‘देहाती दुनिया’: शती-प्रसंग-१
समीक्षक के पास अपनी
विचारधारा और अपनी समालोचना-दृष्टि होती है | वह उपन्यास के समय और समाज को अपने
समय और सामाजिक मूल्यों की कसौटी पर रख कर परखता है जिसे इलियट ‘इतिहास-बोध’ कहते
हैं; इसी में उसकी आलोचनात्मक निर्वैयक्तिकता की पहचान होती है | श्री यादव के लेख
को हम इसी परिपेक्ष्य में देख सकते हैं | अपने लेख के प्रारम्भ में ही उन्होंने “उस दौर के प्रारंभिक उपन्यासों की शिल्पगत प्रयोगशीलता के अनगढ़पन” की बात उठाई है | यह हिंदी उपन्यास का प्रारम्भिक
दौर था जब हिंदी भाषा स्वयं साहित्य-लेखन के क्षेत्र में उर्दू-फारसी बंग्रेज़ी और
बंगला के त्रिकोण की फांस से निकलने की कोशिश में लगी थी, और साथ ही हिंदी उपन्यास
के शिल्प-विधान की दिशा भी इस त्रिकोण से प्रभावित हो रही थी | प्रेमचंद जो इस
प्रारम्भिक दौर के सबसे प्रतिभाशाली उपन्यास-लेखक थे, उन्होंने कथा-भाषा और
कथा-संरचना-शिल्प - दोनों क्षेत्रों में आश्चर्यजनक अग्रगामिता का परिचय दिया था |
उन्होंने अपने उपन्यास-लेखन में उर्दू-फारसी, बंगला और अंग्रेजी से
प्रभाव-ग्रहण की बात स्वयं स्वीकार की है |
लेकिन प्रेमचंद के बरक्स
शिवपूजन सहाय ने जो एकमात्र औपन्यासिक कृति हिंदी साहित्य को दी उसमें – कथा-भाषा
और शिल्प: इन दोनों क्षेत्रों में – अभूतपूर्व विलक्षणता दिखाई देती है | और उसमें
एक और विशिष्टता यह दीखती है कि उस उपन्यास की कथा-भाषा ही उसकी कथा-संरचना के
शिल्प का प्रमुख कारक बन जाती है, या कहें कि ‘देहाती दुनिया’ की कथा-भाषा
ही वह उपकरण बन जाती है जिससे उस उपन्यास का कथा-संरचना-शिल्प संघटित होता है | या
यह भी कि, उस कथानक की संरचना उस कथा-भाषा के बिना संभव ही नहीं हो पाती | ’देहाती
दुनिया’ उपन्यास की इस विशिष्टता की ओर अभी तक ध्यान न दे पाने के कारण ही हिंदी के
प्रायः सभी समालोचकों को इस उपन्यास की शिल्पगत-संरचना अटपटी-सी लगती रही है |
वास्तव में ‘देहाती दुनिया’ में भाषा और शिल्प
की इस एकमेकता पर अभी तक सूक्ष्म-दृष्टि अनुशीलन हो ही नहीं पाया है |
आशा है एक श्रेष्ठ साहित्यिक
कृति के रूप में ‘देहाती दुनिया’ के अनुशीलन पर इस शती-वर्ष पुनर्मूल्यांकन के प्रसंग में और
विचार हो सकेगा | श्री वीरेंद्र यादव जी का यह लेख उसी संभावित श्रृंखला की एक कड़ी
के रूप में यहाँ प्रकाशित किया जा रहा है | इस श्रृंखला में इस ब्लॉग पर और भी लेख
पहले प्रकाशित हो चुके हैं जिन्हें भी आप पढ़ सकते है |]
-मंगलमूर्त्ति
‘देहाती दुनिया’: एक सामाजिक कथा वृत्तांत
वीरेंद्र यादव
‘देहाती दुनिया’ उपन्यास के सामाजिक वृत्तांत के केंद्र में वर्चस्वशाली द्विज– जातियां हैं, लेकिन इसके हाशिये
पर श्रमशील निम्न जातियों की स्त्रियां और पुरुष
अपने सुख–दुख के साथ ग्रामीण सामाजिक संरचना
को एक पूर्णता प्रदान करते हैं । उपन्यास जिस रामसहर
गांव का कथा वृत्तांत लिए हुए है उसके जमींदार बाबू सरबजीत
सिंह पर ब्रह्महत्या का दोष था, क्योंकि उन्होंने एक बीघा खेत के लिए अपने ही गांव के एक ब्राह्मण की हत्या
कर दी थी । इसी के चलते उनके पुत्र रामटहल सिंह लंबे समय तक अविवाहित रहे, लेकिन इसकी क्षतिपूर्ति उन्होंने हवेली
की गोबर पाथने वाली जवान बुधिया को रखैल बना और उससे तीन बेटियों का उपहार पाकर किया था । अंत में उन्होंने एक बेटी बेचने वाले लुटे–पिटे सजातीय
मनबहाल सिंह की बेटी महादेई
को खरीदकर पकी उम्र में अपना विवाह
भी रचा लिया था ।
मनबहाल सिंह आठ बेटियां पहले ही बेच चुका था, यह उसकी नवीं बेटी थी । इस विवाह से गांव वालों को यह सुविधा हुई कि ‘‘जब कभी बैलों और गाय–भैंसों के घावों में कीड़े पड़ते थे, तब बेटी बेचने वालों के सात नाम लिखकर उनके गले में बांधने के लिए नामों का पता लगाना पड़ता था । पर अब तो केवल ‘मनबहाल सिंह’ का नाम ही काफी था ।’’ बेचारे खेदू कहार को यही कहने के अपराध के चलते बाबू साहब ने पिटवाकर अधमरा कर दिया था । और उसकी पत्नी को भी उनके नौकरों ने नंगा करके डंडों से उसके जवान बेटे के सामने ‘गाय की तरह पीटा था’ । यही हाल बाबू साहब ने पलटू चमार का भी किया था । पर खेदू की तरह पलटू लाचार नहीं था । वह जूतियां गांठकर पेट पालने वाला नहीं था । वह था धर्म–परिवर्तित ईसाईयों का सरदार । अपने समाज में उसकी बड़ी साख और धाक थी । उस पर मार पड़ते ही ईसाइयों के कान खड़े हो गए । वे तुरंत पलटू को बाल–बच्चे सहित अपने अड्डे पर ले गए । खेदू और पलटू के माध्यम से शिवपूजन सहाय ने हिंदू समाज में दलित श्रमशील जातियों की उस दुर्दशा का वृतांत रचा है जो कमोबेश किंचित बदले रूप में आज भी जारी है । लेकिन यहां उल्लेखनीय यह है कि ग्रामीण परिप्रेक्ष्य में दलित जातियों द्वारा ईसाई धर्म परिवर्तन के माध्यम से दलित शुद्धिकरण का जो सकारात्मक विमर्श उन्होंने इस औपन्यासिक कथ्य में समाहित किया है वह तब तक शायद ही किसी उपन्यास में शामिल रहा हो । ‘पलटू को अपनी इज्जत प्यारी थी इसलिए वह अपने बाल–बच्चों के साथ ईसाई हो गया था
। लेकिन खेदू ने जब गांव छोड़ना भी न स्वीकार किया तो उसके बेटों में रोष पनपा कि ‘‘क्या हम लोग कहांर होने से ही इतने गए–बीते हो गए कि हमारी ही आंखों के सामने हमारी स्त्रियां बेईज्जत हो गर्इं, और हम चूं भी नहीं कर सके ?–––क्या हम लोगों को अपनी इज्जत का कुछ ख्याल नहीं है ? जब अछूत भी अपनी इज्जत के लिए प्राण समान प्यारा धर्म छोड़ देते हैं तब हम तो कहार हैं । हमारा गट्टा पाक है । हमारा छुआ पानी तो ब्राह्मण पीते हैं ।”लगभग एक शताब्दी पूर्व उत्तर
भारतीय समाज में शूद्र और दलित जातियों में प्रतिरोध की चेतना
का यह कथा–वृत्तांत रचते हुए शिवपूजन सहाय अपने समकालीनों की उस ‘ग्राम्यदृष्टि’ का प्रत्याख्यान कर रहे थे जो
‘अहा ग्राम्य जीवन भी क्या है’ की अतीतगामिता पर टिकी थी । खेदू कहार की घरवाली सोनिया अपने पति के चलते बेटों के साथ गांव छोड़कर कलकत्ता तो न जा पाई, लेकिन उसके मन में यह संताप
था कि
‘‘न जाने रामसहर में क्या धरा है । यहां तो दिनभर
हाड़–तोड़ मेहनत करने पर भी पेट नहीं भरता । काम कराने वाले बहुत हैं, मगर मजूरी देने की बेर सबकी छाती फटने लगती है । जिस दिन से बाबू साहब ने मारा है, उस दिन से हम लोगों
को खाना–पीना भी अच्छा नहीं लगता ।–––दुनिया में काम प्यारा है चाम नहीं ।’’
मेहनतकशों की ग्राम्य जीवन से यह निराशा और पलायनभाव गांधी के उस ‘ग्राम स्वराज्य’ का मिथक भेदन करती है जो भारतीय गांव के उदात्तीकरण पर टिका था । शिवपूजन सहाय यहां अनजाने ही डॉ. अंबेडकर के भारतीय
गांव की उस अवधारणा के निकट हैं जिसके
अनुसार ‘‘क्या है भारतीय
गांव । सिवाय स्थानीयता की बदबू, अज्ञानता की खोह और तंग दिमाग सांप्रदायिकता के ।’’ उल्लेखनीय यह भी है कि जब ‘देहाती दुनिया’ उपन्यास लिखा गया था तब तक उत्तर भारत में अंबेडकर चिंतन
की न प्रभावी उपस्थिति दर्ज हुई थी और न ही वे दलित आंदोलन में नेतृत्वकारी भूमिका में थे । सच तो यह है कि अपने समय–समाज के यथार्थ
के प्रति
शिवपूजन सहाय की पैनी दृष्टि
का ही यह परिणाम था कि वे तत्कालीन ग्राम्य समाज की यंत्रणा को हाशिये के समाज की दृष्टि से कथात्मक बना सके थे । तत्कालीन ग्रामीण संरचना
को कथ्यात्मक संदर्भ देते हुए शिवपूजन सहाय स्त्रियों के विरुद्ध मर्द–सत्ता की उस लोलुप शोषक दृष्टि
का वृत्तांत भी रचते हैं जो जाति, कुल गोत्र
का अतिक्रमण करते हुए स्त्री को महज एक भोग्यवस्तु में तब्दील कर देती है । रामटहल
सिंह रखेलिन
से पैदा अपनी ही बेटियों के सौदागर
मनबहाल सिंह की मदद करते हैं तो चोरों का मेठ गुदरी राय अपनी नातिन की उम्र की सुगिया को खरीदकर ब्याह करने का ढोंग करता है । गांव में जब पुलिस
का धावा होता तो पुरुष
तो भाग निकलते लेकिन स्त्रियां उनकी बहादुरी का शिकार
होती हैं ।
‘‘रामसहर में दरोगाजी आए हुए हैं । देहात में दारोगा को जो दावत दी जाती है, वह दुनिया में दामाद को भी दुर्लभ है ।–––गांव भर के अहीर अपने–अपने घर से दही के मटके लेकर पहुंच रहे हैं–––जब पिलुआ अहीर दही की एक छोटी मटकी लेकर आया, तब दारोगाजी उसको गाली देते हुए गरजकर बोले - काहे को सुतुही भर दही लाया है रे ? क्या दामाद को परछने के लिए दही–अच्छत का टीका लगाने आया है ? चला जा सामने से, नहीं तो एक जूता भी नीचे नहीं पड़ेगा । चांद के बाल उड़ा दूंगा । अबकी बार खेत चराई की फौजदारी में फंसाकर सब माल–मवेशी नीलाम करा दूंगा ।’’
पिलुआ के अनुनय–विनय के बावजूद दारोगा जी ने उसकी मटकी फोड़वा दी और अपने घोड़े के लिए एक पसेरी
चना वसूलने
का हुक्म
सिपाही को दे दिया । उपन्यास में पिलुआ
अहीर की बेबसी और सिपाही
नूर मियां
द्वारा उसकी घरवाली की बेईज्जती का वृत्तांत रचते हुए उपन्यासकार ने गरीबी
के बावजूद
पिलुआ अहीर के स्वाभिमान का जो वृत्तांत रचा है वह लेखक की मेहनतकश वर्ग के प्रति गहरी सहानुभूति के बिना संभव नहीं है ।
स्वीकार करना होगा कि ‘देहाती दुनिया’ ग्राम्य समाज का आंतरिक वृत्तांत जिन सूक्ष्म ब्यौरों, मुहावरों ओर जीवनचर्या के विस्तार के साथ समाहित करता है वह इसका अंतरंग
द्रष्टा हुए बिना संभव नहीं था । अच्छा
यह भी है कि शिवपूजन सहाय ने इसे काफी कुछ निस्संगता के साथ प्रस्तुत किया है । वे स्वयं
जिस कायस्थ
जाति के थे उसके प्रति
आलोचनात्मक भाव अपनाने में भी उन्होंने कोई संकोच
नहीं बरता । कायस्थ कुल में जन्मे दारोगा
का चित्रण
उपन्यास में कुछ यूं है,
‘‘दारोगाजी के किसी पुश्त में दया की खेती नहीं हुई थी । उनके पिता पटवारी थे । पटवारी भी कैसे ? गरीबों की गर्दन पर अपनी कलम टेने वाले । उनकी कलम की मार ने कितनों की कमर तोड़ दी थी, कितने बिना नाधा–पैना के हो गए थे, कितनों का देस छूट गया था, कितनों के मुंह के टुकड़े छिन गए थे, (एक अन्य प्रसंग में ) तहसीलदार और पटवारी जहां–कहीं जाते हैं नोच–चोथकर खा–चबा जाते हैं । कायथ दीवान ऐसा गंवार नहीं होता । कितने ही दरबारों के दीवान देखते–ही–देखते राजा हो जाते हैं ।’’
उपन्यास के केंद्र में जहां जमींदार रामटहल सिंह हैं वहीं गांव के पंडित पशुपति
पांडे और उनका बेटा गोवर्धन भी है ।
“मंदिर के पुजारी हैं पसुपत पांडे । उनके लिए काला अच्छर भैंस बराबर भले ही हो, पर वह माने जाते हैं - बड़े भारी पंडित । आसपास के गांव में वही अकेले अगड़धत्त ज्योतिषी, तांत्रिक, कर्मकांडी और कथक्कड़ समझे जाते हैं । ज्योतिष की पोथियां तो उनकी उंगलियों पर नाचती रहती हैं । तंत्र–मंत्र भी वह चुटकियों में कर डालते हैं । कर्मकांड मानों उनके कंठागर है, और अठारहों पुरान तो मानों जबान पर हैं ।”
पशुपति पांडे
के बहाने
उपन्यासकार ने धर्म, कर्मकांड और अंध आस्था पर टिके ब्राह्मणवादी पाखंड
और कमाई के धंधों को उजागर किया है,
तो गोबर्धन के माध्यम
से ‘बड़ी डयोढ़ियों’ में परदे के पीछे चल रहे उस अनैतिक खेल का पर्दाफाश भी किया है जिसके
चलते ठकुराइन महादेई को पुरोहित पुत्र गोबर्धन ले उड़ता है । कुल मिलाकर शिवपूजन सहाय ने
‘देहाती दुनिया’ के बहाने
उत्तर भारत के तत्कालीन ग्राम्य यथार्थ को जिस बेबाकी के साथ बेपर्दा किया है वह इसे समाजशास्त्रीय दृष्टि
से भी महत्व प्रदान करता है ।
उपन्यास में स्थानिक बोली–बानी, मुहावरों, कहावतों और लोकोक्तियों आदि का अत्यंत सटीक उपयोग
हुआ है । कई औपन्यासिक प्रसंगों और स्थितियों का वर्णन
शिवपूजन सहाय ने जिस भाषायी
कौशल के साथ किया है वह उनकी अपनी रचनात्मकता है । यहां प्रस्तुत कुछ अंश इसके साक्ष्य हैं –
“भूखे गरीब के पेट की तरह धरती जल रही थी । लू की लपट से ऐसी आंच निकलती थी, मानों नवयुवती विधवा गरम सांस छोड़ रही हो ।” ....‘‘दारोगाजी तसवीर बन गए । उनकी आंखें कामना के कुंड में तैरने लगीं - लालसा की लहरों के साथ खेलने लगीं । सर के घाव का दर्द भूल गया । मंत्र से बंधे हुए विषधर की तरह वहीं के वहीं खड़े रहे ।’’ ....‘‘सुगिया का नशा खिल उठा । उसके गहनों ने दारोगा जी की पेटी में आराम किया । उनकी शरारतों की बोटी–बोटी फड़कने लगी । पनबट्टा और इत्र की शीशियां खाली हो चलीं । चोर–महल रंग–महल हो उठा ।’’
कहना न होगा कि ‘देहाती दुनिया’ हिंदी उपन्यास की प्रेमंचदयुगीन उस यथार्थवादी लेखन परंपरा की सशक्त कड़ी है जो उन दिनों निर्माण की प्रक्रिया में थी । ध्यान देने की बात यह भी है कि इस उपन्यास के माध्यम से शिवपूजन सहाय ने उस दौर के आदर्शोन्मुखी यथार्थवाद के बरक्स आलोचनात्मक यथार्थ की जिस प्रवृत्ति को अपनाया वही आज हिंदी उपन्यास की मुख्य धारा है । सच है कि बीसवीं शताब्दी के शुरूआती वर्षों के ग्रामीण उत्तर भारत की वास्तविक पहचान जिन साहित्यिक कृतियों से की जा सकती है उनमें ‘देहाती दुनिया’ अनिवार्य रूप से शामिल है । शिवपूजन सहाय द्वारा खिलंदड़े भाव से लिखे गए इस उपन्यास में बाल–दृष्टि और परिपक्व बौद्धिकता का जो सहमेल है उसे हिंदी कथालेखन के उस दौर के नए मुहावरे के रूप में पढ़ा जाना चाहिए । इसमें
कथा–भीतर–कथा के भी सूत्र तलाशे जा सकते हैं । ‘देहाती दुनिया’ को आधुनिक हिंदी उपन्यास की नींव निर्माण करने वाली कृति के रूप में दर्ज कर इसके महत्व को पहचाने जाने की जरूरत आज भी दरपेश है ।
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चित्र (C) डा.मंगलमूर्त्ति
[‘देहाती दुनिया’ से सम्बद्ध और सामग्री देखें
vibhutimurty.blogspot.com
(अध्याय १: अंग्रेजी
अनुवाद: ८.८.२०१६ / दूधनाथ सिंह का लेख: ११.१.२०२० / मेरा लेख: १७.४.२०२१ / कथा-भाषा: ४.८.२०२३)
vagishwari.blogspot.com
(‘देहाती दुनिया:शती-प्रसंग’:८.८.२०२५)]


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