योजना अधूरी रह गयी |  


आलेख एवं चित्र (C) मंगलमूर्त्ति

इसी क्रम में ‘बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् और शिवपूजन सहाय’ पर भी एक २-३ किस्तों की श्रृंखला



मैं लिखना चाहता हूँ जिसे आगे के सप्ताहों में आप मेरे इसी ब्लॉग पर पढ़ सकेंगे, जिसमें १९५० से १९६३ तक की कहानी के कुछ महत्त्वपूर्ण प्रसंग होंगे | बाद में संभव होगा तो इस श्रंखला-सामग्री को एक पुस्तक का रूप भी दिया जा सकेगा |