'देहाती दुनिया' : शती-प्रसंग'
आज के कलमघसीटू दौर में गद्य
नामवर सिंह
हिंदी भूषण शिवपूजन सहाय न्यास से मैं आरंभ से जुड़ा हूं । इस न्यास की ओर से पटना और दिल्ली में पहले जो भी कार्यक्रम हुए हैं, उन कार्यक्रमों मेें भी भाई मंगलमूर्त्ति की प्रेरणा और पहल से मैं कुछ कहता बोलता रहा हूं । मुझे खुशी है कि उस कड़ी में यह आयोजन काशी में, और काशी में भी काशी हिंदू विश्वविद्यालय में हो रहा है । इस अवसर पर भी भाई मंगलमूर्त्तिजी ने यह उपयुक्त समझा कि इस मिट्टी से पैदा होने वाले एक व्यक्ति को यहां शिवजी को याद करने को उपस्थित होने के लिए कहा जाए । मैं आपके सामने हूं । पहले भी मैं कहता रहा हूं कि मैं तो बनारस आने के बहाने ढूंढ़ता रहता हूं, तो ये एक बहाना है । काशी से शिवजी का क्या और कितना संबंध रहा है, भाई आनंदकृष्णजी इसे बेहतर बता सकते हैं । शिवजी को मैंने पहली बार काशी में 1945 के आस पास नागरी प्रचारिणी सभा की स्वर्ण
जयंती के अवसर पर देखा था, और उसके बाद तो कई बार देखने का मौका मिला । उन्होंने ‘हिमालय’ नाम की पत्रिका पटना से संपादित करके निकाली थी । जब मैं इंटरमीडिएट का विद्यार्थी थाय तो बाल चापल्यवश मैंने भी एक चिट्ठी ठोंक दी थी । उनकी उदारता, विशाल हृदयता को देखिए कि उन्होंने एक बालक के उस पत्र का भी जवाब दिया । मेरे पास अब भी सुरक्षित है वह चिट्ठी । मैंने दोबारा पत्र लिखा और उन्होंने दोबारा उसका जवाब दिया । उसके बाद तो उनके दर्शन के अवसर कई बार आए । मंगलमूर्त्ति जी उनके निश्चय ही आत्मज हैं, पर यदि हृदयज कोई शब्द बनता आत्मज की तरह तो उनके हृदयज लोगों में से मैं भी एक हूं ।आज का विषय
है ‘आज के कलमघसीटू दौर में गद्य’ ।
‘कलमघसीटू’ शब्द अटपटा
लगा है । टांगघसीटू लोग तो बहुत से
होते हैं, ‘टांग–खींचू’ भी
होते हैं । इसलिए मैंने
कहा कि यदि अकादमिक आलोचना की
शास्त्रीय भाषा में
ही विषय रखा
जाए तो जरा गरिमामय मालूम होता
है । लेकिन उस मिथ्या–गरिमा और
मिथ्या–भव्यता को
तोड़ने के लिए मैंने यह
शब्द चुना । कई तरह
से इस दौर का नाम
लिया जाता है,
पर मैं समझता
हूं कि यह दौर कमलघसीटू
है । सचमुच हिंदी में
यह एक टांग–खींचू और
कलमघसीटू दौर है
। इस दौर में गद्य
की चर्चा की
जाए तो गद्य ही ऐसी
चीज है जो आप में
से कुछ लोगों
को गदगद जरूर
करेगी । उसी गदगदायमान मन:स्थिति
में आप इस बातचीत को
ग्रहण करें । गद्य पर
इस विश्वविद्यालय में
ही संभवत: पहले मैं
कुछ बोल चुका
हूं । कुछ और बातें
सूझीं, उनकी ओर इशारा करना
चाहता हूं ।
आज सुलेख लिखने
की परंपरा खत्म
हो गई है । हम
लोग जब प्राइमरी
में पढ़ते थे तो सुलेख
की एक छपी कापी मिला
करती थी । और हमारे
अध्यापक पहला काम
सुलेख लिखाने का
किया करते थे । सरकंडे
की कलम से हम लोग
लिखते थे । पट्टी को
खूब घिसकर चिकनी
बनाते थे और खड़िया वाली
स्याही से उस पर लिखा
करते थे । दवात हुआ
करती थी । कलम सरकंडे
की होती थी तो हम
उनकी मेज पर रख देते
थे, और हमारे
मास्टर पहला काम
ये करते थे कि सबकी
कलम काटकर, कत
लगाकर, हर विद्यार्थी
को दिया करते
थे । यह ‘कत’ उर्दू
से आया है, क्योंकि उर्दू में
दो चीज चला करती थी
। उर्दू में
शिकस्त लिखने की
परंपरा थी यानि घसीट कर
लिखना । कचहरियों
में काम करने
वाले, कागज–पत्र
लिखने वाले लोग,
शिकस्त उर्दू लिखते
थे । जानबूझ
कर लिखते थे
कि उसको पढ़वाने
के लिए उनके
पास आना पड़े़गा
और लोग उनकी
फीस देंगे । कैलियोग्राफी की परंपरा
के साथ खुशख़त
लिखना भी उर्दू
की एक कला थी ।
कैलियोग्राफी की पेंटिंग
बनी हुई है, भाई आनंदकृष्णजी
बेहतर जानते होंगे
बताएंगे कि पुरानी
जो पांडुलिपियां मिलती
थीं । इस ‘खुशखत’ शब्द
का हिंदी में
हम लोगों ने
अनुवाद किया हैµसुलेख ।
इस तरह की परंपरा थी
। अब कटी हुई कलम
का रिवाज तो
खत्म हो गया । फाउंटेन
पेन आया, वो भी उठ
गया । बाल पेन आ
गया है, और इसके बाद
तो आप घसीटेंगे
ही बॉल पेन पर ।
और सबसे अच्छा
हस्ताक्षर करने वाला
आदमी वो है कि ऐसा
हस्ताक्षर करे कि
पढ़ा ही न जा सके
। इसलिए इस
दौर को मैंने
कलमघसीटू कहा है
। एक जमाने
में बड़े–बड़े सुलतान और
बादशाह कुरान शरीफ
खुशखत अपने हाथ
से लिखा करते
थे । इतिहास
में आप पढ़ेंगे
। दिल्ली सल्तनत
में कई लोग थे ।
उसी से उनका खर्चा चलता
था । यही बात पुरानी
पांडुलिपियों को लिखने
में नागरी लिपि
में भी लोग किया करते
थे । हिंदी में शिरोरेखा
गायब हो गई है, लेकिन
मराठी में, नागरी
लिपि में, शिरोरेखा
अब भी पूरी लिखी जाती
है । किसी मराठी लेखक
को देख लीजिए
वो शिरोरेखा के
साथ लिखता है
। उसका प्रभाव
भाषा पर भी पड़ता है
। शिरोरेखा में
न लिखने के
कारण ‘भ’ और ‘म’ का
फर्क मिट जाता
है । ‘घ’ और ‘ध’
का फर्क मिट
जाता है । ऐसे कई
अक्षर हैं । इसलिए मैंने
कहा कि यह कलमघसीटू दौर है । जहां
तक लिपि का या लेखन
का सवाल है,
सुलेख छोड़कर विकृत
हस्तलेख भी एक बड़ा भारी
गुण और आभूषण
हो गया है । पहले
टाइपराइटर और अब
कंप्यूटर प्रिंटिंग के चलते लगता है
कि वो हाथ जो एक–एक शब्द
को लिखते समय
लिखने में मजता
था, तो आप की भाषा
भी ठीक हो जाती है
। घसीट कर लिखेंगे तो आप गलतियां भी बहुत करेंगे और
जिसको कहते हैं
संदेह का लाभ वो तो
आप लेंगे ही
। तो ये दौर है
।
इस दौर के
चलते मैं गद्य
की चर्चा करना
चाहता हूं ? एक
तो शिवजी सुलेख
में विश्वास करने
वाले आदमी थे । पत्रिकाओं
के संपादन के
क्रम में जो लेख उनके
पास आते थे, उनमें कभी–कभी लेखों
को शुद्ध करके,
अपने हाथ से लिखकर प्रेस
में देते थे । केवल
लाल स्याही में
संशोधन करके छोड़
नहीं देते थे । गलतियां
जब बहुत हो जाती थीं
तो अपने हाथ
से लिखकर प्रेस
में दिया करते
थे । मैं बात करना
चाहता हूं कि संपादन की
तरह गद्य–लेखन
में भी वो उतनी ही
सावधानी बरतते थे
। यह बात एक स्वर
में उस दौर के कई
लोगों ने लिखी है - मै
केवल दो आदमियों
के उद्धरण आपके
सामने देना चाहूंगा
। एक केसरी
कुमार का लिखा हुआ है,
और दूसरा प्रसिद्ध
नाटककार जगदीशचंद्र माथुर
का ।
केसरी कुमार लिखते
हैं, ‘‘पद्मभूषण होने
से पहले ही वे हिंदी
जगत के भूषण हो चुके
थे । ये जनोपाधि उन पर खूब फबती
थी । केवल शिवपूजन बाबू को पढ़कर कोई
तत्कालीन हिंदी में
प्रचलित समस्त लेखन
शैलियों को जान सकता है
। एक शैली में उन्होंने
नहीं लिखा । भाषा की
ऐसी मंजाई उन्होंने
की थी, और उसे इतनी
वशवर्तिनी बनाया था
कि हर प्रकार
की शैली में
लिखना उनके लिए
हस्तामलकवत था ।
एक ही रचना में वे
कादंबिनी की कल्पित
ललित अलंकृति और
मुहावरों की बांकी
झांकी दिखा सकते
थे, जैसे ‘मुंडमाल’
में । वे परिनिष्ठित हिंदी में
संपादकीय लिखते और
टकसाली हिंदी में
‘चलती चक्की’ नाम
का कॉलम लिखा
करते थे । वे लिखकर
बहला सकते थे और अगिया
बैताल बनकर दो घड़ी बहका
भी सकते थे । ‘भट्टनायक’
नाम से उच्छ्वास–मुक्त भाषा
में उन्होंने दो
साहित्य इतिहासों–बाबू
श्यामसुंदर दास कृत
‘हिंदी भाषा और साहित्य’ तथा पंडित
रामचंद्र शुक्ल कृत
‘हिंदी साहित्य का
इतिहास’ के अभावों,
त्रुटियों, एवं प्रयोगों
के अनौचित्य तथा
बिहार
– वासियों की
उपेक्षा पर लिखा । उच्छ्वासकष्टी
भाषा में तो उन्हें महारत
हासिल थी ही । अतिरेक–निरपेक्ष, पग–पग पर आघातों
से सजग भाषा
तो उनके जीवन
के शेष काल में बनी
रही । केसरी कुमार ने
लिखा कि शिवजी
का गद्य पढ़कर
पाठक हिंदी में
प्रचलित समस्त शैलियों
को जान सकते
हैं । शिवजी का गद्य
हैµअतिरेक–निरपेक्ष,
विकल्प–शंकित । ये शब्द
हिंदी में नहीं
मिलेंगे । आज कोई इस्तेमाल
नहीं करेगा । गद्य कैसा
लिखा जा रहा थाµअतिरेक–निरपेक्ष, विकल्प–शंकित,
पग–पग पर आघातों से
सजग इत्यादि ।
शिवपूजन सहाय पर
‘हिंदी–भूषण’ की
उपाधि इसलिए भली
फबती थी कि वे अंतिम
सांस तक हिंदी
के सजग प्रहरी
और संरक्षक रहे
।
दूसरा उद्धरण है
जगदीश चंद्र माथुर
का । वो आई–सी–एस– थे
। विख्यात नाटककार
भी । उनके नाटकों से
आप परिचित हैं
। वे लिखते
हैं, ‘‘शिवपूजन जी
को संतुलित वाक्य
लिखने, सुडौल और
समाकार अक्षरों को
कागज पर उतारने,
एक त्रुटिपूर्ण पृष्ठ
का सांगोपांग संपादन
करने एवं प्रेस
के भूतों के
मायाजाल को विकीर्ण
करके एक ही पन्ने का
भलीभांति प्रूफ संशोधन
करने में वही आनंद मिलता
था जो किसी सेठ को
अपने शेयरों के
सूद का मिलान
करने पर मिलता
है, और किसी पेटू पांडे
को सुस्वादु भोजन
पाने पर ।’’
दो लेखकों का
गद्य आप देखेंµकिस तरह
लिखा गया होगा
। किसके बारे
में लिखा जा रहा है,
और लिखते समय
लिखने वाले की कलम कितनी
सधी हुई चलती
है । ऐसा गद्य इसी
दौर में लिखा
गया है । बल्कि इस
दौर के कुछ दशक पहले
लिखा गया है । इसलिए
नमूने आप को दिए ।
भाषा के बारे में उनकी
जो समझ थी, उसका एक
नमूना उनके एक लेख में
मिल जाएगा । भाषा की
ताकत संज्ञा, सर्वनाम
शब्दोें या विशेषणों
में नहीं होती
है । किसी भाषा की
ताकत क्रियाओं में
होती है । क्रियाओं से भाषा कुछ की
कुछ बन जाया करती है
। हमारे गुरु
आचार्य केशवप्रसाद मिश्र
ने क्लास में
एक दिन बताया
था कि विश्वविद्यालय
के एक लड़के ने गंगाजी
में नौका विहार
कर के वापस दूसरे लड़के
से कहा कि आज हम
गंगाजी में खूब रोये ।
वह रोर्इंग करने
के अर्थ में
कह रहा था, हिंदी के
रोने के अर्थ में नहीं
। हर भाषा की पहचान
उसकी क्रियाओं से
होती है । आज के
निष्क्रिय लोग क्रिया
की ताकत नहीं
पहचानते हैं, बल्कि
संज्ञा और विशेषणों
पर ज्यादा समय
बर्बाद करते हैं
। हिंदीभूषण शिवपूजन
सहाय का एक लेख हैµ‘तुलसी प्रयुक्त
क्रियाएं’ । तुलसीदास
केवल रामकथा लिखने
के लिए नहीं
जाने जाते बल्कि
अपनी भाषा के कारण भी
जाने जाते हैं
। भाषा पर जैसा अधिकार
तुलसीदास को है,
वैसा अधिकार हिंदी
में किसी दूसरे
आदमी को न तब था
न उसके बाद
हुआ । अच्छी हिंदी लिखने
के लिए, भाषा
लिखने के लिए, तुलसी को
पढ़िएµआप कहेंगे
कि अवधी और ब्रज भाषा
पढ़कर खड़ी बोली
लिखना कैसे सीखेंगे,
फिर भी पढ़िए । तब
पता चलेगा । अगर आचार्य
शुक्ल का गद्य आपको एक
आदर्श गद्य लगता
है तो उसके पीछे छिपी
हुई ताकत रामचरितमानस
और तुलसी साहित्य
है, जिसको उन्होंने
घोंट डाला था । अंतिम
दिनों में वे चाहते थे
कि अवकाश प्राप्त
करने के बाद तुलसी घाट
पर बैठकर रामकथा
पढ़ें । यह मेरे गुरु
केशव जी ने बताया था
। तो बाबू शिवपूजन सहाय ने
‘तुलसी प्रयुक्त क्रियाएं’
लेख लिखा । उनका कहना
था कि हिंदी
में यह कमजोरी
आई है! अवधी
और ब्रज के सामने आज
तुलसीदास जैसी भाषा
क्यों नहीं लोग
लिखते हैं । तो उत्तर
यह है कि एक जमाने
में हिंदी में
क्रियाओं की बहुलता
थी । संज्ञाओं
को भी क्रिया
के रूप में बना देते
थे । ‘नाम धातु’ जिसे
संस्कृत में कहते
हैं । शिवजी ने लिखा
है, ‘भारतेंदु युग
के प्रमुख गद्यकार
भी छमिये, रमिये,
सेवते हैं, छलते
हैं, भावते हैं,
अवगाहते हैं, प्रतिपालते
हैं, संकोचते हैं,
आचरते हैं, अनुमानते
हैं, आदि प्रयोगों
को अंगीकृत कर
चुके थे ।’ हिंदी जब
से खड़ी बोली
हुई तब से उसने पुरानी
परंपरा छोड़ दी है ।
बहुत–सी क्रियाएं
अब भी गांव की बोलियों
में हैं । ‘जुतियाने’ में जो ताकत है
वो ‘जूते से मारने’ में
नहीं है । खूब ‘बतियाने’
में जो बात है वो
‘बात करने’ में
नहीं है । इसलिए पहले
के लोग इन क्रियाआंे का इस्तेमाल
करते थे । शिवजी की
नजर इस पर थी कि
क्रियाओं के प्रयोग
हम भूल गए हैं, जो
पहले आम तौर से क्रिया
का प्रयोग करते
थे । उनकी विनम्रता देखिए कि
वे अपने को भाषाविद् नहीं मानते
। अच्छा था
कि वे अपने को भाषाविद्
नहीं मानते थे
। सबसे भ्रष्ट
हिंदी भाषा–विज्ञान
वाले लिखते हैं
। ‘‘तजहूं तात
तुमको हम जानी,
निश्चय ही भाषा विज्ञानी” । छंद याद कीजिएµकाशीनाथ
जी ने कभी लिखा था
। शिवजी लिखते
हैं, ‘‘मैं भाषातत्वविद
नहीं हूं, पर पुराने कवियों
और गद्यकारों के
सुहाने प्रयोग देखकर
ऐसी इच्छा होती
है कि आधुनिक
हिंदी गद्य के प्रभावशाली लेखक इस तरह की
क्रियाओं को टकसाली
बनाने का प्रयास
करने में तत्पर
हों तो हिंदी
का अंग संवरेगा,
कोई सहृदय साहित्यानुरागी
उसे दूसेगा नहीं” । क्रिया का
प्रयोग देखेंµ‘दूसेगा
नहीं’ । गांव की बोलियों
में जो ताकत है वो
इसीलिए कि वो धड़ल्ले से
संज्ञाओं को क्रिया
की तरह इस्तेमाल
करती हैं । वहां नाम
धातुओं का खूब प्रयोग होता
है । खड़ी बोली में
ऐसा कुछ खड़खड़ापन
आया कि संस्कृत
से तो हम लेने लग
गए पर भूल गए कि
संस्कृत में ऐसा बहुत होता
है । वहां नाम धातुओं
की सूची बहुत
लंबी है । इंद्र से
इंद्रयते बना देते
हैं, कृष्णायते बनाते
हैं । संस्कृत
में ये ताकत थी ।
ये परंपरा तुलसीदास
में मौजूद थी
। भारतेंदु युग
के लेखकों मंे
मौजूद थी । आधुनिक युग
में, मैं कहूं
कि जब से महावीर प्रसाद
द्विवेदी ने खड़ी
बोली चलाई, व्याकरण
वाली, उसके कारण
हुआ या उससे भी ज्यादा
कहूं तो स्वाधीनता
प्राप्त होने पर जो रघुवीरी
हिंदी चली उसके
कारण ये हुआ है ।
इसलिए शिवजी की
स्मृति में मैंने
सोचा कि गद्य की चर्चा
की जाए । आपके सामने
मैं सुझाव नहीं
दे सकता, लेकिन
कम–से–कम आज इस
परंपरा को हम लोग याद
तो कर सकते हैं ।
बालमुकुंद गुप्त हिंदी
मुहावरों के पक्षधर
थे । इसलिए उन्होंने कहा कि लेखक ने
अंग्रेजी बोतल का
टुकड़ा पीसकर हिंदी
की खिचड़ी में
मिलाया है । गुप्तजी ने यह भी कहा
कि द्विवेदीजी को
‘को’ की बड़ी बीमारी है
। अंग्रेजी में,
हम लोग समझते
हैं कि जब भी कर्मकारक
लगाना होगा तो हिंदी में
‘को’ लगा दिया
। लेकिन बहुत
समझ–बूझकर लगाना
होगा ‘को’ को । बहुत
जगह ‘को’ नहीं
होता है । जैसे वे
कह रहे हैं,
‘द्विवेदीजी को ‘को’
की बड़ी बीमारी
हैµबहुत से वाक्यों को न समझ सके
।’ अब बहुत से वाक्य
न समझ सके लिखिए ।
यहां ‘को’ की कोई जरूरत
नहीं है । कर्म कारक
वहां ही नहीं होता जहां
‘को’ होता है । बल्कि
जहां नहीं भी होता है,
वहां भी कर्म कारक होता
है । सीधी सी बात
हैµबहुत से वाक्य न
समझ सके । जिनको हिंदी
न जानने वालों
की सोहबत है
वो इसी प्रकार
‘को’ की भरमार
करते हैं । यह जो
बहस थी रामविलास
जी ने भी इस पर
टिप्पणी की है और बहुत
सही टिप्पणी की
है । भारतेंदु
युग और द्विवेदी
युग में आचार्य
शुक्ल ने भाषा को लेकर
लोगों का खासकर
बिहार वालों का
मजाक उड़ाया है
। मसलन बिहार
वाले व्याकरण की
किताबें बहुत लिखते
हैं । एक जमाने में
हिंदी व्याकरण पर
किताबें सबसे ज्यादा
बिहार वाले लिखा
करते थे । आचार्य शुक्ल
के पास व्याकरण
की एक पाठ्य–पुस्तक आई
। उसमें लिखा
हुआ था कि तुम गधा
हो । इस पर शुक्ल
जी ने लिखा है कि
मैंने आकाशे दृष्टि
बद्धवा, आकाश की ओर दृष्टि
करके वाक्य का
शुद्ध पाठ दोहरा
दिया, क्योंकि ‘तुम
गधे हो’ होना
चाहिए । ‘तुम गधा हो’
हिंदी में हो ही नहीं
सकता, शब्द बदल
जाएगा । ये छोटी–छोटी
चीजें हैं । इन चीजों
पर एक जमाने
में विचार होता
था ।
जब हम स्वाधीन
हुए, तो स्वाधीनता
प्राप्ति के पश्चात
इस तरह की परंपरा में
पले हुए विद्वान
थे । स्वाधीनता
के पहले से वे यह
काम करते आ रहे थे
और स्वाधीनता प्राप्ति
के बाद ‘बिहार
राष्ट्रभाषा परिषद’ के
जब वे पहले सचिव रहे,
फिर निदेशक हुए,
और जो ग्रंथ
उन्होंने प्रकाशित किए हैं,
क्या मजाल कि उन पुस्तकों
के पहले संस्करण
में छापे की कोई भूल
आपको मिल जाए । उस
दौर में संपादकों
का काम महत्वपूर्ण
था । अब कोई भी
आदमी देखिए तो
पत्रिका निकालने के
लिए संपादक बन
जाता है । एक अंक
दो अंक, भड़ास
निकली, इसके बाद
पत्रिका बंद हुई । संपादक
होने का क्या मतलब ? संपादन
नाम की एक चीज थी
। उस्मानिया विश्वविद्यालय
के संस्कृत के
एक प्रोफेसर थे
। उन्होंने ‘काव्यायन’
नाम से ‘यह बेचारी हिंदी’
नाम का कॉलम
1955 के आसपास शुरू
किया । फिर उसी परंपरा
में 1964 में जाकर
दूसरा कॉलम बालकृष्ण
राव ने ‘अनमोल
बोल’ नाम से लिखा ।
उसमें वे नमूने
केवल कोट कर देते थे,
बिना टिप्पणी के,
निशान लगाकर कि
ये देखिएµये
लिख रहे हैं । तीसरा
कॉलम जो यहां के लिए
ज्यादा प्रसंगानुकूल है,
बालकृष्ण राव ‘प्रोफेसरी
हिंदी’ नाम से लिखते थे
। ‘प्रोफेसरी हिंदी’
में पहले शिकार
हुए हिंदी के
भूतपूर्व प्रोफेसर अध्यक्ष विजयपाल
सिंह । उनके शोध ग्रंथ
से उन्होंने नमूने
दिए । दूसरा हमला उन्होंने
किया माताप्रसाद गुप्त
पर । मंझन की ‘मधुमालती’
से उदाहरण देकर
।
इलाहाबाद वालों की
हिंदी सचमुच गड़बड़
है । यद्यपि
स्वयं प्रो– धीरेंद्र
वर्मा आर्य सभा
के संस्कारों वाले
थे । भाषा में भी
शुद्धता पर उनका बल था
। स्वयं उनसे
गलती नहीं होती
थी, पर क्या करें, उनके
पढ़ाए हुए लोग ऐसे निकल
जाते थे । एक उदाहरण
प्रसंगवश केवल बता
रहा हूं । भारतीय हिंदी
परिषद का छठवां
अधिवेशन इलाहाबाद विश्वविद्यालय
में हुआ था और उसके
अध्यक्ष थे दीनदयाल
गुप्त । वे लखनऊ विश्वविद्यालय
में प्रोफेसर अध्यक्ष
थे । सीनेट हाल में
उनका भाषण हो रहा था,
शीर्षक थाµ‘भारतीय
हिंदी परिषद षष्ठम
अधिवेशन का अध्यक्षीय
भाषण’ । मैं भी मौजूद
था । मेरे बगल में
गुरुजी मौजूद थे
। उनके साथ
मैं भी गया था ।
धीरेंद्र जी वहीं
बैठे हुए थे । पंडितजी
ने कहा अभी मालूम हो
जाएगा कि छापे की गलती
है कि पं– दीनदयाल की गलती है ।
दीनदयाल जी भाषण पढ़ने खड़े
हुए और उन्होंने
स्वयं कहा कि इस षष्ठम
अधिवेशन में, और एक बार
नहीं, दस बार ‘षष्ठम’ दोहराया
गया । पंडित जी ने
धीरेंद्र जी की
ओर देख कर कहा कि
ये छापे की गलती है
? जो संस्कृत नहीं
जानते हैं वो आमतौर से
संस्कृत का अतिरिक्त
ज्ञान दिखाते हैं
। नवम होता
है, दशम होता
है, सप्तम होता
है, पंचम होता
है । दुर्भाग्य
से पंचम और सप्तम के
बीच में षष्ठम
नहीं होता है,
षष्ठ ही होता है ।
इसलिए तदभव में
छठ है । लोक बोलियों
के लोग ज्यादा
सावधान हुआ करते
हैं । बिहार में छठ
का पर्व हुआ
करता है । छठ ‘षष्ठ’
से बना हुआ है ।
छट्ठम कोई नहीं
लिखता है । इसलिए आम
जनता षष्ठ का छठ कर
रही है और आप बड़े
भारी हिंदी के
प्रोफेसर बने हैं
। इसलिए फिर
से एक पत्रिका
में कॉलम ‘प्रोफेसरी
हिंदी’ चलाया जाना
चाहिए । शोध–प्रबंधों में और जो कमजोरियां
हों, दरकिनार कर
दें, लेकिन भाषा
की सारी की सारी गलतियां
टंकणगत भूलें नहीं
हुआ करती हैं
। टाइप का सहारा लेकर
अपनी अशुद्धियों को
ढकने की कोशिश
की जाती है । ‘कल्पना’
में जो काम ‘काव्यायन’ और बालकृष्ण
राव जैसों ने
शुरू किया, उसमें
योगदान भी दिया था कि
यह चिंता लोग
सत्तर के दशक तक करते
थे । पर वह चिंता
दिन पर दिन घटती गई
। लगभग 1960 के
अंत के बाद ‘कल्पना’ जब से बंद हुई
है । और वह कॉलम
बंद हो गया । फिर
मैंने नहीं देखा
कि किसी पत्रिका
ने इस बेचारी
हिंदी के लिए ‘प्रोफेसरी हिंदी’ या
‘अनमोल बोल’ कॉलम
निकाला हो जो लोगों की
भाषा की गलतियां
बताए । बड़े लोगों से
अब गलतियां होती
हैं, छोटों की
तो बात ही नहीं है
। ये विद्यार्थियों
की चीजें नहीं
हैं । इसकी आज बहुत
जरूरत है । ऐसे समय
पर हम याद करते हैं
कि काश आज हिंदी भूषण
शिवपूजन सहाय होते
। और आज इस प्रसंग
में उनको याद
करना बहुत जरूरी
है ।
हिंदी भाषा की ताकत देखनी हो तो इस दौर के उपन्यासों–कहानियों अथवा कुछ अंश तक नाटकों में देखा जा सकता है । आप देखें तो मुख्य रूप से हिंदी की ताकत कुछ निबंधों में, चिंतन प्रधान ग्रंथों में मिलेगी, जहां अधिकांश साहित्य कुल मिलाकर लाइबेे्ररी में देखा जाएगा । इतिहास आप कविता में नहीं लिख सकते । अब वो जमाना गया कि ‘राजतरंगिणी’ आप कविता में लिखें । भारत का इतिहास अब गद्य में ही लिखा जाएगा । भूगोल गद्य में लिखा जाएगा, दर्शन गद्य में लिखा जाएगा । कविता में अब दर्शन नहीं लिखा जा सकता । इसलिए विज्ञान, समाज विज्ञान, इतिहास, राजनीति, अर्थशास्त्र गद्य में लिखा जाएगा । और इसलिए हर जीवन की गाथा उपन्यासों में, कहानियों में, नाटकों में, निबंधों में लिखी जाएगी । और इसलिए इस युग के गद्य की ताकत आप देखेंगे तो कविता से ज्यादा कथा साहित्य में मिलेगी । और ये शुरूआत प्रेमचंद से होती है । और आज के दौर में ऐसा और होगा । अक्सर मुख्य मुद्दा लोग भूल जाते हैं । मैं नाम किसी का जानबूझकर नहीं ले रहा हूं । यद्यपि मेरे प्रिय गद्य लेखक हैं और कुछ आज भी मौजूद हैं । उनके गद्य को प्रमाण मानेंµअध्यापकों के लिए अपठनीय शोध ग्रंथों मंे नहींµतो मेरा सबसे खराब गद्य जो है वो ‘कविता के नए प्रतिमान’ का है । कुछ सनक सवार रही होगी सैद्धांतिक लिखने की । दूसरे कुछ और लेखक हैं, कुछ पुस्तकेें हैंµउनके कुछ गद्य मुझे अच्छे लगते हैं । मुझे अपने से ज्यादा अच्छा गद्य काशी का लिखा हुआ फिक्शन में दिखाई पड़ता है । माध्यम होता है कि जिंदगी से जुड़ा हुआ । वहीं वह उभर कर आता है । अच्छा गद्य लिखने वालों में हरिशंकर परसाई का गद्य अच्छा लगता है, निर्मल जी का गद्य मुझे बहुत अच्छा लगता है । और खासतौर से उनका गद्य उनके लेेखों में, निबंधों में नहींµउनकी कहानियों में, उनके उपन्यासों में दिखाई पड़ता है । इसलिए अगर यह गद्य युग है तो इस गद्य युग में कम–से–कम हम लोग उस गद्य की गरिमा सुरक्षित रखें । गद्य की शक्ति को पहचानें, उसकी जीवतंता को पहचानें । अनेक शैलियां होंगी लेकिन ये बहुत बड़ा काम है । विश्वविद्यालय में मेरा बस चले तो सारे सवालों के जवाब सही लिखे हुए हों, लेकिन यदि भाषा भ्रष्ट हो तो मैं उसमें से 50 फीसदी अंक काट लूं । अगर ये संस्कार बने, चूंकि मैं अपनी ही विद्या–भूमि में कह रहा हूं ऐसा, और अत्यंत विनम्रता से सिर झुकाकर कहना चाहता हूं, कि हम लोग ये अगर जिम्मेदारी उठा लें तो हिंदी भूषण बाबू शिवपूजन सहाय की विरासत पर आज जो चर्चा हो रही है, उसका सचमुच कोई संदेश हम ग्रहण कर सकेंगे, और दूसरों तक पहँुचा सकेंगे । कहने की बहुत–सी बातें थीं, लेकिन अभी उन्हें छोड़ दिया है । किसी और व्याख्यान में या कहीं लिखने का मौका मिला तो लिखने की कोशिश करूंगा । मुझे उम्मीद हैµयही कहूंगा कि मेरी बातों को समझें, उनमें तल्खी या तकरीर न देखें । मैं जो कहना चाहता हूं, और जिस दर्द के साथ कहना चाहता हूं, उस दर्द को अगर आप समझ सकें तो मेरी इस तकरीर
की उस तल्खी को पहचानिए ।(c) आ. शिवपूजन सहाय स्मारक न्यास
[काशी हिन्दू वि.वि. में आ.शिवपूजन सहाय न्यास द्वारा आयोजित
४४ वीं पुण्यतिथि (२१ जनवरी, २००७) के अवसर पर ‘आ. शिवपूजन सहाय स्मारक व्याख्यान शृंखला’
में डा. नामवर सिंह का भाषण। यह भाषण ‘शिवपूजन सहाय का कथा-साहित्य’ पुस्तक (२०२२,
सं. मंगलमूर्त्ति,सजिल्द ९९५/-) में भी प्रकाशित हुआ जिसमें ‘परिप्रेक्ष्य’, ‘उपन्यास:
देहाती दुनिया’ ओर ‘कहानिया’ अध्यायों के अंतर्गत ३० उत्कृष्ट समीक्षात्मक निबंध प्रकाशित
हैं। पुस्तक ‘वैल्यू पब्लिकेशन्स, नई दिल्ली से मो. 9868035385 पर फोन करके इस पोस्ट
के उल्लेख के साथ विशेष छूट पर प्राप्त की जा सकती है.]
