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Saturday, October 24, 2026

 

शमशाद की याद

मंगलमूर्त्ति

एक :

मेरे पास शमशाद की कुछ तस्वीरें रह गई हैं, और उसकी आवाज के हुछ टेप, और उन्हीं से लिपटी बहुत सारी यादें। आज मैं उन्हीं तस्वीरों के अल्बम के पन्ने उलट रहा हूँ, और खूबसूरत अल्फ़ाज़  पर मचलती वही प्यारी-प्यारी सी आवाज गूंज रही है मेरे कानों में, मानो कह रही हो मौत से कि जो तू छीन ले गई वह तो कुछ भी नहीं था, जो रह गया वही तो सब कुछ है।

शमशाद का जीवन एक अधूरा गीत था जिसके दर्द और
मिठास का पैमाना भी उ
सका अधूरापन ही था। कीट्स के हाइपीरियन की तरह वह एक खंडित महाकाव्य था जिसके अधूरेपन में ही गीतकाव्य की पूर्णता के दर्शन होते हैं ।

जब कोई शायर कलियों के चिटखते-चिटखते ही मौत की गर्म आंधी में मुरझा जाता है, तो कीट्स और शेली की तरह ही वह खुद एक दर्दीला नगमा बन कर रह जाता है। उसकी मौत ही मानों उसकी शायरी को अमर बना देती है, उसकी पोर-पोर में एक कभी नहीं मिटने वाला दर्द समो देती है। फिर जब भी हम उसकी शायरी से रूबरू होते हैं, हर बार उसकी मौत का दर्द उसी के शब्दों की शक्ल में हमको घेरता और रूलाता है।

पुकार लें न कहीं भरी घूप में घनी शाखें

बस एक खौफ यही दोस्तों सफर में था

उभरते-डूबते रिश्तों की घनी छांवों में

एक अजनबी की तरह मैं भी अपने घर में था।

 

हर शायर अपनों से घिरा एक अजनबी होता है, जिसे अक्सर जिंदगी के शोर-शराबे-भरे मेले से मौत बहलाकर ले जाती है। शमशाद भी जिंदगी के उभरते-डूबते रिश्तों में उलझा एक ऐसा ही अजनवी शायर था, मौत जिसका हाथ थामे अपना बना कर ले गई ।

साल का एक वरक़ हटाता हूँ। शमशाद के लिए खून की जरूरत है। अस्पताल से डॉक्टर का एक पुर्जा कल शाम ही मिला था - ग्रुप ‘ए’ का ६०० सी.सी. खून चाहिए। आज ही दिन में एन० एस० एस० के लड़के फिर खून देने जाने वाले हैं। डॉक्टर ने मुझको पहले ही बता दिया है, अब सिर्फ वक्त की बात है; फिर भी खून देने वालों की कतार तैयार है। तभी उनका छोटा भाई रूमी अहले सुबह मेरे यहाँ आता है - मैं समझता हूँ, तुरत खून देना है शायद । लेकिन वह मेरे सामने चुप खड़ा है। बड़ी मुश्किल से कह पाता है - अभी-अभी सुबह भैया चले गये, छह बज कर पाँच में सांस टूट गई।

शमशाद को लोग घर ले आये हैं। उसका अदना-सा जिस्म एक खटोले पर लिटाया गया है। बाहर वाली उस दालान में जिसको बड़े शौक से वही बनवा रहा था। लोग खामोश घेरे खड़े हैं। खामोशी में  डूबी दालान भी शायद पूछना चाहती है, अपनी शायरी की ही तरह मुझे भी अधूरी ही छोड़े जा रहे हो? छत से मेरी निगाह धीरे-धीरे उतर कर उस ज़र्द चेहरे पर टिक जाती है -

उभरते-डूबते रिश्तों की घनी छावों में

एक अजनबी की तरह मैं भी अपने घर में था।….

 

मैं झुक कर गुलाब की वह कली जो आज ही सुबह मेरे यहाँ खिली थी, उस अजनबी चेहरे के पास आहिस्ता रख देता हूँ।

कब्रगाह में मैं कुछ देर से पहुंचा हूँ । मस्जिद और कसाईखाने के बीच वीराने में शमशाद को दफनाया जा चुका है। जंगली घास-पौधों के बीच थोड़ी-सी जगह साफ की गई है, जहाँ अब कब्र के ऊपर मिट्टी का एक छोटा-सा टीला-सा बना दिया गया है, जिसे फावड़े से संवार कर एक साफ-सुथरी शक्ल दे दी गयी है। बहुत सारी अगरबत्तियाँ और ढेर सारे फूल सजे हैं मिट्टी के उस टीले पर, जिसके नीचे शमशाद को हमेशा के लिए सुला दिया गया है। लोग अब धीरे-धीरे लौट रहे हैं। आलोकधन्वा लेकिन सर झुकाए वहीं खड़े हैं। मैं भी फूल चढ़ाकर सर झुका लेता हूँ। शेली ने कीट्स की मौत पर जो अमर शोकगीत लिखा है - एडोनेस, उसकी भूमिका में वह कहता है – ‘जूही, चमेली और गुलबनफ्‌शा से भरे-सजे इस कब्रगाह को - जहाँ कीट्स को दफनाया गया है- देखकर तो मुझे भी मौत से प्यार हो गया ।

शमशाद ने हमेशा ही मौत से प्यार का रिश्ता निबाहा। यही प्यार उसकी शायरी को भी एक दुल्हन की तरह संवार गया। मौत से हमेशा उसने हंस-हंसकर बातें कीं, उसे गले से लगाये रहा। और हंसी- हंसी में ही उसने मौत का दिल जीत लिया, और उससे अपनी शायरी के लिए अमरता का वरदान पा लिया। इस दिल्लगी में शमशाद ही जीता और मौत की हार हुई ।

यादों के अलबम के कई पन्ने और उलटता हूँ। हवेली खड़गपुर के वनवर्षा गाँव में हमने एन० एस० एस० का शिविर लगाया है। पिछले साल भी हमने यहीं शिविर लगाया था। इस बार फिर शमशाद हमारे साथ हैं। हरिजन टोला वाली कच्ची सड़क की मरम्मत की जा रही है, और बच्चों के स्कूल के अधूरे कमरे को पूरा किया जा रहा है। स्वयंसेवकों में काफी उत्साह है।

काम के बीच में विश्राम के क्षण आते हैं, और कभी सड़क पर ही और कभी स्कूल के पास लड़के मुझको, शमशाद को घेर कर बैठ जाते हैं, और गीत-संगीत, लतीफों और चुहल में हम सब कुछ भूल जाते हैं। फिर काम शुरू हो जाता है; मैं भी उसमें मशगूल हो जाता हूँ। और पता नहीं कब शमशाद वहाँ से झील की ओर बढ़ गये, अकेले, धीरे-धीरे, लंगड़ाते, क्योंकि उनके बायें पाँव में एक जख्म हो गया है, जो भरना नहीं चाहता, मधुमेह के कारण। काम से हम शिविर को लौट रहे हैं, तब रास्ते में उनको किसी मेड़ पर लेटा पाते हैं, और वे फिर धीरे-धीरे लंगड़ाते हुए हमारे साथ हो लेते हैं।

शाम में सकुचाते हुए मुझसे बताते हैं कि उन्होंने वह गीत पूरा कर लिया है, जो उन्होंने एन० एस० एस० के जवानों के लिए खास तौर से लिखा है। दोपहर भर राजकुमार के साथ उसकी धुन बनाने में वे लगे रहे हैं, और संध्या के सांस्कृतिक कार्यक्रम में राजकुमार वह गीत पेश करते हैं-

 

कदम-कदम पे साथियो चिराग सौ जलायेंगे

नये सफर के वास्ते डगर नयी बनायेंगे

तरस रही हैं लालियों को गाँव की हथेलियाँ

लहू जिगर का दे के उनमें मेंहदियाँ रचायेंगे

खिला चुके कलम से खूब अक्षरों के फूल हम

जमीं की अब पुकार पर कुदाल भी उठायेंगे

चलेंगी सज के गांव में ये शहर की जवानियाँ

हलों के साज पर हसीन गीत हम भी गायेंगे

सितम की आँधियां हजार जाल फेंकती रहें

दिशा-दिशा में फिर भी एक इन्कलाब लायेंगे

 

अपने जिगर का लहू देकर सचमुच शमशाद ने इस कूचगीत में भावों की मेंहदी रचाई है, और उस शिविर के बाद से तो हमेशा-हमेशा यह गीत हमारे होठों पर लरजता रहा है। मुझको याद है उसके बाद शमशाद अक्सर बीमार-ही-बीमार रहे, और अगले शिविर में जब वे गंभीर रूप से मुंगेर के अस्पताल में बीमार थे, तो कॉलेज-प्रांगण में लगे शिविर से एक सौ शिविरार्थी लड़कों की कतारें सुबह-सुबह पूरे शहर के मुख्य मार्गों से अपने प्यारे शायर टीचर प्रो० शमशाद साहब का यही गीत गाते-गाते उनके अस्पताल के कमरे में उनके बेड तक चली गई थीं, और शमशाद ने भाव-विह्वल होकर लड़कों को कलेजे से लगा लिया था ।

यादों के अलबम में तस्वीरों की लम्बी कतारें सजी हैं। आँखें उनमें खो जाती हैं, और भर-भर आती हैं। बारिश हो रही है। रात के नौ बजे हैं - २१ अगस्त, १९८२; शमशाद को गये अभी तीन ही दिन बीते हैं। बारिश और जोर से होने लगी है। रोशनी देर से गायब है । लेकिन अंधेरे में काले आसमान में बिजली अक्सर चमक उठती है, जोरों से कड़क उठती है, जैसे धरती का कलेजा चाक हो रहा हो । और मैं रोशनी की वही लकीर पकड़कर पहुंच गया हूँ कसाईखाने और मस्जिद के बीच के उस वीराने में, जहाँ जंगली घास-पौधों के बीच मिट्टी के भारी ढेर के नीचे दबा पड़ा है हमारा अजीज शायर और साथी शमशाद । मैं देख रहा हूँ बिजली की ये लपलपाती तलवारें बार-बार चूम रही हैं उसकी कब्र को, सलाम पेश कर रही हैं उसे । और मैं उस अंधेरी रात में हाथ बाँधे वहीं कहीं उस कब्र के पास खड़ा हूँ । बारिश का पानी धरती में रिस-रिस कर उसको नहला रहा है। कीड़े-मकोड़े उसके इर्द-गिर्द चक्कर लगाने लगे हैं, उसके रेशे-रेशे को खाक में बदल देना चाहते हैं ।

बारिश अब खुद-ब-खुद थम गई है। ....

 

दो :

वह एक छोटा–सा शहर था जहां पूरे शहर के लिए सिर्फ एक पानी टंकी थी । लेकिन छोटा भले ही हो, उस शहर में इतिहास के कई खंडहर थे, और गनीमत थी शहर के किनारे एक दरिया भी था जिसकी मछलियां बहुत मीठी होती थीं। शहर में एक घंटाघर था और एक पुराने किले की ढही दीवारें और नेस्तनाबूद कई बुर्ज़ भी थे । किले के एक सिरे पर एक दरगाह थी जिसको सदियों पहले शायद किसी मुगल बादशाह ने बनवाया था । वहां चारों ओर एक पवित्र सुगंध फैली होती थी जिसमें कस्तूरी जैसी एक अजीब खुशबू का अहसास होता था जो लोगों को अक्सर मज़ार की सीढ़ियां चढ़ने को मजबूर कर देती थी । किले के दूसरे सिरे पर, दरिया किनारे, एक यूरोपियन सेमेटरी थी जिसमें उस इलाके में हुई किसी लड़ाई में मारे गए योद्धाओं के दर्जनों कब्र थे जिनमें कई के माथे के सलीब टूट चुके थे, और जिन पर अब कोई चिराग जलाने या फूल चढ़ाने नहीं आता था ।

एक ऐसा ही यूरोपियन कब्रगाह शहर की दक्खिनी सीमा पर भी था जिसमें संगमरमरों वाले कई खूबसूरत कब्र थे, जिनमें एक, जैसा उसके संगमरमर पर बड़े–बड़े हर्फ़ों में लिखा था, उस अंगरेज का भी था जिसने वह घंटाघर उस शहर के लिए एक तोहफे के तौर पर बनवाया था। यह एक इत्तेफ़ाक ही था कि वह उस शहर में एक लंबे अर्से तक रह गया । उसने कई बार उस शहर से बाहर किसी बड़े शहर में जाकर रहने का मन बनाया । कई ऐसे मौके खुद–ब–खुद आए भी, लेकिन जैसे उस छोटे–से शहर ने उसका दामन थाम लिया हो कि कहां जाओगे, यहीं रहो न ?  और इसीलिए वह कहीं और नहीं जा सका, वहीं रह गया ।

वह अक्सर टहलता हुआ उस ढहे दीवारों वाले किले की ओर निकल जाता, और कभी–कभी उन कब्रगाहों में भी मन बहलाने चला जाता जिनमें उस छोटे–से शहर का अतीत दफ़न था । वह एक–एक कब्र पर रुक कर उसकी इबारत को पूरा पढ़ता और उन कब्रों के इर्द–गिर्द चक्कर लगाते हुए जैसे वह अपने अतीत के खंडहरों में पहुंच जाता जहां नागफनी के उंचे–उंचे मनहूस दरख़्त बाहें फैलाए चुपचाप खड़े दिखाई देते । जैसे वे कुछ कहना नहीं, बल्कि उसकी अपनी कहानी उससे सुनना चाहते हों, बस ।

वह अक्सर दरिया के किनारे भी जाता और वहां देर तक बैठा करता जहां दरिया का बहाव अचानक मुड़कर दूसरी ओर दूर तक जाता दिखाई देता था, और उस मोड़ पर जहां वह अक्सर जाकर बैठता, पानी की धारा गोल–गोल बड़ी–बड़ी भवरें बनाती तेजी से आगे बढ़ती–बहती दिखाई देती, जिन्हें वह देर–देर तक बुत की तरह बैठा देखा करता । दरिया का बहाव जिधर से आता और मोड़ से आगे दूसरी ओर जिधर को जाता – दोनों ओर उसके चौड़े पाट बिलकुल सपाट और स्थिर दिखाई देते, खलबली सारी बस वहीं दिखाई देती जहां आकर दरिया अचानक मुड़ गया था, और जहां जाने के बाद जैसे वक्त के बीतने का अहसास ही गुम हो जाता । वहां के क्षितिज में ऐसा विस्तार था जैसा उसने और कहीं नहीं देखा था, और जब सूरज डूबने को होता, तब तो उस फैले हुए क्षितिज पर ऐसी सतरंगी आभा छा जाती जो हर लमहा बदलती हुई देखने वाले की आंखों को जैसे एकटक अपने में बांध लेती, और तब लगता उस सपाट, खामोश  दरिया के फैलाव पर भी वह सतरंगी, पल–पल अपना रूप बदलती आभा दरिया के साथ गलबहिंयां में मिलकर एक हो गई हो । शहर की एक छोर पर एक ब्रांच लाइन का रेलवे स्टेशन था जिसके पास वाले मुहल्ले में ही वह रहता था । वहां से शहर के बाजार की ओर जाने के लिए रेलवे वाली गुमटी को पार करना पड़ता था । बाजार की ओर बढ़ने पर थोड़ी ही दूर पर एक मस्जिद थी जो शहर की तीन मस्ज्दिों में सबसे बड़ी थी और जुमें की नमाज में वहां अच्छी–खासी भीड़ जमा होती थी । मस्जिद के ठीक पीछे एक बूचड़खाना था जिसकी बगल से होकर एक कच्चा रास्ता मुसलमानों के मुहल्ले को जाता था । वह अक्सर उस मुहल्ले में जाता था, जहां उसके कई दोस्त रहते थे । मुहल्ले का नाम भी किसी मुसलमान जागीरदार के नाम पर था जिसकी कब्र उसी मुहल्ले के किसी गुमनाम कोने में खस्ताहाल पड़ी थी, जिसके बारे में कोई कुछ बता नहीं पाता था ।

उस मुहल्ले के ज्यादातर लोग मुझे जानते थे, हालांकि वहां की बहुत सारी संकरी, घुमावदार गलियों से मैं नावाक़िफ़ ही रह गया, केवल उस एक गली को छोड़कर जहां मेरा शागिर्द वह नौजवान शायर रहता था । उस गली का मुहाना बाज़ार की मुख्य सड़क पर निकलता था और इसका पिछला सिरा मेरे रोज़ के आने–जाने वाले रास्ते से जुड़ा था । लेकिन अब लगता है शायद दो ही बार मैं उस गली से गुजरा था – एक बार जब ईद की सेवंई खाने के लिए मेरे शागिर्द ने अपने घर पर मुझे बुलाया था, और दूसरी बार, वही आख़िरी बार, जब मैं उसके सिरहाने एक गुलाब का फूल रखने कुछ देर से वहां पहुंचा था, जहां गुमसुम सर झुकाए आठ–दस लोग उसके बिस्तर के चारों ओर खड़े थे । बाहर के छोटे से आयताकार बरामदे में ही उसकी खाट रखी गई थी जिस पर वह उसी धारीदार कमीज और पाजामे में लेटा था जो उसका रोज का पहनावा था । उसकी आंखें बंद थीं और होंठ नीले लग रहे थे । बाल उसके संवार दिये गये थे और सोच में डूबे उसके चेहरे को देखकर लगता था वह अपनी ही किसी बेरहम ग़ज़ल का मतला हो ।

उस शायर ने अपना एक उपनाम भी रखा था, लेकिन उसको जानने वाले सब उसको उसके नाम से ही बुलाते थे । उसकी नज़्मों में वह नाम सबसे निचली सीढ़ी पर गुमसुम बैठा मिलता था जिस पर सुबह की धूप धीरे-धीरे सीढ़ी–दर–सीढ़ी चढ़ रही होती थी ।

उसके ज्यादातर दोस्त हिंदू थे, और शहर में उर्दू की अदबी जमात से उसका लगाव नहीं के बराबर ही था । वह अपनी नज़्मों को कभी–कभार शहर की काव्य–गोष्ठियों में ही पढ़ता था, दोस्तों की बहुत ज़िद पर ।आज भी ऐसा ही लग रहा था कि वह अपनी नज़्म पढ़ने से बचने के लिए बहाना बनाकर लेट गया है । मेरी आंखें उसी के चेहरे पर जैसे एकटक थम गई थीं, जैसै कुछ भूल कर वहीं बैठ गई हों किसी याद में खोई–खोई । या शायद मैं ही कहीं और भटक गया था किसी दूसरी गली में, या कहीं किसी झील के किनारे किसी खेत की मेंड़ पर जा पहुंचा था भटकते–भटकते । अचरज यह देखकर हो रहा था कि वहां भी वह उसी तरह लेटा–लेटा किसी सोच में डूबा है । उसके होंठ कुछ बुदबुदा रहे हैं । और दूर से एक गीत सुनाई दे रहा है । मेरी आंखें ने अब जैसे अपना काम मेरे कानों के जिम्मे लगा दिया हो । गीत के स्वर अब साफ सुनाई देने लगे थे –

       कदम कदम पे’ साथियों चिराग सौ जलाएंगे

       नए सफ़र के वास्ते डगर नई बनायेंगे...

क्षितिज की ओर जाते गीत के उन्हीं सुरों में खोया मैं वहीं बैठ रहा।

[शमशाद ‘सहर’ इसी तखल्लुस से शायरी करते थे – १९७०-’७२ में मुंगेर में मेरे छात्र रहे, और फिर शायद १९७६ तक कॉलेज में मेरे सहकर्मी भी हो गए। एक मध्यवित परिवार में मुंगेर के दिलावरपुर मुहल्ले की एक गुमनाम गली में रहते थे। लेकिन मेरे करीबी बन गए – क्योंकि हमारी साहित्यिक अभिरुचियाँ मिलती थीं। मैं १९७६ में कॉलेज एन.एस.एस. का प्रभारी बनाया गया तो मेरे साथ मेरे हर शिविर में शामिल रहते थे। मेरे शिविरों में साहित्य ओर संगीत का विशेष माहौल रहता था। हिन्दी विभाग के रामनाथ ‘मिलिंद’ भी मेरे स्थायी सहचर थे। राजमणि राय ‘मणि’ (जिला सूचना प्रभारी) भी सुकंठ कवि थे। और भी लोग मेरे शिविरों में जाया करते थे। छात्रों में भी संगीत-प्रेमी-छात्रों का दल जरूर साथ रहता था। हर संध्या में सांस्कृतिक कार्यक्रम मेरे शिविरों के विशेष आकर्षण थे, जो छात्रों को बहुत भाते थे। शमशाद शायर-मिजाज अपने सेहत पर बहुत ध्यान नहीं देते थे और मधुमेह-ग्रस्त हो गए थे, जिससे आगे चलकर और समस्याएं बढ़ती गईं। मेरे पहले दोनों शिविरों में वे मेरे साथ गए। वहीं दूसरे शिविर में उन्होंने हमारा प्रबोधन-गीत लिखा। लेकिन १९८० के बाद उनकी बीमारी बढ़ने लगी। १९८२ में वे अचानक चले गए। उन्हीं की  याद में मैंने १९८३ में और उसके कई साल बाद जो लिखा उसे अब सामने कर देना चाहता हूँ। शमशाद बहुत जल्दी चले गए इसलिए उनकी नज़्म किसी किताब की शक्ल में शाया न हो सकी। यहाँ केवल उनकी याद दुहराई जा सकी है। - मंगलमूर्त्ति]

 

Thursday, October 8, 2026

 



जयंती:१४६

प्रेमचंद–स्मरण            

आज प्रेमचंद की १४६ वीं जयंती है। विश्व-साहित्य में भारतीय लेखकों में प्रेमचंद सबसे अधिक प्रतिष्ठित हैं। उनके उपन्यासों-कहानियों का विश्व की सभी प्रमुख भाषाओं में सबसे अधिक अनुवाद हुआ है। शिवपूजन सहाय के संस्मरणों में उनके जीवन की मनमोहक छवि देखी जा सकती है। प्रेमचंद के जीवन के अंतिम १६ वर्षों में शिवपूजन सहाय का उनके साथ अत्यंत अंतरंग साहित्यिक संपर्क रहा – विशेषकर बनारस में (१९२६ से १९३३तक) और कुछ दिन (१९२४ में) लखनऊ में जहां रहते हुए शिवपूजन सहाय ने ‘रंगभूमि’ का सम्पादन किया।

आज इस जयंती-दिवस पर उन बातों का पुनरस्मरण सुखद है। प्रस्तुत है उसी प्रसंग में मेरा यह आलेख जो मेरी पुस्तक ‘दर्पण में वे दिन’ में भी पढ़ा जा सकता है।   

  

‘रंगभूमि’ की पांडुलिपि

प्रेमचंद के उपन्यास–साहित्य में ‘रंगभूमि’ का विशिष्ट स्थान है । आकार, लोक प्रियता, विवादास्पदता, तत्कालीन समसामयिक परिस्थितियों से कथानक की संघटना एवं चरित्रों की संबद्धता - इन दृष्टि बिंदुओं से ‘रंगभूमि’ की विशिष्टता स्पष्ट है । किंतु, एक अन्य महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि यही प्रेमचंद का पहला उपन्यास था, जिसकी ‘‘पूरी पांडुलिपि उन्होंने पहले–पहल देवनागरी लिपि में ही अपनी ही लेखनी से तैयार की थी । प्रेमचंदजी ने अपना बड़ा पोथा पहले–पहल नागराक्षर में लिखा था, उसका ऐतिहासिक महत्व था ।’’ आचार्य शिवपूजन सहाय ने अपने संस्मरण (शिवपूजन–रचनावली - ४) में ‘रंगभूमि–प्रसंग’ में लिखा है:

मैं ‘माधुरी’ और गंगा पुस्तकमाला के संपादन–विभाग में काम करता था । कुछ दिनों बाद वे (प्रेमचंद) भी माधुरी के संपादक होकर आए । उसी समय उनका ‘रंगभूमि’ नामक बड़ा उपन्यास वहां छपने के लिए आया था । श्रीदुलारेलालजी भार्गव ने गंगा–पुस्तकमाला के नियमानुसार उसकी प्रेसकॉपी तैयार करने के लिए मुझे सौंपी ।–––––वह नागरी–लिपि में लिखा पहला उपन्यास दर्शनीय था । शायद ही कहीं लिखावट की भूल हो, तो हो । भाषा तो उनसे कोई बरसों सीखे । लेखनी का वेग ऐसा कि संयोगवश ही कहीं कट–कुट मिले । कथावस्तु की रोचकता लिपि–सुधार में बाधा देती थी । घटनाक्रम में पड़ जाने पर संपादन शैली के निर्धारित नियम भूल जाते थे । ध्यान से भाषा पढ़ने के कारण कितने ही सुंदर प्रयोग सीखने का सुअवसर मिला ।–––––मैंने सुना था कि वे पहले उर्दू में कहानी या उपन्यास लिख जाते हैं, फिर किसी हिंदी के जानकार से नागराक्षरों में लिखवाते हैं । पर जब ‘रंगभूमि’ की कॉपी मिली, मेरे आश्चर्य और आनंद का ठिकाना न रहा । सारी कॉपी प्रेमचंदजी की ही लिखी हुई थी । दो मोटी जिल्दो ंमें खास एक बड़ा पोथा, छोटे–छोटे अक्षर, घनी लिखावट, कहीं कांट–छांट नहीं, मानों पूरी पुस्तक एक सांस में लिखी गई हो ।–––––वह पांडुलिपि (प्रेसकॉपी) यदि आज कहीं सुरक्षित होती!!

‘रंगभूमि’ (सन १९२५ ई–) से पहले प्रेमचंद ने अपने सभी उपन्यास उर्दू–लिपि में लिखे और उनका नागरी–लिप्यन्तरण दूसरे से करवाया । पहले के उपन्यासों में ‘प्रेमा’ (सन् १९०८ ई–), ‘सेवासदन’ (सन् १९१८ ई–), ‘वरदान’ (सन् १९२० ई–) और प्रेमाश्रन’ (सन् १९२२ ई–) सब पहले उर्दू में लिखे गए, फिर नागरी में लिप्यन्तरित हुए । ‘प्रेमा’ और ‘वरदान’ पहले उर्दू में ही छपे भी, हिंदी–संस्करण बाद में प्रकाशित हुए । ‘सेवासदन’ और ‘प्रेमाश्रम’ पहले उर्दू में लिखे गए, लेकिन उनके हिंदी–संस्करण ही पहले प्रकाशित हुए । ‘रंगभूमि’ से पहले के इन उपन्यासों की हिंदी–पांडुलिपियां प्रेमचंद ने स्वयं नहीं तैयार की थीं।  पहले–पहल अप्रैल–अगस्त सन् १९२४ ई– के बीच प्रेमचंद ने ‘रंगभूमि’ की पांडुलिपि, काशी में रहते हुए, स्वाक्षर में, नागरी–लिपि मे, तैयार की । अमृतराय के अनुसार, पे्रमचंद ने ‘रंगभूमि’ के उर्दू–मसविदे (‘चौगाने हस्ती’) को सन् १९२२ ई– के १ अक्टूबर को लिखना शुरू किया, जो सन् १९२४ ई– के १ अप्रैल को पूरा हो गया ।

‘चैगाने हस्ती’ का हिंदी–रूपांतर भी साथ–साथ होता रहा और करीब चार महीने में, सन् १९२४ ई– के १२ अगस्त को ‘रंगभूमि’ की (हिंदी) पांडुलिपि तैयार हुई । (काशी में) प्रेस की हालत बदस्तूर खराब चल रही थी–––––मुंशीजी अगले ही महीने (सितंबर में) सौ रूपए मासिक पर लखनऊ पहुंच गए और दुलारेलाल के साथ ही ३२ लाटूश रोडवाले मकान पर ठहरे । ‘रंगभूमि’ की छपाई भी शुरू हो गई ।

‘रंगभूमि’ की संशोधित हिंदी–पांडुलिपि एवं उसके प्रकाशन के संदर्भ से कई अनुत्तरित प्रश्न जुड़े हुए हैं, जिनकी अपनी एक लंबी रहस्यकथा है । ‘रंगभूमि’ की वह संशोधित पांडुलिपि (‘दो मोटी जिल्दों में खासा एक बड़ा पोथा’) कहां है, अथवा लुप्त हो गई? आचार्य शिवपूजनसहाय का भाषा–संशोधन वास्तव में कैसा था? गंगा–पुस्तक माला के वे भाषा–संशोधन नियम क्या थे ? उनका नियामक कौन था? फिर, ‘रंगभूमि’ का प्रकाशन जनवरी (सन् १९२५ ई–) के प्रारंभ में हुआ था अथवा फरवरी के प्रारंभ में? इस पूरे संदर्भ से मुख्यत: तीन व्यक्ति जुडे़ हैं - प्रेमचंद, दुलारेलाल और शिवपूजन सहाय । पृष्ठभूमि में हैं पं– कृष्णबिहारी मिश्र, जो ‘माधुरी’ के संपादक–मंडल के सदस्य थे । प्रेमचंद के पत्र एवं शिवपूजन सहाय लिखित संस्मरण प्रकाशित हैं, जिनसे अनेक प्रामाणिक सूचनाएं मिलती हैं, जो अत्यधिक महत्वपूर्ण है । लेकिन, शिवपूजन सहाय को लिखे, दुलारेलाल तथा कृष्णबिहारी मिश्र के, अद्यावधि सर्वथा अप्रकाशित, पत्रों द्वारा इस पूरे प्रसंग पर नया प्रकाश पड़ता है ।

शिवपूजन सहाय, ‘मतवाला’ मंडल छोड़कर, दुलारेलाल के आग्रह पर, अप्रैल, १९२४ ई– में कलकत्ता से लखनऊ आ गए थे । ३० अप्रैल (सन् १९२४ ई–)से वे लखनऊ के अमीनाबाद पार्क के पास ‘रॉयल हिंदू होटल’ में एक कमरा लेकर रहते थे । उनके साथ गंगा–पुस्तकमाला एवं ‘माधुरी’–कार्यालय के कुछ अन्य साहित्यिक व्यक्ति भी रहते थे । ‘माधुरी’ से उन्हें पचासी रूपए तनख्वाह मिलती थी । ‘माधुरी’ या गंगा–पुस्तकमालाल का संपादन–विभाग इसके कुछ ही दिनों बाद अमीनाबाद पार्क से उठकर लाटूश रोड पर आ गया था । यही वे दिन थे, जब प्रेमचंद ‘रंगभूमि’ की हिंदी–पांडुलिपि तैयार करने में लगे थे । काशी में अपने ‘सरस्वती प्रेस’ की परेशानियों से प्रेमचंद बहुत ऊब चुके थे । गंगा–पुस्तक–माला के दुलारेलाल उनकी ‘रंगभूमि’ प्रकाशित करना चाहते थे । पत्राचार चल रहा था । (यद्यपि दुर्भाग्यवश वे पत्र प्रेमचंद ने सुरक्षित नहीं रखे एवं प्रेमचंद ने दुलारेलाल को जो पत्र लिखे, वे भी प्रकाशित नहीं हैं) । प्रेमचंद ने मुंशी दयानरायन निगम को प्रेस की अपनी परेशानियों का हवाला देते हुए सन् १९२४ ई– की ८ जुलाई को लिखा था -

भाईसाहब अब अपने रूपए की वापसी पर मुसिर (आग्रहशील) हो रहे हैं । टालमटोल कर रहा हूं । इसलिए––––––अभी भी मैं मौजूदा रकम का इरसाल (रवाना) नहीं कर सकूंगा । अक्टूबर तक मुझे काफी रुपए मिलने की मुस्तकिल उम्मीद है––––– रंगभूमि के रुपए अक्टूबर तक मिलेंगे । इस उम्मीद पर आपसे वादा कर रहा हूँ । आप मुझसे नाराज न हों ।

दुलारेलाल ने प्रेमचंद की ‘रंगभूमि’ के प्रकाशन की मद में कुल अठारह सौ रुपए दिए । साथ ही, उन्हें सौ रुपए माहवार पर अपने प्रकाशनागार में ‘लिटरेरी असिस्टेंट’ के पद पर लखनऊ बुला लिया । सितंबर, १९२४ ई– में प्रेमचंद सपरिवार लखनऊ आ गए । प्रेमचंद और शिवपूजन सहाय का परिचय तो कलकत्ता से ही था, परंतु लखनऊ प्रवास में, एक ही कार्यालय में साहित्यिक कार्यकलाप के बीच, यह परिचय शीघ्र आत्मीयता में परिणत हो गया ।(नीचे दिए लिंक पर पढे शिवपूजन सहाय का प्रेमचंद पर लिखा वह संस्मरण – अंग्रेजी में। )

सितंबर, १९२४ ई– में ही लखनऊ में दंगा हुआ और बड़ी कठिनाई से शिवपूजन सहाय अमीनाबाद के ‘रॉयल हिंदू होटल’ से अपने कुछ मित्रों के साथ जान बचाकर भाग सके । इसका पूरा विवरण शिवपूजन सहाय ने ‘मतवाला’ में प्रकाशित कराया था -

अधिकांश सज्जन अपना अपना असबाब अपने–अपने कमरे में छोड़कर जान लेकर भागे । मैं, पं. शांतिप्रिय द्विवेदी, श्रीमदभागवत प्रसाद और पं. भगवतीप्रसाद त्रिपाठी (जो लोग गंगा–पुस्तकालय कार्यालय में काम करते थे और होटल में मेरे साथ ही रहते थे) अपना–अपना असबाब संभालने लगे । ताबड़तोड़ जैसे–तैसे बांध–बूँध कर इकटठा किया । इतने में बाहर से अंतिम सूचना मिली । सब चीजें ज्यों–की–त्यों वहीं छोड़कर सब लोग होटल से बाहर निकल आए (बाद में पता चला) रॉयल हिंदू होटल का ताला टूट चुका है । और वह लुट गया होगा । सुनकर और मानसिक कष्ट हुआ क्योंकि मेरा सामान होटल में अस्तव्यस्त पड़ा हुआ था । औरों का सामान उतना बहुमूल्य नहीं था, जितना मेरा क्योंकि मेरे पास कई महत्वपूर्ण ग्रंथों की हस्तलिखित कापियां थीं । मेरे जीवन–भर का संग्रह किया हुआ साहित्यिक मसाला मेरी नोटबुकों–डायरियों में था, सब तहस–नहस हो गया होगा । (१६– ९– १९२४)

जुलाई–अगस्त, १९२४ ई. में ही प्रेमचंद ने संभवत: ‘रंगभूमि’ की हिंदी–पांडुलिपि दुलारेलाल को प्रकाशनार्थ सौंप दी थी, जिसे उन्होंने संशोधनार्थ आचार्य शिवपूजन सहाय के जिम्मे लगा दिया था । शिवपूजन सहाय को लिखे दुलारेलाल के अप्रकाशित पत्रों में पहले यह संदेह उभरता है कि ‘रॉयल हिंदू होटल’ में छूटे असबाब में ‘रंगभूमि’ की पांडुलिपि भी थी । किंतु बाद में इसका समाधान स्वयं इस बात से हो जाता है कि वह संशोधित पांडुलिपि जहां से भी मिली, दुलारेलाल को मिल गई, और २३ नवंबर, १९२४ ई– के पत्र में दुलारेलाल लिखते हैं -

“रंगभूमि के १५ फार्म मैंने पास कर दिए हैं ।’’ ७ दिसंबर के पत्र में - ‘‘उनकी आधी पुस्तक छप गई ।’’ फिर कुछ बाद, ५ फरवरी, १९२५ ई– के पत्र में - ‘‘रंगभूमि’ छप गई है । शीघ्र ही भेजी जाएगी ।’’ शिवपूजन सहाय को समर्पित ‘रंगभूमि की प्रति पर प्रेमचंद ने २२ फरवरी १९२५ ई.  की तिथि अंकित की है । इसी तिथि का लिखा प्रेमचंद का शिवपूजन सहाय के नाम पत्र ‘चिट्ठी–पत्री’ में प्रकाशित है -

लीजिए जिस पुस्तक पर आपने कई महीने दिमागरेज़ी की थी, वह आपका एहसान अदा करती हुई आपकी खिदमत में जाती है, और आपसे विनती करती है कि मुझे दो–चार घंटों के लिए एकांत का समय दीजिए, और तब आप मेरी निस्बत जो राय कायम करें, वह अपनी मनोहर भाषा में कह दीजिए ।

स्पष्टत: जनवरी, १९२५ ई. के अंत में ‘रंगभूमि’ का मुद्रणकार्य समाप्त हुआ था । फरवरी के प्रथम सप्ताह तक पुस्तक निश्चय ही प्रकाशित हो चुकी थी । सादी और रेशमी - दो तरह की जिल्दों में यह पुस्तक बांधी जा रही थी और फरवरी के अंत तक यह बाजार में पहुंच गई होगी । अत: रंगभूमि जनवरी नहीं, फरवरी, १९२५ ई.  के प्रारंभ में ही प्रकाशित हुई, ऐसा स्पष्ट है।

‘रंगभूमि’ की मूल हिंदी–पांडुलिपि तथा उसके संशोधन एवं प्रकाशन के संबंध में दुलारेलाल भार्गव और कृष्णबिहारी मिश्र के अप्रकाशित पत्रों के निम्नांकित उद्धरणों को ज्ञात सूचनाओं से मिलाकर ध्यान से पढ़ने पर कई रहस्यमय संकेत उभरते हैं, और कई अत्यधिक महत्वपूर्ण तथ्य उदघाटित होते हैं । (ये पत्र लखनऊ से शिवपूजन सहाय को उनके गांव तथा बाद में कलकत्ता के पते पर भेजे गए थे) ।

दुलारेलाल के पत्र

(२५–९–२४): ‘‘कृपया शीघ्र आइए । आपकी चीजें तालें में बंद हैं, शायद कुछ नष्ट नहीं हुआ है, घबराइए नहीं । मैं वहां गया था ।–––––बतलाया कि सब लोगों का सामान मौजूद है । कुछ नष्ट नहीं हुआ । द्विवेदीजी को अभी फिर भेजा था । वह आपकी सब चीजें सुरक्षित देख आए । ‘सिर्फ ‘रंगभूमि’ नहीं दिखलाई दी । शायद टंªक में हो या आप ले गए हों । ‘रंगभूमि’ को प्रेस में देना है, शीघ्र आइए ।’’

(३–१०–२४): ‘‘आपका कोई कुशलपत्र अभी तक न मिलने के कारण हम लोगों की चिंता और भी बढ़ती जाती है ।––––––इधर प्रेमचंद जी ने भी ‘रंगभूमि’ के लिए जल्दी मचा रखी है ।––––––आप ‘रंगभूमि’ को पत्र पहुंचने के साथ ही रजिस्ट्री से रवाना कर दें । इसमें जरा भी शिथिलता न करें । इधर छप जाएगी, तो जल्दी छप ही जाएगी, नहीं तो फिर वह नवंबर में पड़ जाएगी और हमको प्रेमचंद का तकाजा बराबर सहना पड़ेगा । (पुनश्च:) शायद ‘रंगभूमि’ आप यही छोड़ गए हैं । अतएव कृपा करके, दया करके फौरन आकर उसका काम शुरू करवा दीजिए ।’’

(११–१०–२४) % ‘‘(पुन: लिखा) काशी में आप ‘रंगभूमि’ कहां छोड़ आए हैं ? लिख दें, वह हमारे पास रजिस्ट्री करके भेज दें । (१३–१०–२४) शांतिप्रिय सूचित करता है कि ‘रंगभूमि’ को ‘काशी’ में मैंने शिवपूजन जी के पास देखा था । और आप लिखते हैं कि मेरे पास नहीं है, यह क्या मामला है ? कृपया सूचित कीजिए । ‘रंगभूमि’ को शीघ्र ही छापना है । क्या खो गई ? खो गई हो, तो दुबारा लिखाई जाए ? आप आखिर कब आ रहे हैं ?’’ (१८–१०–२४)।  आपका पत्र तो मिला पर मालूम नहीं, क्यों आपने इस पत्र में भी ‘रंगभूमि’ के संबंध में कुछ नहीं लिखा । प्रेमचंद जी अलग ही जल्दी मचाए हुए हैं, आशा है, आप अवश्य पत्र पहुंचते ही ‘रंगभूमि’ भेज देंगें ।’’

(२०–१०–२४) % कृपा करके यह भी लिखिए कि ‘रंगभूमि आपके पास है या कहीं वहीं बंद है क्या ? क्योंकि, यहां के आपके कागज–पत्रों में तो वह है नहीं । अबकी बार साफ–साफ लिखिए कि क्या बात है ? शांतिप्रिय ने तो लिखा था कि काशी में उसने उसे आपके पास देखा था । आखिरी दो कापियां तो हमारे पास हैं । पहली आपके पास थी । लेकिन शुरू की कॉपी होने के कारण उसके बिना काम नहीं हो सकता । कृपया सब बातें साफ–साफ लिखिए।

(२१–१०–२४): रंगभूमि आदि के बारे में कृपया होटलवालों को लिख दीजिए कि हमें दे दें । एक मकान ५० का ले लिया है । उसमें बहुत जगह हैं । आप वहां बखूबी रह सकेंगे । सब चीजें आपकी वहीं रख दी जाएगी । अब मैंने निश्चय किया है कि ‘रंगभूमि’ के दो फार्म रोज मैं ही छपवाऊंगा । आप उसे कृपया दिलवा दीजिए । जिस दिन मुझे ‘रंगभूमि’ मिलेगी, उसी दिन मैं प्रेमचंद को (तार) देकर बुलवाऊंगा ।

दुलारेलाल के तीन पोस्टकार्ड - २६, २७, २९ अक्टूबर १९२४ ई. के शिवपूजन सहाय को पहले के पत्रों की तरह गांव के पते पर ही भेजे गए थे, किंतु वहां से वे ‘रॉयल हिंदू होटल’ के पते पर पुननिर्देशित होकर लखनऊ पहुंचे । ऐसी स्पष्ट संभावना है कि अक्टूबर, १९२४ ई. के अंतिम सप्ताह में शिवपूजन सहाय फिर लखनऊ लौटकर गए और वहां उन्होंने ‘रंगभूमि’ की पांडुलिपि जहां से भी पाई, उसका बचा काम लखनऊ में रहकर पूरा किया । दुलारेलाल का ही लिखा एक स्थानीय पत्र (लखनऊ: २२–११–२४) है, जिसमें वे लिखते हैं - ‘‘आपके भाई जब अब भी सख्त बीमार हैं, तो आपको जाना ही होगा । आप आज ही चले जाइए । मैं आपको १५ रोज की वैतनिक छुट्टी देता हूं ।’’

लगभग एक महीने लखनऊ में रहकर शिवपूजन सहाय पुन: अपने गांव लौट गए और जनवरी, १९२५ ई.  तक वे फिर कलकत्ता वापस हो गए । ‘माधुरी–संपादक पं– कृष्णबिहारी मिश्र के इन दिनों के पत्रों में भी ‘रंगभूमि’ के प्रकाशन से संबद्ध कुछ महत्वपूर्ण सूचनाएं हैं-

(४–१२–२४): ‘‘यहां आपकी याद बराबर की जाती है । प्रेमचंदजी ठहरे हुए हैं । ‘रंगभूमि’ छप रही है । (१४–१२–२४) % यहां आपके आने की प्रतीक्षा प्रतिदिन की जा रही है । श्री प्रेमचंद जी यहां विराजमान हैंµसंभव है कि स्थायी रूप से भी रहेंµऔर ‘रंगभूमि’ आधे के लगभग छप गई है । मैं तो यही चाहूंगा कि आप लखनऊ में ही रहें । आपके साथ का गोष्ठी–सुख भुलाया नहीं जा सकता है । (१०–१–२५) %यह जानकर हर्ष हुआ है कि कलकत्ता में आपने जो नया काम अपनाया है, उसके करने में आप सुखी है, और वहां आपको हर प्रकार से लाभ है । आपके चले जाने का मुझे अवश्य ही खेद है, पर इस बात का संतोष है कि आप मजे में हैं । श्री प्रेमचंद जी यहां सपरिवार आ गए हैं और उसी मकान में ठहरे हैं, जिसमें आपसे रहने के लिए आग्रह किया जाता था ।’’

इन पत्रों में  ‘रंगभूमि’के प्रकाशन का संदर्भ विशेष आलोकित होता है । फिर भी, ‘रंगभूमि’ की पांडुलिपि के गड़बड़ होने तथा पुन: मिलने का प्रसंग पूरी तरह तो नहीं स्पष्ट होता, और  दुलारेलाल के पत्रों में कई प्रकार की अंतर्विरोधी बातें मिलती हैं । ‘रंगभूमि’ की पांडुलिपि यदि ‘रॉयल हिंदू होटल’ में छूटी थी, तो निश्चय ही किसी–न–किसी प्रकार वह दुलारेलाल को प्राप्त हो गई और तभी उसका मुद्रण संपन्न हो सका । यह प्रश्न फिर भी रहस्यमय बना रह जाता है कि ‘रॉयल हिंदू होटल’ में छूटी शिवपूजन सहाय की और सामग्री का क्या हुआ ? फिर, मुद्रण के बाद ‘रंगभूमि’ की प्रेसकॉपी दुलारेलाल के यहां से कहां चली गई ? ‘रंगभूमि’ की मूल पांडुलिपि में आचार्य शिवपूजन सहाय ने भाषा संशोधन किस सीमा तक किया था ? लेकिन, कदाचित ये प्रश्न अब सदा के लिए अनुत्तरित ही रह जाएंगे । (यहाँ यह जोड़ना आवश्यक है कि अक्टूबर, २०२४ की ‘माधुरी’ में छपी प्रेमचंद कि कहानी का भाषा-संशोधन भी शिवपूजन सहाय ने ही किया था, जिसपर नीचे के २०२२-२३ के मेरे लेखों में विशेष प्रकाश पड़ता है। और यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि दुलारेलाल ने ‘माधुरी’ के लिए वर्ततानी के कुछ नियम बनाए थे, और प्रसिद्ध लेखकों कि पांडुलिपियों पर वे संपादकीय संशोधन नहीं कराते थे, बल्कि अलग दुबारा संपादित लेखन में पांडुलिपि बनवाते थे जिससे यह पता नहीं चल सके कि वास्तव में पांडुलिपि का संशोधन किसने किया है, क्योंकि प्रेसकॉपी बाद में नष्ट हो जाती थी।)

‘प्रेमचंद पत्रों में’

चिट्ठियों का भी एक ज़माना था जब लोग लम्बी–लम्बी चिट्ठियां लिखते थे । घरों में फोन तो तब इक्के–दुक्के ही होते थे । मुझे याद है ३७४, पटना के ‘हिमालय प्रेस’ में फोन का नंबर था, १९४६ में जब मैं १० साल का भी नहीं था । लखनऊ में १९२४ में दुलारेलाल के दफ्तर और घर में फोन था । दफ्तर के फोन का नंबर ३०६ था । इसका ज़िक्र भी एक चिट्ठी में ही है जो दुलारेलाल ने मेरे पिता को लिखी थी । लोगों को फोन की आदत भी तब नहीं थी । पुर्जों और चिट्ठियों का ही चलन था उस ज़माने में । लोग खूब चिट्ठियां लिखते थे । आज तो डाकिया और लेटर बॉक्स शायद ही कहीं दीखते हैं ।

हिंदी में पत्रों के दो सबसे बड़े संग्राहक हुए - बनारसीदास चतुर्वेदी और शिवपूजन सहाय । चतुर्वेदीजी ने अपना विशाल पत्र संग्रह राष्ट्रीय अभिलेखागार में जमा कराया और शिवजी का संग्रह – मूलत: २०,०००से भी ज्यादा पत्र, जिनमे से खुद छांट कर लगभग १०, ००० पत्र वे गांव से पटना लाये और फिर उनमें से दुबारा छांटकर मैंने ७, ५०० पत्र नेहरू मेमोरियल लाइब्रेरी में जमा कराया । उसकी पूरी सूची भी हमने ‘साहित्य’ के ‘शिवपूजन स्मृति–अंक’ (जनवरी, १९६४) में प्रकाशित की थी । बाद में मेरे द्वारा संपादित ‘शिवपूजन सहाय साहित्य समग्र’ (१० खंड) में उनमें से चुन कर लगभग २, ००० पत्र ३ खण्डों में प्रकाशित हुए हैं, जिनमें शिवजी के भी लगभग २०० पत्र अंतिम खंड में हैं ।

‘समग्र’ के सम्पादन–क्रम में ही मैंने शिवजी के उस विशाल पत्र–संग्रह से चुन कर लगभग २०० पत्र ऐसे छांटे जिनमें प्रेमचंद के वे २५ पत्र तो थे ही, विभिन्न साहित्यकारों के १७५ ऐसे पत्र थे जिनमे या तो प्रेमचंद की स्पष्ट उपस्थिति थी, अथवा उनसे जुड़े प्रसंगों की चर्चा थी । इसका पहला संस्करण ‘प्रेमचंद पत्र–प्रसंग’ नाम से १९८५ में इलाहाबाद से छपा था, और बाद में २००६ में ‘प्रेमचंद पत्रों में’ नाम से २२५ पत्रों का फिर नया परिवर्द्धित संस्करण प्रकाशित हुआ । पुस्तक का लोकार्पण प्रेमचंद की १२५ वीं जयन्ती के अवसर पर विख्यात साहित्यकार श्रीअशोक वाजपेयी ने किया था ।

इन चिट्ठियों की कहानी कुछ ऐसे शुरू होती है । मेरे पिता ‘मतवाला’ छोड़ कर अप्रैल १९२४ में दुलारेलाल के ‘गंगा पुस्तक माला’ कार्यालय में लखनऊ आ गए थे, जहां से प्रेमचंद के सम्पादन में ‘माधुरी’ निकलती थी । उसी समय दुलारेलाल ने उन्हें प्रेमचंद की ‘रंगभूमि’ की पांडुलिपि सम्पादन के लिए दी थी । सितम्बर १९२४ में लखनऊ में दंगा हुआ । शिवजी उस समय अमीनाबाद में छेदीलाल धर्मशाला के पास रॉयल हिन्दू होटल में रहते थे । दंगे में वे लखनऊ से भाग कर गांव चले गए थे । लेकिन बंद कमरे में एक ट्रंक में उनकी ‘देहाती दुनिया’ की पाण्डुलिपि के साथ–साथ उनकी बहुत सारी महत्त्वपूर्ण साहित्यिक सामग्री –डायरियां, आदि - सब वहीं रह गर्इं । दंगा शांत होने के बाद दुलारेलाल बार–बार शिवजी को बुलावे का ख़त लिख रहे थे । ‘रंगभूमि’ की संशोधन वाली पांडुलिपि जल्दी में होटल में ही छूट गयी थी । बुलावे के ख़त इसीलिए लगातार भेजे जा रहे थे । एक ख़त में दुलारेलाल ने शिवजी को लिखा -  “भोला चाचा को आपने टेलीफोन से स्पष्ट क्यों नहीं बतला दिया–––उसी समय मोटर खाली नहीं था तो दूसरे दिन तो मिल सकता था–––” । उस संकट में उनके लिए फोन करना कितना कठिन था, जब कि उनकी जान पर बनी थी! बाद में शिवजी गांव से लखनऊ लौटे और ‘रंगभूमि’ की पांडुलिपि का सम्पादन पूरा हुआ, और वह फ़रवरी १९२५ में छप कर निकल गयी । दंगे का हाल शिवजी ने एक लम्बे पत्र में महादेव प्रसाद सेठ को लिखा जो ‘मतवाला’ में छपा । यह पूरा पत्र भी ‘प्रेमचंद पत्रों में’ में छपा है । उसी में ‘रंगभूमि’ के छपने की पूरी कहानी भी दुलारेलाल और प्रेमचंद के पत्रों में दर्ज है । प्रेमचंद की लिखावट में ही आप पुस्तक में उनके उस पत्र को पढ़ सकते हैं ।

 उन दिनों प्रेमचंद बनारस और लखनऊ में रह कर अपने उपन्यास लिख रहे थे । प्रेमचंद और शिवपूजन सहाय एक दूसरे के मित्र तभी बने थे, यों पहला परिचय १९२० के आस–पास कलकत्ते में ही हुआ था । शिवजी फिर कुछ दिन ‘मतवाला’ के सम्पादन– विभाग में निराला के साथ रह कर लखनऊ आ गए, और निराला भी कुछ दिन बाद वहीं चले आए । डॉ.  रामविलास शर्मा ने यह सारी कहानी निराला की जीवनी में लिखी है ।

वह पत्रों का ही ज़माना भी था । लेकिन पत्रों का महत्व तब सब लोग नहीं समझते थे । खुद प्रेमचंद ने एक भी पत्र संभाल कर नहीं रखा । दयानारायण निगम के नाम लिखी प्रेमचंद की अपनी चिट्ठियों को अमृत राय ने एक गतालखाने के गर्द–गुबार से हासिल किया । उन्होंने घूम–घूम कर लोगों के यहां से प्रेमचंद की चिट्ठियां खोज निकालीं थीं । शिवजी के पास भी आये और शिवजी के नाम लिखी प्रेमचंद की २५ चिट्ठियां लीं और ‘चिट्ठी–पत्री’ नाम से लगभग २०० चिट्ठियों को दो खण्डों में छापा । फिर भी ’समग्र’ में प्रेमचंद की कुछ चिट्ठियां ऐसी हैं जो ‘चिट्ठी–पत्री’ में नहीं छपी हैं ।

 ‘प्रेमचंद पत्रों में’ पुस्तक में १९२४ से १९३६ के बीच प्रेमचंद और शिवपूजन सहाय के समकालीन १४ साहित्यकारों के लिखे लगभग सवा दो सौ पत्र कालक्रम से प्रकाशित किये गए हैं जिनसे उन दिनों के साहित्यिक परिवेश का एक औपन्यासिक चित्र–सा उभरता है । एक के बाद एक अलग–अलग व्यक्तियों के पत्र कालक्रम में आगे बढ़ते हुए उन दिनों के साहित्य–जगत की एक मुकम्मल तस्वीर पेश करते हैं जिन सब में प्रत्यक्ष–परोक्ष प्रेमचंद की जीवन–झांकी तो दीखती ही है, और भी बहुत–सी आनुषंगिक सूचनाएं प्राप्त होती हैं । प्रेमचंद के ज़माने की पूरी तस्वीर दिखाई देती है, कालक्रम में छपे उन पत्रों में । प्रेमचंद और उनके समकालीनों के सब सरोकार दीखते हैं, और उनके परस्पर संबंधों की तस्वीरें दिखाई देती हैं ।

इस महत्त्वपूर्ण पुस्तक का लोकार्पण करते हुए श्रीअशोक वाजपेयी ने इस बात को रेखांकित भी किया था। उन्होंने कहा -

प्रेमचंद की १२५ वीं जयंती के अवसर पर यह एक अनूठी, महत्वपूर्ण पुस्तक प्रकाशित हुई है, जिसके लिए मंगलमूर्तिजी बधाई के पात्र हैं । इस पुस्तक का प्रकाशन सचमुच एक सुन्दर, सुविचारित शुरूआत है । इन पत्रों से प्रेमचंद के जीवन संघर्ष, उनके मित्रों के साथ परस्पर संबंधों पर एक दिलचस्प रोशनी पड़ती है । एक बहुत दिलचस्प दुनिया उभर कर हमारे सामने आती है । पुस्तक की विशेषता इसमें है कि इसको आप एक उपन्यास की तरह पढ़ सकते हैं । इसमें प्रेमचंद और उनके परिसर के लोगों का मटमैलापन भी सामने आता है - उनके बीच का सद्भाव, वैमनस्य, उनकी चिंताएं, इन सबका एक दिलचस्प वृत्त बनता है । यह वही वृत्त है जो प्रेमचंद के जीवन का बुनियादी संघर्ष थाµसाधारण की महिमा की प्रतिष्ठा, साधारण लोगों के जीवन का स्पंदन, आकांक्षाएं, हताशाएंµ जिनमे कितनी ज़िन्दगी छिपी होती है । और प्रेमचंद आज इसीलिए ज़िंदा हैं । उनका समय, समाजµसब बदल गया, फिर भी प्रेमचंद इन्हीं कारणों से आज भी जिंदा हैं, क्योंकि उन्होंने जिस मनुष्य को गढ़ा वह नहीं बदला है, वह आज भी उसी तरह जिंदा है, और उसी तरह अपने संघर्ष में लगा है । इस पुस्तक के पत्रों में वह पूरा युग साकार हो उठता है, और इसी लिए इस पुस्तक के प्रकाशन का इस अवसर पर विशेष महत्व है ।

इस पुस्तक में प्रेमचंद पर लिखा शिवजी का संस्मरण भी है जिससे पूरे प्रसंग की पृष्ठभूमि बन जाती है । हिंदी में साहित्यिक पत्रों के संकलन कम हैं । लेकिन ‘प्रेमचंद पत्रों में’ मात्र एक पत्र–संकलन न होकर प्रेमचंद और उनके युग पर जैसे एक दस्तावेजी इतिहास है । पुस्तक की भूमिका में साहित्यकारों के पत्रों में साहित्य की जो पार्श्वभूमि साहित्य–सृजन के साथ–साथ अंकित होती रहती है, जिसमें समकालीन साहित्य की जो अंतर्कथा उपलब्ध होती है उसकी विस्तार से चर्चा हुई है । शिवपूजन सहाय ने अपने साहित्यिक जीवन में न केवल १५–२० हज़ार प्राप्त साहित्यिक पत्रों को स्वयं संभाल कर रखा था, बल्कि उनके संग्रह और सुरक्षा के महत्त्व को अपनी कई सम्पादकीय टिप्पणियों में रेखांकित भी किया था ।

अंग्रेजी और योरोपीय भाषाओं में प्रमुख साहित्यकारों के पत्रों, उनकी पांडुलिपियों, यहां तक कि प्रूफ–शीटों तक को संग्रहालयों में सुरक्षित रखा जाता है, और उनको नीलामियों में हज़ारों–लाखों पौंड और डॉलर में खरीद कर लोग और संस्थाएं संरक्षित करती हैं, जिससे उनके यहां के साहित्यिक शोध में अधिकाधिक पूर्णता और प्रामाणिकता आती है । अमृत राय ने स्वयं प्रेमचंद के पत्रों की खोज–ढूंढ की अपनी कठिन कहानी ‘चिट्ठी–पत्री’ के दो खण्डों में लिखी है जो उन्होंने प्रेमचंद की मृत्यु के बमुश्किल २० साल बाद शुरू की थी । प्रेमचंद ने सैकड़ों साहित्यकारों को हज़ारों पत्र लिखे होंगे, पर ‘चिट्ठी–पत्री’ के दो खण्डों में दो–तीन सौ पत्र ही प्रकाशित हो सके हैं ।

विदेशों में पत्रों–पांडुलिपियों आदि के संरक्षण की चेतना बहुत विकसित रही है । वहां के अधिकांश विश्वविद्यालयों के पुस्तकालयों में साहित्यकारों से सम्बद्ध विविध प्रकार की साहित्यिक सामग्रीµपांडुलिपियां, प्रूफ–शीट, पत्र, चित्र, आदि पूर्णत: सुरक्षित रखे जाते है । फित्ज़राल्ड पेपर्स (प्रिंस्टन विश्वविद्यालय), फॉक्नेयर कलेक्शंस (वर्जिनिया विश्वविद्यालय), सॉल्बेलो प्रकोष्ठ (शिकागो विश्वविद्यालय), ई. एम.  फॉर्स्टर प्रकोष्ठ (केम्ब्रिज विश्वविद्यालय) आदि ऐसे अनेक महत्त्वपूर्ण साहित्यिक संग्रह विदेशों में सुरक्षित एवं शोध–कर्त्ताओं के लिए सुलभ हैं । ये सब वहां की विश्वविद्यालय–व्यवस्था के अंतर्गत संरक्षित हैं । जिसके विपरीत हम अपने देश के विश्वविद्यालयों और सरकारी संग्रहालयों की दुरवस्था से भली–भांति परिचित हैं ।

‘प्रेमचंद पत्रों में’ की भूमिका में मैंने इन महत्त्वपूर्ण प्रश्नों की ओर ध्यान आकृष्ट करने की कोशिश की है । साहित्यिक पत्रों के संग्रहों की संपादन–प्रविधियों का पालन विदेशों में कैसे किया जा रहा है, उसकी भी चर्चा वहां की गयी है । अंग्रेजी से हिंदी साहित्य में कितना लिया गया है, अथवा अंग्रेजी का हिंदी–भाषा पर ही कितना व्यापक प्रभाव पड़ा है, यह तो एक अलग विषय है, लेकिन आज भी अंग्रेजी की तुलना में हिंदी पुस्तकों के प्रकाशन–प्रसारण की स्थिति कितनी चिंतनीय है, यह सबके सामने है । अपने देश में ही अंग्रेजी पुस्तकों की तुलना में हिंदी पुस्तकों की बिक्री कितनी होती है, इसके आंकड़े ही चैंकाने वाले होंगे । अंग्रेजी की तुलना में हिंदी के अधिकांश प्रकाशक अपने लेखकों की रॉयल्टी चुकाने में कितनी हेराफेरी करते हैं, यह भी सबको ज्ञात है, और केवल इस बात ने हिंदी का कितना अहित किया है, इस पर कोई ध्यान नहीं देता । आज समय है इन सारे प्रश्नों पर गंभीरता से सोचने का । यह ध्रुव सत्य है कि जिस देश–समाज में शिक्षक और लेखक सबसे कम सम्मान पाते हों, वह देश कभी पर्याप्त सभ्य और विकसित नहीं माना जा सकता ।

साहित्यकारों के पत्र, पांडुलिपियां आदि भी देश और समाज की विरासत का एक महत्त्वपूर्ण अंग होते हैं । विरासत को संभालने की जिम्मेवारी नयी पीढ़ी की होती है, जब वह उसका महत्त्व समझने लायक हो जाती है । और विरासत को संभालना ही देश और समाज के प्रति सच्चा कर्त्तव्य–निर्वहन हो सकता है ।

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 आलेख/चित्र (c) डा। मंगलमूर्त्ति

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